चुनाव के परिणाम का परिणाम

भाजपा को ‘तीस’ का महत्व समझ आ गया होगा, क्योंकि अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस को पता चल गया होगा कि उसके लिए यात्रा अभी लंबी है…

लोकसभा के लिए हुए चुनाव के परिणाम आ गए हैं, लेकिन उस परिणाम के परिणाम पर बहस जारी है जो कुछ महीनों तक चलती रहेगी। उसकी खबरें बनती रहेंगी। खबर को देखने, समझने और व्याख्या करने की दृष्टि हर वर्ग की अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए सामान्य व्यक्ति के लिए तो मात्र यही खबर पर्याप्त है कि नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। लेकिन राजनीति से जुड़े अथवा उससे जुड़े लोगों से भी ज्यादा रुचि लेने वाले जागृत किस्म के लोगों के लिए यह कोई खबर ही नहीं है। उनके लिए खबर रहेगी, चार सौ पार करते करते तीन सौ भी पार नहीं कर सके। लेकिन एक वर्ग के लिए इस खबर की भी अपनी सीमा है। वह वर्ग सत्ता पक्ष का विपक्ष होता है। उसके लिए मोटी खबर होगी कि जनता ने सत्ता पक्ष को नकारा। लेकिन एक वर्ग पत्रकारों का भी होता है। मैं स्वयं को भी उसी में शामिल करता हूं। मुझे इस मुहल्ले में घुसने का अवसर उन दिनों के जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी ने दिया था, लेकिन पत्रकारिता के सूत्र दिल्ली में उस समय के हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के सम्पादक डा. रवीन्द्र अग्रवाल ने सिखाए थे। पत्रकार जब उनके पास अपनी खबर लिख कर ले जाते थे तो वे उसे पढक़र अक्सर पूछा करते थे कि इसमें खबर क्या है? पत्रकार की एक और समस्या है। कोई जीत जाए, उसकी व्याख्या भी पत्रकार के पास है और वही शख्स हार जाए तो उसकी व्याख्या भी पत्रकार के पास सुरक्षित है, या यूं कहिए कि उसको करनी ही है। यही पत्रकारिता का तकाजा भी है। अकादमिक जगत में जिसे रिसर्च टूल्ज कहा जाता है, वे रिसर्च टूल्ज पत्रकार के पास भी होते हैं, जिनकी मदद से वह हर किस्म की व्याख्या करता है। पत्रकार के पास ‘हर मर्ज की एक ही दवा’ के अनुसार वह दवा या रिसर्च टूल आंकड़े हैं। वह आंकड़ों की सहायता से हर संकटमयी हालत में व्याख्या करता है।

उदाहरण के लिए यदि उसे जीती हुई पार्टी को धकियाना ही है तो सीधे गणित के सूत्रों की सहायता से व्याख्या करनी होती है। उदाहरण के लिए यदि जीतने वाली पार्टी ने चालीस प्रतिशत मत प्राप्त किए हों और हारने वाली दस पार्टियों ने सब मिला कर साठ प्रतिशत प्राप्त किए हों तो व्याख्या सीधी सपाट होगी, देश की साठ प्रतिशत जनता ने नकारा। एक और उदाहरण लिया जा सकता है। पंजाब में अकाली दल ने पहली बार अपने बलबूते चुनाव लड़ा। अकाली दल को एक सीट पर जीत मिली, लेकिन भारतीय जनता पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी। अब खबर दो प्रकार से हो सकती है। अकाली दल ने तो फिर भी अपनी साख बचा ली लेकिन भाजपा का तो सूपड़ा साफ हो गया। लेकिन यही व्याख्या दूसरे प्रकार से भी हो सकती है। अकाली दल को सभी तेरह सीटों पर कुल मिला कर 13.42 फीसदी वोट मिले जबकि भारतीय जनता पार्टी को 18.62 प्रतिशत वोट मिले। इसको आधार बना कर खबर का रंग ही बदल सकता है। अकाली दल तेरह प्रतिशत के आसपास सिमटा, जबकि भाजपा उन्नीस प्रतिशत का आंकड़ा छूने के नजदीक पहुंच गई। यदि हिमाचल के चुनाव परिणाम की व्याख्या करनी हो तो ‘राज्य में सरकार के बावजूद कांग्रेस औंधे मुंह गिरी। चारों लोकसभा सीटें भाजपा ने झटकीं।’ लेकिन व्याख्या दूसरी तरह भी हो सकती है। ‘विधानसभा की असल लड़ाई में भाजपा को कांग्रेस ने सिखाया सबक।’ विधानसभा चुनाव में होते हैं जनता के असल मुद्दे। यह तो रही शब्दों की जादूगरी, जिससे कुछ छिप जाता है और कुछ दिख जाता है। लेकिन असल में क्या है, यह प्रश्न अपने आप में सचमुच टेढ़ा है। यहां फिर एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है कि असल क्या है और भ्रम क्या है। असल तो यही है कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन रहे हैं। लेकिन फिर पूरे देश में से केवल चार सीट जीतने वाली लालू यादव की पार्टी भी कह रही है कि भाजपा ने जनादेश खो दिया है, उसका अर्थ क्या है? सारे देश में से दो-तीन सीट जीत सकने वाली सीपीएम भी कह रही है कि वही देश के लोगों की नब्ज को ठीक तरह से पढऩा जानती है। दिल्ली में सातों सीटों पर हारने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी बार बार कहते हैं कि वे देश के एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों के प्रतिनिधि के तौर पर मार्गदर्शन कर रहे हैं।

उनकी पार्टी उस प्रदेश में हार गई जहां उनकी सरकार है और 117 में से 92 विधायक हैं। देश पर लम्बे अरसे तक राज करने वाली पार्टी कांग्रेस को केवल 99 सीटें मिलीं, फिर भी वह डंके की चोट पर कह रही है कि 342 सीटें जीतने वाली भाजपा को देश के लोगों ने नकार दिया है। लेकिन मूल प्रश्न फिर वहीं का वहीं खड़ा है। चुनाव परिणाम क्या हैं? क्या सचमुच भारतीय जनता पार्टी हारी है? क्या सचमुच कांग्रेस जीती है? भाजपा अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी, यह सत्य है। यहां ‘अपने बलबूते’ की व्याख्या करना जरूरी है। भाजपा के जो सहयोगी दल हैं, यथा जेडीयू, टीडीपी और आरअलडी, इनके पास जो सीटें आई हैं (12, 16, 2), उनमें टीडीपी को छोड़ दिया जाए तो बाकी दो दलों की सीटों को जिताने में नरेन्द्र मोदी की भूमिका ही प्रमुख है। टीडीपी को भी भाजपा का साथ मिल जाने से कुछ लाभ यकीनन हुआ है। इसलिए कहा जा सकता है कि भाजपा की अपनी 240 सीटें अपने बलबूते की ही हैं। लेकिन क्या कांग्रेस की 99 सीटें उसके अपने बलबूते की सीटें हैं। उत्तर प्रदेश से जितनी सीटें उसे मिली हैं, उसमें अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की बहुत बडी भूमिका है। तमिलनाडु में उसे जो कुछ मिला है, वह डीएमके के प्रभाव के कारण सम्भव हो पाया है। यदि कांग्रेस की शुद्ध अपने बलबूते प्राप्त की गई सीटों की गिनती करें, तो वह साठ-सत्तर के आसपास आकर टिकती है। भाजपा की 242 और कांग्रेस की 70-70 के बीच बहुत बड़ा अंतर है। लेकिन भाजपा ने अपने बलबूते 370 पार का नारा दिया था और वह 242 तक ही पहुंच पाई है, इसलिए ऊपर से देखने पर यह पराजय लगने लगती है। लेकिन एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सामान्य भाषा और राजनीति की भाषा में बहुत अंतर होता है। कोई भी राजनीतिक दल जब चढ़ाई शुरू करता है, तो वह लोगों को यही बताता है कि वह चोटी पर चढऩे की यात्रा के लिए निकला है।

यदि वह ऐसा नहीं कहेगा तो वह आम जनता में अपने लिए विश्वास जागृत नहीं कर सकता। उसे अपनी सही ताकत का स्वयं अंदाजा होता ही है। लेकिन उसे जन विश्वास जागृत करने के लिए राजनीतिक भाषा का ही इस्तेमाल करना होता है। यही कारण है कि सारे देश में से लगभग निष्कासित की जा चुकी कम्युनिस्ट पार्टी भी यह दावा करती है कि वह इस देश की नब्ज को पहचानती है। नब्ज पहचानने का दावा वह करती है, लेकिन देश के लोग उसे अपनी नब्ज पर हाथ नहीं रखने देते। कम्युनिस्ट पार्टी का देश भर में दायरा पांच सीटों के आसपास सिमट गया है, लेकिन वह फिर भी चिल्लाती है कि देश ने नरेंद्र मोदी की सरकार को नकार दिया है। अरविंद केजरीवाल का तो मैंने ऊपर जिक्र किया ही है। उसे जेल में से बाहर निकलने के लिए, बार-बार आवेदन करने के बावजूद जमानत न मिलने के बाद भी पूरा विश्वास है कि सारे देश की धडक़न उसी पर लगी हुई है। यही राजनीतिक विश्वास और राजनीतिक भाषा का हुनर है। लेकिन राजनीतिक विश्वास सच्चाई से बहुत दूर नहीं निकल जाना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो वह मुंगेरी लाल के हसीन सपने बन जाते हैं। भाजपा की 242 और कांग्रेस की 99 सीटों में यही अंतर है। जाहिर है कि भाजपा को ‘तीस’ का महत्व समझ आ गया होगा, क्योंकि अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है और कांग्रेस को पता चल गया होगा कि उसके लिए यात्रा अभी लंबी है। इसी बीच यदि भाजपा ने तीस के महत्व का सही विश्लेषण कर लिया तो सोनिया परिवार के लिए सत्ता प्राप्त करने की यात्रा और लंबी हो जाएगी।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com


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