महाराणा प्रताप : हिंदू कुल का मान रखने वाले

By: Jun 8th, 2024 12:30 am

महाराणा प्रताप (जन्म : 9 मई 1540 ई., मृत्यु : 29 जनवरी 1597 ई.) का नाम भारतीय इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रतिज्ञा के लिए अमर है। वे उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है जब मेवाड़ की शौर्य भूमि पर ‘मेवाड़ मुकुट मणि’ राणा प्रताप का जन्म हुआ। वे अकेले ऐसे वीर थे जिसने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं की। वे हिंदू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है…

प्रताप और चेतक

भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। कहा जाता है कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था। कुछ लोकगीतों के अलावा हिन्दी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता ‘चेतक की वीरता’ में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है। हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

परिचय

राजस्थान के कुम्भलगढ़ में राणा प्रताप का जन्म सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदय सिंह एवं माता रानी जीवत कंवर के घर 9 मई, 1540 ईस्वी को हुआ था। रानी जीवत कंवर का नाम कहीं-कहीं जैवन्ताबाई भी उल्लेखित किया गया है। वे पाली के सोनगरा राजपूत अखैराज की पुत्री थीं। प्रताप का बचपन का नाम ‘कीका’ था। मेवाड़ के राणा उदय सिंह द्वितीय की 33 संतानें थीं। उनमें प्रताप सिंह सबसे बड़े थे। स्वाभिमान तथा धार्मिक आचरण उनकी विशेषता थी। प्रताप बचपन से ही ढीठ तथा बहादुर थे। बड़ा होने पर वे एक महापराक्रमी पुरुष बनेंगे, यह सभी जानते थे। सर्वसाधारण शिक्षा लेने से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी।

राज्याभिषेक

प्रताप सिंह के काल में दिल्ली पर मुगल बादशाह अकबर का शासन था। हिन्दू राजाओं की शक्ति का उपयोग कर दूसरे हिन्दू राजाओं को अपने नियंत्रण में लाना, यह मुगलों की नीति थी। अपनी मृत्यु से पहले राणा उदय सिंह ने अपनी सबसे छोटी पत्नी के बेटे जगमल को राजा घोषित किया, जबकि प्रताप सिंह जगमल से बड़े थे। प्रताप सिंह अपने छोटे भाई के लिए अपना अधिकार छोडक़र मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे, किंतु सभी सरदार राजा के निर्णय से सहमत नहीं हुए। अत: सबने मिलकर यह निर्णय लिया कि जगमल को सिंहासन का त्याग करना पड़ेगा। प्रताप सिंह ने भी सभी सरदार तथा लोगों की इच्छा का आदर करते हुए मेवाड़ की जनता का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार किया। इस प्रकार बप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण कीर्ति की उज्ज्वल पताका, राजपूतों की आन एवं शौर्य का पुण्य प्रतीक, राणा सांगा का यह पावन पौत्र विक्रमी संवत 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 (तारीख 1 मार्च सन 1573 ई.) को सिंहासनासीन हुआ।

मानसिंह से भेंट

शोलापुर की विजय के बाद मानसिंह वापस हिंदुस्तान लौट रहा था। तब उसने राणा प्रताप से, जो इन दिनों कमलमीर में थे, मिलने की इच्छा प्रकट की। कमलमीर उदयपुर के निकट 3568 फुट ऊंची पहाड़ी पर बसा हुआ एक ऐतिहासिक स्थान है। यहां प्रताप ने हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात अपनी राजधानी बनाई थी। चित्तौडग़ढ़ के विध्वंस (1567 ई.) के पश्चात उनके पिता राणा उदय सिंह ने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया था, किंतु प्रताप ने कमलमीर में रहना ही ठीक समझा, क्योंकि यह स्थान पहाड़ों से घिरा होने के कारण अधिक सुरक्षित था। कमलमीर की स्थिति को उन्होंने और भी अधिक सुरक्षित करने के लिए पहाड़ी पर कई दुर्ग बनवाए। अकबर के प्रधान सेनापति आमेर नरेश मानसिंह और प्रताप की प्रसिद्ध भेंट यहीं हुई थी, जिसके बाद मानसिंह रुष्ट होकर चला गया और मुगल सेना ने मेवाड़ पर चढ़ाई की।

हल्दीघाटी

उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सडक़ से कुछ दूर हटकर पहाडिय़ों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास प्रसिद्ध वह स्थान है जहां 1576 ईस्वी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। इस स्थान को गोगंदा भी कहा जाता है। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे जिन्हें मुगल बादशाह की मैत्रीपूर्ण दासता पसंद न थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसके फलस्वरूप मानसिंह के भडक़ाने से अकबर ने स्वयं मानसिंह और सलीम (जहांगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी। हल्दीघाटी की लड़ाई 18 जून 1576 ईस्वी को हुई थी। राजपूताने की पावन बलिदान-भूमि के समकक्ष, विश्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं है। उस शौर्य एवं तेज की भव्य गाथा से इतिहास के पृष्ठ रंगे हैं। भीलों का अपने देश और नरेश के लिए वह अमर बलिदान राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम इतिहास और वीरकाव्य का परम उपजीव्य है।


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