अमीरों का क्लब है वर्ल्ड इक्नॉमिक फोरम

ऐसे मंचों से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि एजेंडा पारदर्शी नहीं है…

जनवरी 15 से 19 के बीच दुनिया के एक महत्वपूर्ण मंच, वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम, का सम्मेलन डावोस (स्विट्जरलैंड) में सम्पन्न हुआ। वर्ष 1971 में अस्तित्व में आया वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम, पिछले लगभग 53 साल से वैश्विक आर्थिक संरचना पर चर्चा करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था के नाते उभरा है। व्यापार, भू-राजनीति, सुरक्षा, सहकार, ऊर्जा से लेकर पर्यावरण और प्रकृति समेत अनेकानेक मुद्दों पर इस मंच पर चर्चा होती रही है। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी हस्तियों ने डावोस के इस सम्मेलन में भाग लिया। 60 देशों के शासनाध्यक्षों के अलावा बड़ी कई संस्थाओं के प्रतिनिधि, राजनेता, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुख, और अनेकानेक आर्थिक जगत के प्रमुख महानुभाव इस सम्मेलन में आयोजित बैठकों और गोष्ठियों में दिखे। 1000 बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पोषित यह मंच, अपने सम्मेलनों में भाग लेने वालों से मोटी रकम फीस के रूप में लेता है। यानी किसी भी तरह से यह सर्वसमावेषी मंच तो नहीं कहा जा सकता। समाज में कम भाग्यशाली लोगों की ओर से बोलने वालों में से शायद कोई यहां नहीं पहुंच पाता। यह मंच दुनिया की उन विशालकाय कंपनियों की दुनिया का ही मंच कहा जा सकता है, जिनके पैसे से इसका काम चलता है, क्योंकि इसमें दुनिया के सामान्य जन के हित साधने जैसी कोई बात नहीं होती। यदि वर्ष 2024 के ही डावोस में आयोजित वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम की बात करें तो देखते हैं कि 5 दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई उनका सामान्यजन से कोई खास सरोकार दिखाई नहीं देता। उदाहरण के लिए एक सत्र में इस बात पर चर्चा होती है कि दुनिया में व्यापार और निवेश तथाकथित रूप से कुशल साझेदारी के स्थान पर मित्रता के आधार पर हो रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, इजराइल-हमास युद्ध आदि स्थितियां इन कंपनियों के लिए इसलिए शुभ नहीं हैं, क्योंकि इनके कारण उनके निवेश प्रभावित हो रहे हैं, जिनके कारण उनमें चिंता व्याप्त है।

वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम के इस मंच पर जिन 60 शासनाध्यक्षों ने भाग लिया वे सभी वैश्विक भू-राजनीति में उथल-पुथल, देशों के बीच बढ़ती वैमनस्यता और युद्ध की स्थिति से चिंता व्यक्त करते हुए देखे गए। चाहे उनकी चिंता वाजिब है, लेकिन आर्थिकी की चर्चा करते समय उनका ध्यान मुल्कों के बीच असमानताओं और दुनिया में गरीबी, निरक्षरता और बेरोजगारी की तरफ नहीं था। एक विषय पर जिसमें पूरे दुनिया का सरोकार है, यानी पर्यावरण और मौसम परिवर्तन, उस पर बात तो हुई, लेकिन समाधान के लिए वैश्विक नेताओं में कोई विशेष इच्छाशक्ति दिखाई नहीं दी। पिछले कई पर्यावरण सम्मेलनों से यह स्पष्ट हो रहा है कि आज पर्यावरण पर चर्चा से ज्यादा समाधान की जरूरत है। काफी साल पहले विकसित देशों ने यह वादा किया था कि वे हर वर्ष 100 अरब अमरीकी डॉलर की सहायता पर्यावरण समस्या से निपटने के लिए करेंगे। लेकिन वह सहायता कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। उसी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जिनकी संपत्ति खरबों डॉलरों की है, वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम या अन्य मंचों पर पर्यावरण की समस्या पर चाहे चर्चा करती होंगी, लेकिन वे अभी भी अपने पास उपलब्ध प्रौद्योगिकी को भी बिना भारी शुल्क पर्यावरण समस्या से निपटने के लिए साझा करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह स्थिति बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दोहरे चरित्र की ओर इंगित करती है।

मुद्दों के प्रति ईमानदारी की कमी : वे सभी महानुभाव जो डावोस की बैठक में भाग लेने आए, उन्होंने दुनिया में बिगड़ते पर्यावरण और बदलते मौसम के कारण तबाही की आशंकाओं पर चर्चा तो की, लेकिन उनमें से अधिकांश अपने-अपने निजी विमान से वहां आए। उससे कार्बन का कितना उत्सर्जन हुआ और पर्यावरण का कितना ह्रास हुआ, उस ओर वे उदासीन दिखे। यदि वास्तव में वे वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम के कर्ता-धर्ता दुनिया के समक्ष प्रस्तुत मुद्दों के प्रति संवेदनशील होते तो इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारी-भरकम शुल्क की अनिवार्यता नहीं होती। ऊंचे शुल्क के कारण इस सम्मेलन में हाशिये पर खड़े समुदायों, पिछड़े समाजों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और सामान्य लोगों को भी इसमें भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता। शासनाध्यक्षों और सरकारों में बड़े मंत्रियों और बड़ी कंपनियों के चहेते चुनिंदा बुद्धिजीवियों की उपस्थिति इन कंपनियों के एजेंडे को वैधता प्रदान करती है।

महामारी में उजागर हुआ था बड़े कारपोरेट का वीभत्स चेहरा : जाहिर है चाहे ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां मानवता और विश्व कल्याण की कितनी भी बातें करें, इनका इस सदी की सबसे बड़ी महामारी के दौरान व्यवहार दानवों को भी लज्जित करने वाला था। फाइजर नामक कंपनी ने तो अप्रभावी वैक्सीन ही जानबूझ कर दुनिया भर में बेच दी। कंपनी को भली भांति मालूम था कि उनकी वैक्सीन प्रभावी नहीं, उसके बावजूद वो अमरीकी सरकार के माध्यम से भारत सरकार भी दबाव बना रही थी। यही नहीं अमरीकी दबाव में भारत की विपक्षी पार्टियां भी सरकार पर इसकी वैक्सीन खरीदने हेतु दबाव बना रही थी। पिछले वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम (2023) में जब पत्रकारों द्वारा फाइजर कंपनी के प्रमुख से इस बाबत जवाब मांगा गया तो वो कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हुए। यह बात छुपी हुई नहीं है कि ‘गैट’ समझौतों में अधिकांश समझौते बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में हुए, ट्रिप्स समझौते में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में न केवल दवाओं और चिकित्सीय उपकरणों समेत सभी प्रकार के उत्पादों पर पेटेंट की अवधि बढ़ाई गई, प्रक्रिया पेटेंट से उत्पाद पेटेंट की व्यवस्था भी लागू की गई, जिससे दुनिया के सभी देशों में स्वास्थ्य सुरक्षा बाधित हुई। जब भारत की कैडिला कंपनी से दक्षिण अफ्रीका द्वारा दवाई खरीदने का न कंपनियों ने विरोध किया और इसके कारण उन्हें जनता के रोष का सामना करना पड़ा तो डब्ल्यूटीओ में मान्य किया गया कि महामारी और अपातकालीन परिस्थितियों में पेटेंट अप्रभावी रहेंगे। लेकिन दुनिया ने देखा कि सदी की सबसे भयंकर महामारी के बावजूद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने पेटेंट अधिकारों को नहीं छोड़ा। यही नहीं जब भारत और दक्षिण अफ्रीका के नेतृत्व में 100 से अधिक देशों ने ट्रिप्स काउंसिल के सामने ‘ट्रिप्स वेवर’ यानी ट्रिप्स से छूट का प्रस्ताव रखा तो अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में अमरीका और यूरोपीय देशों समेत सभी विकसित देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

तमाम प्रयासों के बावजूद सिर्फ कोरोना वैक्सीन पर ही उन्होंने पेटेंट के अधिकार को छोडऩे का प्रस्ताव मान्य किया। लेकिन उसमें भी इतनी शर्तें जोड़ दी गई, जिसके कारण वह छूट लगभग निष्प्रभावी हो गई। समझा जा सकता है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच जिसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही दबदबा हो और जिसमें विश्व के सामान्य प्रतिनिधियों की कोई प्रभावी भूमिका न हो, उससे दुनिया के किसी भी प्रकार के भले की कल्पना नहीं की जा सकती। समझना होगा कि वल्र्ड इक्नॉमिक फोरम जिसकी विश्व में कोई आधिकारिक भूमिका नहीं है और जो बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, जिनका धर्म ही लाभ और केवल लाभ कमाना है और जो मानवता के प्रति इतनी अधिक असंवेदनशील है, का ही एक मंच है, उनसे क्या अपेक्षा हो सकती है। ऐसे मंचों से विश्व को सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि उनका वास्तविक एजेंडा पारदर्शी नहीं है।

अमरीका में भी विरोध : 19 जनवरी, 2024 को अमरीकी प्रतिनिधि स्कॉट पेरी (पीए-10) ने पांच अन्य लोगों के साथ मिलकर ‘डिफंड डावोस एक्ट’ पेश किया, और कहा, ‘अमरीकी करदाताओं को द्वीपीय, वैश्विक अभिजात्य वर्ग के लिए वार्षिक स्की यात्राओं के लिए धन देने के लिए मजबूर करना बेतुका है – निंदनीय तो छोड़ ही दें… विश्व आर्थिक मंच अमरीकी फंडिंग के एक प्रतिशत के लायक भी नहीं है, और यह सही समय है जब हम दावोस को निधि से वंचित कर रहे हैं।’ इससे पता चलता है कि अमरीका में भी कांग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा है, यह आरोप लगाते हुए कि दुनिया के आम आदमी के लिए इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।

डा. अश्वनी महाजन

कालेज प्रोफेसर


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