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अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे कि एमनेस्टी इंटरनेशनल व एशिया वॉच इत्यादि संस्थाएं विश्व स्तर पर हल्ला मचाना शुरू कर देती हैं। इन संस्थाओं को इन शैतानों के अधिकारों की चिंता ज्यादा रहती है तथा सैनिक जो खून से लथपथ होकर इनका सामना करते-करते शहादत पा लेते हैं, उन पर उनका ध्यान नहीं जाता… मानव अधिकारों की

ऐसा करने से एक तरफ  किसान को पानी का मूल्य अदा करना पड़ेगा तो दूसरी तरफ  किसान को मूल्य अधिक मिलेगा और उसकी भरपाई हो जाएगी। लेकिन तब हम आप शहरी जनता को महंगा अनाज खरीदना पड़ेगा। इसलिए अंततः प्रश्न यह है हम सस्ते अनाज के पीछे भागेंगे अथवा प्रकृति को संरक्षित करते हुए थोड़ा

समाज में बढ़ता नशा पंचायतों की गैर जिम्मेदारी वाली कार्यप्रणाली का नतीजा है। जनता को न्याय मुहैया करवाना केवलमात्र पुलिस का काम नहीं है। पंचायतों को भी पुलिस के समान अधिकार मिले हुए हैं, मगर उनकी पालना कौन करे? पंचायत प्रतिनिधियों में मनोबल की कमी ज्यादा है। नतीजतन गांवों में एकता, भाईचारा, सद्भाव, अपनापन खत्म

डा. जयंतीलाल भंडारी विख्यात अर्थशास्त्री इस समय जब सरकार कोविड-19 की चुनौतियों के बीच राजकोषीय घाटे की चिंता न करते हुए विकास की डगर पर आगे बढ़ते हुए दिखाई दे रही है, तब कई बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित किए गए विभिन्न आर्थिक पैकेजों के क्रियान्वयन पर

न तो कांग्रेस में और न ही कम्युनिस्टों में इतनी शक्ति बची है कि वह नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ खुल कर जनता के बीच जा सकें। इसलिए इन्होंने यह आंदोलन बहुत ही सफाई से भारतीय किसान यूनियन को आगे करके शुरू किया। लेकिन आम आदमी पूछ सकता है कि क्या कांग्रेस को इस

समाज में प्रतिभाशाली, शिक्षित तथा व्यवहार कुशल लोगों को समाज सेवा के माध्यम से राजनीति के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यह दीन-दुखियों, पीडि़तों, वंचितों तथा शोषितों  के आंसू पोंछने  का एक माध्यम है। संपूर्ण हिमाचल प्रदेश में 17, 19 तथा 21 जनवरी 2021 को पंचायती चुनाव रूपी एक पंचवर्षीय महायज्ञ हो रहा है। इसमें

इस तरह के दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं का कारण भी यही है कि दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। अगर हम संसद की बात करें तो वहां भी कई सदस्यों का व्यवहार निर्लज्जता की श्रेणी में आता है। संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जा रहा है तथा सदन में पर्चे फाड़े

खिलाड़ी को तैयार करने में प्रशिक्षक की भूमिका जब बेहद जरूरी है तो फिर हम उसे सामाजिक व आर्थिक रूप से निश्चिंत कर शारीरिक व मानसिक पूरी तरह अपने प्रशिक्षण पर केंद्रित क्यों नहीं होने देते। भर्ती-पदोन्नति नियमों में संशोधन होना चाहिए… जब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ी करोड़ों लोगों में स्वयं व अपने

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रयोग के कारण अब इनसान के बजाय मशीनें आपस में ज्यादा बातें करेंगी और प्राइवेसी की समस्या और भी गहराएगी। यहां तक तो ठीक था, पर अब हमारी निजता ही नहीं, हमारा धन भी चोरों-ठगों-हैकरों के निशाने पर है। हम जानते हैं कि कुछ माह पूर्व दक्षिण कोरिया की लगभग आधी