हिमाचली हिंदी कहानी : विकास यात्रा : 55

By: May 11th, 2024 7:21 pm

कहानी के प्रभाव क्षेत्र में उभरा हिमाचली सृजन, अब अपनी प्रासंगिकता और पुरुषार्थ के साथ परिवेश का प्रतिनिधित्व भी कर रहा है। गद्य साहित्य के गंतव्य को छूते संदर्भों में हिमाचल के घटनाक्रम, जीवन शैली, सामाजिक विडंबनाओं, चीखते पहाड़ों का दर्द, विस्थापन की पीड़ा और आर्थिक अपराधों को समेटती कहानी की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, भाषा शैली व उद्देश्यों की समीक्षा करती यह शृंखला। कहानी का यह संसार कल्पना-परिकल्पना और यथार्थ की मिट्टी को विविध सांचों में कितना ढाल पाया। कहानी की यात्रा के मार्मिक, भावनात्मक और कलात्मक पहलुओं पर एक विस्तृत दृष्टि डाल रहे हैं वरिष्ठ समीक्षक एवं मर्मज्ञ साहित्यकार डा. हेमराज कौशिक, आरंभिक विवेचन के साथ किस्त-55

हिमाचल का कहानी संसार

विमर्श के बिंदु

1. हिमाचल की कहानी यात्रा
2. कहानीकारों का विश्लेषण
3. कहानी की जगह, जिरह और परिवेश
4. राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचली कहानी की गूंज
5. हिमाचल के आलोचना पक्ष में कहानी
6. हिमाचल के कहानीकारों का बौद्धिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक व राजनीतिक पक्ष

लेखक का परिचय

नाम : डॉ. हेमराज कौशिक, जन्म : 9 दिसम्बर 1949 को जिला सोलन के अंतर्गत अर्की तहसील के बातल गांव में। पिता का नाम : श्री जयानंद कौशिक, माता का नाम : श्रीमती चिन्तामणि कौशिक, शिक्षा : एमए, एमएड, एम. फिल, पीएचडी (हिन्दी), व्यवसाय : हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में सैंतीस वर्षों तक हिन्दी प्राध्यापक का कार्य करते हुए प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त। कुल प्रकाशित पुस्तकें : 17, मुख्य पुस्तकें : अमृतलाल नागर के उपन्यास, मूल्य और हिंदी उपन्यास, कथा की दुनिया : एक प्रत्यवलोकन, साहित्य सेवी राजनेता शांता कुमार, साहित्य के आस्वाद, क्रांतिकारी साहित्यकार यशपाल और कथा समय की गतिशीलता। पुरस्कार एवं सम्मान : 1. वर्ष 1991 के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से भारत के राष्ट्रपति द्वारा अलंकृत, 2. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी की सतत उत्कृष्ट एवं समर्पित सेवा के लिए सरस्वती सम्मान से 1998 में राष्ट्रभाषा सम्मेलन में अलंकृत, 3. आथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल (पंजी.) द्वारा साहित्य सृजन में योगदान के लिए 2011 का लेखक सम्मान, भुट्टी वीवर्ज कोआप्रेटिव सोसाइटी लिमिटिड द्वारा वर्ष 2018 के वेदराम राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत, कला, भाषा, संस्कृति और समाज के लिए समर्पित संस्था नवल प्रयास द्वारा धर्म प्रकाश साहित्य रतन सम्मान 2018 से अलंकृत, मानव कल्याण समिति अर्की, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश द्वारा साहित्य के लिए अनन्य योगदान के लिए सम्मान, प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका इरावती के द्वितीय इरावती 2018 के सम्मान से अलंकृत, पल्लव काव्य मंच, रामपुर, उत्तर प्रदेश का वर्ष 2019 के लिए ‘डॉ. रामविलास शर्मा’ राष्ट्रीय सम्मान, दिव्य हिमाचल के प्रतिष्ठित सम्मान ‘हिमाचल एक्सीलेंस अवार्ड’ ‘सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार’ सम्मान 2019-2020 के लिए अलंकृत और हिमाचल प्रदेश सिरमौर कला संगम द्वारा डॉ. परमार पुरस्कार।

डा. हेमराज कौशिक
अतिथि संपादक
मो.-9418010646

-(पिछले अंक का शेष भाग)
‘पाज्जे के फूल’ संग्रह की कहानियां किसी विमर्शीय परिधि में सीमित नहीं हैं। ये कहानियां अंतर्वस्तु, परिवेश और चरित्र सृष्टि के माध्यम से सामाजिक यथार्थ का अन्वेषण करती हुई मानव मूल्यों की स्थापना करती हैं। ‘गोरखू चाचा’ में पुरुष की अहमन्यता, आधिपत्य भाव और पुत्र मोह की चाह में नारी उत्पीडऩ का चित्रण है। लिंग भेद, बेटा-बेटी में अंतर और पुत्र एषणा का जड़ संस्कार, पारिवारिक विघटन और नारी को उत्पीडऩ की पराकाष्ठा तक पहुंचता है। ‘पाज्जे के फूल’ में लोक कथा को आधार बनाकर भाई-बहन के प्रेम की व्यंजना है। प्रस्तुत संग्रह में तीन बेताल कथाओं की शैली में सृजित तीन कहानियों में समाज की विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं को बेताल के प्रतीक के माध्यम से सरस, लोक रंजक और प्रयोजनमूलक रूप में प्रस्तुत किया है। ‘दायरों के भीतर’ में और ‘वह रात बहुत लंबी थी’ में प्रेम के परिवर्तित स्वरूप और अंतर्जातीय विवाह के प्रति माता-पिता के प्रतिगामी दृष्टिकोण की व्यंजना है। इसी भांति ‘ऋण मुक्ति’ दलित चेतना की कहानी है। ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ में एक ग्रामीण वृद्धा के पावर ऑफ अटॉर्नी देकर जमीन देकर धोखा खाने की कहानी है। बद्री सिंह भाटिया अपने समय और समाज के यथार्थ को रचने वाले सिद्धहस्त रचनाकार हैं। अपने समय के महत्वपूर्ण सवाल और सामाजिक सरोकार उनकी कहानियों में व्यंजित हैं।

‘बडिय़ां डालती औरतें और शुभांगी कथा’ संग्रह में बारह कहानियां- भंवर, छल्ले में जिंदगी, कहां है मेरा घर, खाली, एक औरत की मनोइच्छा, मरी हुई नियत के लोगों की दुनिया, लोग नहीं छोड़ते, प्रेतात्मा की गवाही, बडिय़ां डालती औरतें और शुभांगी कथा, माटी की कसम, विषधर और दोषमुक्त संगृहीत हैं। ‘बडिय़ां डालती औरतें और शुभांगी कथा’ में कहानीकार ने औरतों की प्रकृति और एक स्थान पर एक साथ बैठी औरतों के परस्पर संवाद के सूत्रों की क्रमिकता और किसी अन्य के अचानक सामने से निकलने वाले के संबंध में बातें किस्सों को जन्म देती हैं। कहानीकार ने स्त्री मन की भावनाओं, परिस्थितियों और परिणीतियों को सामने लाया है। ‘माटी की कसम’, ‘एक स्त्री की मनोइच्छा’, ‘खाली’, ‘प्रेतात्मा की गवाही’ व ‘दोषमुक्त’ आदि कहानियां स्त्री मन के विविध पक्षों की अभिव्यंजना करती हैं। ‘भंवर’, ‘छल्ले में जिंदगी’, ‘मेरा घर कहां है’ भिन्न संवेदना की कहानियां हैं। वृद्धावस्था में व्यक्ति की निरीह स्थिति और मन को उद्वेलित करती भावनाएं, विगत की स्मृतियों की पीड़ा, संतति के साथ सामंजस्य के अभाव, अकेलेपन की पीड़ा को भोगने के लिए विवश नियति का चित्रण है। बद्री सिंह भाटिया की कहानियां अपनी पठनीयता के बल पर सुदीर्घ काल तक स्मृति पटल पर स्थान बनाए रखती हैं। ग्रामीण परिवेश प्रधान इन कहानियों में ग्रामीण जीवन की विद्रूपताएं, विडंबनाएं और विविध छवियां विद्यमान हैं। बद्री सिंह भाटिया के लिए कथात्मकता आधारभूत चीज है। विचारों के आरोपण की अपेक्षा कहानियों में अनुभूति और विचार का सम्यक निर्वाह है। उनकी कहानियां सूत्र रूप में कौंधती हैं। घटना, संवाद और दृश्य का संश्लिष्ट रूप उभरता है और इस क्रम में चरित्र सृष्टि की विश्वसनीयता और स्वाभाविकता बनी रहती है। कहानीकार के पास ग्रामीण समाज का गहन अध्ययन और अनुभव है। यही कारण है कि कहानियों में स्थानीयता के नए-नए शब्द, नई-नई अभिव्यक्तियां, अनूठा चरित्र विधान, कथा स्थितियां पूर्ण रचनात्मकता के साथ विद्यमान हैं। इनमें रचनाकार के जीवनानुभव और जीवनदृष्टि की परिपक्वता का बोध होता है। उनकी कहानियों में सर्वथा नए अनुभवों का कलात्मक पुनर्सृजन पाठक को विभोर करता है।

इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में गंगाराम राजी के सर्वाधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनका पहला कहानी संग्रह ‘युगों पुराना संगीत’ सन् 1973 में प्रकाशित हुआ था और उसके एक वर्ष पश्चात ‘मनमंथन’ उपन्यास प्रकाशित हुआ था। इन दो कथाकृतियों के अनंतर लगभग चार दशक उनका सृजन क्रम अवरुद्ध ही रहा। विवेच्य अवधि के दूसरे दशक में उनके उन्नीस कहानी संग्रह- सिंहावलोकन (2011), प्रेम पत्र (2012), रिमझिम बरसे (2012), मेरी मुंबई प्रवास की कहानियां (2013), चक दे इंडिया (2014), चलती का नाम गाड़ी है (2014), एक और मुक्ति वाहिनी (2014), उल्लू न बनाओ (2016), पांच बीघा जमीन (2017), जीवन एक पहेली (2018), कोने का बुहारा हुआ कूड़ा (2019), एक भीगी सुबह (2019), ग्यारह बजे (मेरी मुंबई प्रवास की कहानियां दो) (2020), नटखट भयो राम जी (2020), बुलेट ट्रेन (2020), भीगी भीगी रे चदरिया (2020), भाग-ओ, भाग (2020), कोरोना काल की कहानियां (2020), आई लव यू पापा (2020) प्रकाशित हैं ।

गंगाराम राजी की कहानियों का कथ्यवृत गांवों, कस्बों, नगरों और महानगरों के मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय समाज के चित्रण के विविध रूपों से संबद्ध है। उनकी कहानियों में कहीं आर्थिक अभाव में जूझते मध्यवर्गीय और हाशिए के समाज के परिवारों की विवशताएं हैं तो कहीं पारिवारिक संबंधों, दांपत्य संबंध में आयी आत्मकेंद्रिता निरूपित है। राजी की कहानियों में गांव के जीवन की सहकारिता, स्नेह, संबंधों की निस्वार्थता, निर्धनता और निश्छलता बार-बार स्मरण आती है। बहुत सी कहानियां गांवों के अतीतोन्मुख जीवन को पुनर्जीवित करती हैं। राजी की कहानियां निकट परिवेश का बहुविध साक्षात्कार जीवंतता और सहज भाषा शिल्प में करवाती हैं। कहानीकार दैनंदिन जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को कहानी कला के सांचे में ढालने में सिद्धहस्त है। सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के विविध पक्ष उनकी कहानियों में यथार्थ रूप में निरूपित हुए हैं। ‘सिंहावलोकन’ गंगाराम राजी का सुदीर्घ अंतराल के अनंतर प्रकाशित दूसरा कहानी संग्रह है। इसमें पंद्रह कहानियां, एक व्यंग्य और एक संस्मरण संगृहीत हैं। अंत में दो-तीन पत्र संग्रहीत हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह में भोग, चक दे इंडिया, देसी घी की पिन्नियां, फिल्ल बनी फूलन, जय भोले की, मौला बख्श, बहुत मीठा है, सिंहावलोकन आदि कहानियां संगृहीत हैं। ‘चक दे इंडिया’ में क्षेत्रवाद, प्रांतीयता संबंधी अनुदार और संकीर्ण दृष्टिकोण चित्रित है। इस तरह की संकीर्णता भारतीयता और राष्ट्रीयता को विखंडित करने वाली और परस्पर ईष्र्या-द्वेष को बढ़ावा देती है और उससे भावात्मक एकता के सूत्र क्षीण होते हैं। मुंबई में उत्तर भारतीयों के प्रति अनुदार, संकीर्ण दृष्टिकोण को क्षेत्रवाद को बढ़ा देने वाले विघटनकारी तत्वों के संदर्भ में चित्रित किया है। भारतीय नागरिकों को यह अधिकार है कि वे आजीविका की तलाश में भारत के किसी प्रांत में रोजगार की तलाश करें और स्वतंत्रतापूर्वक आजीविका करें।

मुंबई जैसे आधुनिक महानगर में उत्तर भारत से रोजगार की तलाश में आए लोगों के प्रति कुछ स्थानीय लोगों के दृष्टिकोण और हिंसात्मक स्थितियों का निरूपण किया है जिससे उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट उठाने पड़े। उन्हें उत्तर भारत का निवासी बाहर का लगता है। ‘देसी घी की पिन्नियां’ में पहाड़ी लोक जीवन की सादगी, ईमानदारी और लोक संस्कृति को चित्रित किया है। पहाड़ों में जहां प्राकृतिक सौंदर्य अनूठा है, वहीं वह जीवन की कठिनाइयों से भरा है। एक इंजीनियर को केंद्र बनाकर प्रस्तुत कहानी में पहाड़ी लोगों की आस्था, विश्वास और हृदय की सरलता प्रकट की है। इंजीनियर उनकी सरल प्रकृति का लाभ उठाकर उन्हें मूर्ख बनाकर धनार्जन करता है। अंतत: रहस्य अनावृत हो जाता है। ‘भोग’ भी महत्वपूर्ण और चर्चित कहानी है। सन् 1971 में यह कहानी ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई थी। इसमें कालाबाजारी से उत्पन्न मानसिकता और स्थितियों का निरूपण है। एक मालिक के लिए उसका प्रिय नौकर भी शोषण का माध्यम है। उसके प्रति भी उसका कहीं भी मानवीय दृष्टिकोण नहीं है। नौकर मालिक की मनोस्थिति को अनुभव कर मालिक के प्रति विद्रोह करता है और उसके भंडार से डालडा लूटता है और निर्धन बस्ती के साथियों के घरों के सामने रखता है ताकि बस्ती के लोग डालडा खाकर प्रसन्न हो जाएं। कहानी का यह प्रमुख चरित्र निर्धनता से पीडि़त है और पत्नी की एक छोटी सी साध को पूरा करने के लिए मालिक से डालता घी मांगता है। पत्नी ईश्वर को भोग लगाना चाहती है। उसे विश्वास होता है कि मालिक उसकी कत्र्तव्य निष्ठा को सम्मान देकर उसे इनकार नहीं करेगा, परंतु उसे दुत्कार, फटकार और मार मिलती है। परिणामस्वरूप उसमें विद्रोह चेतना का उन्मेष होता है। ‘सिंहावलोकन’ में नक्सलियों की विचारधारा और उसके वर्तमान स्वरूप और स्थितियों को चित्रित किया है। यह कहानी आम आदमी की समझ और नक्सलियों की विचारधारा के मध्य के द्वंद्व को उद्घाटित करती है। प्रस्तुत संग्रह की अन्य कहानियों में भी रोजमर्रा की घटनाओं को कहानी के सांचे में ढाला है।

‘प्रेम पत्र’ शीर्षक कहानी संग्रह में सोलह कहानियां- चौखड़ा जारी है, गिफ्ट और रिटर्न गिफ्ट, दादू माई लव, मां और श्राद्ध, वह लौट आया है, पानी केरा बुदबुदाए, सजना ने फूल मारया, सरहदें, शोले का टोला, तार तार ममता, रेफर केस, रणबांकुरा, अपने तो अपने होते हैं, कुकड़ू की कड़ैं हो गई, नरेगा मनरेगा और खिचड़ी और प्रेम पत्र संग्रहीत हैं। ‘चौखड़ा जारी है’ में चार मित्रों के परस्पर प्रेम, उनकी किशोर वय की शरारतों, परस्पर प्रेम और टकराहट का चित्रण है। चारों मित्रों के विभिन्न उत्सवों के अवसर पर उल्लास, शरारतों, परस्पर प्रेम और क्षणिक द्वेष को प्रस्तुत कहानी में अभिव्यंजित किया है। संकट के समय में मित्र द्वेष भाव को त्याग कर एक मित्र के दूर होने पर भी तीनों मित्र उसको खून देकर उसकी जान बचाते हैं। ‘मां और श्राद्ध’ शीर्षक कहानी में कहानीकार ने मां के जीवन संघर्ष, ग्रामीण जीवन में रच बस कर रहते हुए गाय के पालन पोषण को ग्रामीण जीवन का आधार मानती है। पुत्रवधू के नगर के प्रति आकर्षण के कारण बेटा और बहू शहर चले जाते हैं। नगरीय जीवन के कृत्रिम खानपान को अनुभव करते हैं। अंतत: गांव लौट भी आते हैं। मां की मृत्यु के अनंतर मां के श्राद्ध के समय मां के हृदय की निश्छलता और पौत्र के प्रति प्रेम को स्मरण करते हैं। ‘वह लौट आया’ शीर्षक कहानी पुनर्जन्म लेने की धारणा और अंधविश्वास पर आधारित है। ‘सजना ने फूल मारया’ भावुकतापूर्ण मार्मिक प्रेम कहानी है। ‘सरहद’ कहानी में एक सैनिक की देश की सरहद पर संतरी की ड्यूटी, जागरूकता, घर की स्मृतियों को उभारने के साथ यह भी प्रतिपादित किया है कि सरहदों के भूगोल को सैनिक और दूसरे जन तो समझते हैं, परंतु पशुओं के लिए तो सरहदों की सीमाएं नहीं होती। यही कारण है कि भेड़-बकरियां सीमाओं का अतिक्रमण कर आती-जाती रहती हैं। कहानीकार कहानी में एक स्थान पर कहता है कि यह सरहदें तो मानव निर्मित हैं, मेमने के लिए तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान एक जैसा है।                                                                                                                     -(शेष भाग अगले अंक में)

पुस्तक समीक्षा :  शिव सन्याल ने जलाया कविताओं का ‘चिराग’

लगातार सृजन में रत शिव सन्याल नया काव्य संग्रह ‘चिराग’ लेकर आए हैं। अपने मनोरथ स्पष्ट करते हुए वह कहते हैं, ‘कवि वही लिखता है जो उसके आसपास के वातावरण में घटित होता है। कवि सदैव संवेदनशील होता है। चिंतन से हर किसी की पीड़ा को अपने अंतर्मन से यथार्थ में लिख देता है। मेरे इस काव्य संग्रह में 60 कविताएं अलग-अलग रस से भरी हुई मन को छूने वाली हैं। हर पहलु पर मैंने लिखने की कोशिश की है जिसमें देश प्रेम की भावनाओं को उकेरा है। विविध रचनाओं को भी इस काव्य संग्रह में संजोया है।’ यश बुक्स पब्लिशर के मुख्य संपादक पंकज दर्शी अपनी समीक्षा में इस कविता संग्रह के बारे में कहते हैं, ‘चिराग शिव सन्याल का काव्य संग्रह है जिसमें उनकी कोशिश समाज के विभिन्न पहलुओं को छूने और अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने की है। प्रस्तुत काव्य संग्रह में उनकी रचनाएं विविध शैली में और विषयों पर हैं। समाज, राष्ट्र, जीवन दर्शन इस काव्य संग्रह के ज्यादा आंदोलित विषय हैं और इसके साथ ही कवि का विस्मय गुण और शृंगार रस भी कुछ रचनाओं में अभिव्यक्ति पाता है। विविध भाषा शैली और भाषा में सरल अभिव्यक्ति का गुण प्रस्तुत काव्य संग्रह में संतुलित रूप से विद्यमान है।’ सान्याल प्रकाशन जवाली से प्रकाशित इस काव्य संग्रह की कीमत 226 रुपए है। इस संग्रह में छोटी-छोटी कविताएं हैं जिनको पढ़ते हुए पाठक ऊबता नहीं है। हर कविता में कोई न कोई भाव छिपा है। गुरु वंदना नामक कविता का भाव देखिए, ‘गुरु पद वंदन मैं करूं, सकल कपट मन छोड़। पुष्प चरण अर्पित करूं, विनय करूं कर जोड़।’ ‘डगर के मुसाफिर’ नामक कविता में कवि कहता है, ‘डगर के हैं मुसाफिर दुख सुख में साथ चलें। हों जुदा न उम्र भर हाथों मेें लिए हाथ चलें। रखें हिम्मत हम कभी मुसीबत में हारें नहीं। तैरते हैं हौसले से तो होते दूर किनारे नहीं। कदम मिला कर चलेंगे दूरियां मिटती सदा। धैर्य, विश्वास हो मन में बाधाएं हटती सदा। प्रेम की अलख जगा हम सत्य के पाथ चलें। डगर के दो मुसाफिर दुख सुख में साथ चलें। हों जुदा न उम्र भर हाथों में लिए हाथ चलें।’ इसी तरह संग्रह की अन्य कविताएं भी रोचकता लिए हुए हैं और पाठकों को पसंद आएंगी।                 -फीचर डेस्क

उजालों में धूप सी पौमिला ठाकुर की ‘नायिका’

नारी की कई व्याख्याएं ओढ़े यह उपन्यास, आंतरिक संघर्षों के चित्र लिए जीवन की धूप-छांव छानता हुआ अंत में सामाजिक आंदोलन की धुरी बना देता है। पौमिला ठाकुर ने शिद्दत से औरत के बीच से ‘नायिका’ खोज डाली है। नायिका के अंतर्मन में उपन्यास का प्रवेश सहज नहीं है, बल्कि एक साथ कई औरतों का बलिदान, पारिवारिक संबंधों के बीच की कलह, असमानता की रगड़, रूढिय़ों की कठोरता, लोक लाज के सख्त पहरे और माहौल की तल्खियों का सामना करती दृष्टि व विवेचन है। यहां गांव के चरित्र, शहर की अंधी गलियां, पहाड़ के चित्र और वेदनाओं के गहरे सुमद्र हैं। यहां महिला अस्तित्व की चेतना मानवता के कठोर पन्नों से पूछ रही है और इसी के बीच लेखिका यथार्थ के कदमों पर कई फासलों को पार करती हुई स्त्री लेखन का स्थान उच्च कर देती है। दरअसल हर औरत के भीतर एक नायिका होती जरूर है, जिसे जन्म से ही दफनाने की प्रक्रियाओं के बीच पितृसत्तात्मक रुख तरह-तरह की विडंबनाओं को पैदा करता है। यह दीगर है कि निक्कू अपने ही सवालों की मल्लिका बन कर अंत में इस उपन्यास को सशक्त, सार्थक और उम्मीदों से भर देती है, वरना राजा के खासमखास बड़े साहब की बेटी के ख्वाब पालने से ही चुरा लिए गए और वह बाप की कचहरी में अन्याय की क्रूरता की शिकार हो गई। वह तड़पी जरूर, लेकिन टूटी नहीं। निक्कू, नाईका या नायिका अपने ही समय को लांघने के अनेक संबोधन हो सकते हैं, लेकिन उपन्यास की तपिश में पौमिला ठाकुर महिला आवरण पर आंसुओं और आशाओं के मखमली आलेख लिख देती हैं। निक्कू के इर्द-गिर्द औरतों का एक समृद्ध उजाला है, जिसे वह कभी मां (गणेशु), तो कभी सास या कभी धन्ने की औरत शेती तक ही नहीं, बल्कि बेटी वीणा या शेती की बेटी रूमा तक ले जाती है। निक्कू अकेली सहती रही, मां-बाप के बीच संबंधों का बिखराव। सौतेली मां की ताजपोशी के ठीक नीचे ठोकरें और जीवन के खुर उसे रौंदते रहे। बाप सोमनाथ के ‘साहेब’ कहलाने का मनोविज्ञान उसके जख्मों को सालता रहा और वहीं कहीं राजपुताना भी चलता रहा, ‘इस निक्कू ने पता नहीं कितने समन्दर पीए होंगे दुखों के घूंट-घूंट करके, फिर भी आंख में कभी एक आंसू नहीं पटका इसका। ऐसा गणेषु भी कहती थी कि मेरी बेटी पत्थर हो गई है।’

नाईका की शिकायतें बाप से रही हैं, लेकिन उसके आंसुओं ने कभी शिकायत नहीं की, ‘नाईका के जन्म होने की खुशी, उसके बचपन का वह चुलबुलापन, गणेशु की मृत्यु, कोठी में नौकरों संग पलती निक्कू, पानी की गागर उठाए निक्कू।’ नायिका के बचपन में मां की व्यथा ने उसे बता दिया कि औरत का दर्जा कभी पिंजरे में बंद तो कभी दिल को घाव बना सकता है। कितना मौन है औरत का वजूद, लेकिन फिर कहीं पुरुष संसार में उसे सामान्य पति के कंधे और आंखों में विश्वास मिला, तो वह धर्म सिंह के आंगन में चिंतामुक्त हो गई। उसका संघर्ष बाप के चौपाल से है, तो पति धर्म सिंह के घराल से प्रेम है। लेखिका ने महलों के समक्ष झोंपड़ी का सुकून पेश करते हुए बता दिया कि मेहमाननवाजी का घर होता है, लेकिन कमरे नहीं और न ही दौलत के दरवाजों को ताले बचा सकते हैं। अंतत: उपन्यास के भीतर महलों के सजे धजे कमरों के आंसू निक्कू के एक कमरे के मकान की किलकारी के आगे हार जाते हैं। वह जीत जाती है जब अशिक्षा के अंधियारों और नीच ऊंच के फर्क को मिटाने के लिए, अपने तर्क, अपने साहस, अपनी सच्चाई, अपनी मानवता और अपने भीतर की बुलंदी को गांव की खुशहाली के लिए जोत देती है। उसने अपने हालात को गरीब नहीं बनने दिया, बल्कि वह उजालों के लिए धूप से लड़ती रही। लेखिका सोच रही है, ‘गेहूं के बाद मक्की और मक्की के बाद फिर गेहूं। जीवन क्या इसी चक्र का नाम है।’ उपन्यास में औरत की परीक्षाएं उसे मजबूत बना रही हैं। यहां शेती की बेटी भले ही छोटी है, लेकिन बड़े और छोटे घर के आंगन के फर्क में अपना संघर्ष जानती है। पात्रों का चयन, उनकी भूमिका का स्थापन, उपन्यास की गति, शब्द व उपमाओं का प्रयोग, प्रसंगों का विवरण, लोक संस्कृति का उन्नयन और लेखन की वजह को प्रासंगिक बनातीं पौमिला ठाकुर पाठक के विवेक पर दस्तक दे रही हैं।                                                        -निर्मल असो

उपन्यास : नायिका
लेखिका : पौमिला ठाकुर
प्रकाशक : स्वयं लेखिका
मूल्य : 250 रुपए


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