भारत में जनसंख्या असंतुलन की समस्या

हमारी आबादी, विशेष रूप से मुस्लिम आबादी को शैक्षिक रूप से उन्नत करने की तत्काल आवश्यकता है। इससे कुल प्रजनन दर और इसलिए जनसंख्या वृद्धि दर को कम करने में मदद मिल सकती है…

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार 1950 से लेकर 2015 तक कुल जनसंख्या में बहुसंख्यक हिंदू आबादी की हिस्सेदारी में 7.82 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में 43.15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कई अन्य देशों में भी, जहां बहुसंख्यक आबादी गैर-मुस्लिम थी, उसकी हिस्सेदारी में कमी आई है और अल्पसंख्यक आबादी जो मुस्लिम है, की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह प्रवृत्ति म्यांमार और नेपाल में भी देखी गई। पाकिस्तान और बांग्लादेश में जहां मुस्लिम खुद बहुसंख्यक हैं, उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है। यानी सवाल अल्पसंख्यकों की आबादी बढऩे का नहीं, बल्कि दुनिया में मुस्लिम आबादी बढऩे का है, जिसका असर यूरोप समेत दुनिया के अधिकांश देशों में देखा जा रहा है। अगर बात सिर्फ भारत की करें तो जहां 1950 में हिंदुओं की आबादी का हिस्सा 84.68 प्रतिशत था, वो 2015 तक घटकर सिर्फ 78.06 प्रतिशत रह गया, जबकि इसी दौरान मुस्लिम आबादी का हिस्सा 1950 में 9.84 प्रतिशत से बढक़र 2015 में 14.09 प्रतिशत हो गया। गौरतलब है कि भारत की कुल जनसंख्या 1951 में 36.1 करोड़ से बढक़र 2015 में 132.29 करोड़ हो गई और इसी तरह हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत सभी समुदायों की आबादी में भी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन खास बात यह है कि मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर अन्य सभी जातीय समूहों से ज्यादा रही है। जबकि, हिंदू आबादी 1951 में 30.57 करोड़ से बढक़र 2001 में 82.75 करोड़ हुई (यानी 2.0 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर), मुस्लिम आबादी 3.55 करोड़ से बढक़र 13.8 करोड़ हो गई (2.75 प्रतिशत की भारी वार्षिक वृद्धि दर), सिखों की जनसंख्या 0.69 करोड़ से बढक़र 1.94 करोड़ हो गई और ईसाइयों की जनसंख्या 0.83 करोड़ से बढक़र 2.41 करोड़ हो गई, यानी 50 वर्षों में क्रमश: 2.09 प्रतिशत और 2.15 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर।

कुछ लोगों का तर्क है कि पिछले दो दशकों में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी हो गई है। हालांकि, यह सच है कि 2001 से 2015 के बीच विभिन्न जातीय समूहों की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है, लेकिन मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि अभी भी अन्य धार्मिक समूहों से बहुत आगे है। हम देखते हैं कि वर्ष 2001 और 2015 के बीच हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर क्रमश: 1.61, 2.17, 1.68 और 1.82 रही। इस रिपोर्ट से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह नैरेटिव फैलाया जा रहा है कि भारत में अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुसलमानों को दबाया और सताया जाता है, लेकिन आंकड़े इस नैरेटिव को पूरी तरह से नकारते हैं।

भारत की जनसांख्यिकी में सामान्य परिवर्तन : गौरतलब है कि भारत में 1951 में कुल प्रजनन दर 5.9 थी, जो 1981 में घटकर 4.80 और 2011 में 2.56 हो गई। हाल ही में आए आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में कुल प्रजनन दर 2.12 तक पहुंच गई है। गौरतलब है कि जनसांख्यिकी सिद्धांत के अनुसार जब किसी देश की कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे गिरती है, तो उस देश की जनसंख्या कुछ समय बाद घटने लगती है। इसलिए प्रजनन दर का 2.12 तक पहुंचना जनसंख्या के लिए खतरे की घंटी है। पिछले कुछ समय से भारत में कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट के कारण अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि हम ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं, जहां से कुछ समय बाद वास्तविक जनसंख्या में कमी आनी शुरू हो जाएगी। गौरतलब है कि चीन में ऐसी स्थिति पहले ही आ चुकी है। यूरोप के कई देश भी इसी स्थिति से गुजर रहे हैं। अफ्रीका के बाद भारत भी उन चंद देशों में शामिल है, जहां जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, लेकिन अब भारत में भी जनसंख्या में कमी आने की आशंका जताई जा रही है। लेकिन ऐसे में पीएमईएसी की रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि भले ही आने वाले समय में कुल जनसंख्या में कमी आएगी, लेकिन उसमें भी हिंदुओं की जनसंख्या, जो पहले से ही आनुपातिक रूप से कम हो रही है, इसमें निरपेक्ष रूप में भी कमी होनी शुरू हो सकती है, जबकि मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि जारी रहेगी। हम कह सकते हैं कि हिंदू जनसंख्या के नुकसान की भरपाई मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि से होगी।

शिक्षित वर्ग की जनसंख्या में गिरावट की संभावना : जनगणना और अन्य रिपोर्टों से पता चलता है कि निरक्षर और कम शिक्षित महिलाओं में कुल प्रजनन दर 2011 में 3.17 रही। लेकिन स्नातक या उससे ऊपर की महिलाओं में प्रजनन दर जो 1991 में 1.62 थी, 2011 में घटकर 1.40 रह गई और अभी भी इसमें और गिरावट की पूरी संभावना है। इसी तरह, स्नातक से कम शिक्षित अन्य महिलाओं में भी प्रजनन दर अपेक्षाकृत कम होती है। यदि हम शिक्षा के मामले में विभिन्न धार्मिक समूहों की तुलना करें, तो यह स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय अभी भी हिंदुओं की तुलना में कहीं अधिक पिछड़ा हुआ है और इसलिए संभावना है कि मुस्लिम आबादी में वृद्धि जारी रहेगी, जबकि हिंदू आबादी में गिरावट आ सकती है। उल्लेखनीय है कि 2001 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं में साक्षरता दर 65.8 प्रतिशत थी, जबकि मुसलमानों में यह केवल 59.1 प्रतिशत थी। अगर हम उच्च शिक्षा की बात करें तो हम देखते हैं कि 2001 में 18 से 25 वर्ष की आयु वर्ग में मुस्लिम समुदाय में स्नातक और अधिक शिक्षित लोगों की संख्या केवल 6.7 प्रतिशत थी, जबकि हिंदुओं में यह 12.5 प्रतिशत थी। शिक्षा और कुल प्रजनन दर के बीच संबंधों को देखते हुए, हम सहज रूप से कह सकते हैं कि कम शिक्षित मुस्लिम महिलाएं अधिक बच्चों को जन्म देती हैं, जबकि अधिक शिक्षित महिलाओं में प्रजनन दर कम होती है। यानी मुस्लिम आबादी में वृद्धि और हिंदू आबादी में कमी को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शिक्षा के स्तर में अंतर से भी समझाया जा सकता है।

संतुलन कैसे लाया जाए : एक आम धारणा है कि मुसलमान अपनी परंपराओं, दर्शन और धार्मिक मान्यताओं के कारण बड़े परिवार रखते हैं। अतीत में गरीब हिंदू भी यह मानते थे कि बच्चे भगवान की देन हैं, लेकिन अधिकांश मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के कारण अभी भी उसी पर विश्वास करते हैं (यानी बच्चे अल्लाह की देन हैं)। हमने देखा है कि आर्थिक समृद्धि, शैक्षिक विकास और चिकित्सा विज्ञान में प्रगति और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ, जन्म दर, मृत्यु दर और जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि दर सभी में कमी आ रही है। विभिन्न धार्मिक समूहों में शैक्षिक और आर्थिक मानकों में अंतर भी विभिन्न जातीय समूहों में प्रजनन दर और जनसंख्या वृद्धि में अंतर को स्पष्ट करता है। जनसंख्या असंतुलन को ठीक करने की आवश्यकता है। जनसंख्या संतुलन के लिए निम्नलिखित कुछ सुझाव हो सकते हैं : सबसे पहले, हमारी आबादी, विशेष रूप से मुस्लिम आबादी को शैक्षिक रूप से उन्नत करने की तत्काल आवश्यकता है। इससे कुल प्रजनन दर और इसलिए जनसंख्या वृद्धि दर को कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरा, अभी भी एक संभावना हो सकती है कि जब तक हम उच्च शिक्षा मानकों तक नहीं पहुंच जाते, या उसके बाद भी धार्मिक मान्यताओं और मनोविज्ञान के कारण जनसंख्या में वृद्धि जारी रहे, इससे निपटने के लिए हम जनसांख्यिकीय लक्ष्यों को प्राप्त करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन और हतोत्साहन का उपयोग कर सकते हैं। तीसरा, पिछले कुछ समय से जनसंख्या नीति पर बहस चल रही है। जनसंख्या संतुलन प्राप्त करने और आर्थिक, शैक्षिक तथा सामाजिक मानकों के दृष्टिकोण से भविष्य की जनसंख्या को उन्नत करने के लिए जनसंख्या नीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। परिवार को सीमित करने हेतु कुछ कानूनी प्रावधान भी इस दिशा में समाधान दे सकते हैं।

डा. अश्वनी महाजनकाले

ज प्रोफेसर


Keep watching our YouTube Channel ‘Divya Himachal TV’. Also,  Download our Android App