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घरेलू और विदेशी बाजार में ज्वेलरी डिजाइनिंग एक बेहतर कैरियर विकल्प के तौर पर उभर रहा है। शुरुआत में आप 8000 से 10000 रुपए प्रति माह कमा सकते हैं। इसके अलावा प्राइवेट एक्सपोर्टिंग हाउसों में एक ज्वेलरी डिजाइनर अच्छे वेतनमान के साथ-साथ दूसरी सुविधाएं भी पाता है। हिमाचल में लगभग 5000 लोग ज्वेलरी डिजाइनिंग के

अजीत जैन का जन्म 23 जुलाई, 1951 को उड़ीसा में हुआ। वह बर्कशायर हाथवे कंपनी के लिए कई बीमा कारोबारों का नेतृत्व कर रहे हैं। अजीत जैन ने वर्ष 1972 में इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नोलॉजी खड़गपुर से ग्रेजुएशन और साथ में इंजीनियरिंग में बैचलर डिग्री प्राप्त की। उनके क्लासमेट के अनुसार अजीत ने कभी भी

मैं मैरीन इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहता हूं। कृपया मार्गदर्शन करें। चेतन, कांगड़ा मैरीन इंजीनियरिंग यांत्रिक इंजीनियरिंग की ही एक शाखा है, जो नॉटिकल आर्किटेक्चर तथा विज्ञान से जुड़ी हुई है। मैरीन इंजीनियरिंग में बीई इस क्षेत्र में कैरियर बनाने हेतु मूल योग्यता है। मैरीन इंजीनियरिंग में बीई करने के लिए 12वीं की

इस इंस्टीच्यूट की शुरुआत वर्ष 1971 में हुई थी। यह संस्थान राज्य के प्राचीन संस्थानों में से एक है। सालों से यह संस्थान लीगल एजुकेशन में शिक्षा दे रहा है। इस संस्थान का उद्देश्य छात्रों को अच्छी शिक्षा प्रदान करना है और बेहतर लॉ प्रोफेशनल के रूप में उनका विकास करना है। यह संस्थान बार

आपके द्वारा भेजे गए लेखों में से मात्र एक को चुना गया है। हमारा विषय था, ‘ हिमाचल में कैसे हो विदेशियों की सुरक्षा ’ भारत में अतिथि सत्कार इस के सांस्कृतिक धरोहर के आदर्श वाक्य %अतिथि देवो भव% की भावना पर आधारित है। जहां यही बात उसे सांस्कृतिक रूप में विश्वपटल के शिखर पर

क्या है खूबियां वैक्सिंग या थे्रडिंग के जरिए अनचाहे बालों को दूर करना कई बार काफी पेनफुल होता है, जैसे अंडर आर्म्स का हिस्सा काफी नाजुक होता है। कभी-कभार वैक्सिंग के जरिए वहां के हेयर्स निकालते हुए खून भी निकल आता है। ऐसे में आईपीएल तकनीक का प्रयोग राहत भरा होता है, क्योंकि इससे न

गतांक से आगे… कुल्लू की वेशभूषा कुल्लू क्षेत्र की महिलाओं का परिधान सदियों पुराना है। उसमें किसी तरह का अंतर नहीं आया है। परिवर्तन के नाम पर आजकल के पट्टू अधिक हल्के और अधिक रंगीन हो गए हैं। पट्टू का मूल और पुराना नाम झीकड़ है। आजकल भी बिस्तर पर बिछाने और ओढ़ने के पट्टू

परवर्ती हिमालयी क्षेत्रों में कृषि के कम होने का सर्वप्रमुख कारण वृष्टिछाया है। लाहुल-स्पीति, किन्नौर तथा कुल्लू, चंबा व शिमला के बहुत बड़े भाग वृष्टिछाया क्षेत्र में पड़ते हैं। यहां वर्षा का औसत बिलकुल ही निम्न है। ये क्षेत्र नवंबर से लेकर मार्च तक बर्फ व ओलावृष्टि से ढके रहते हैं। जबकि ये पांच महीने

प्रदेश में लकड़ी की नक्काशी की परंपरा बहुत प्राचीन है। यह बहुत कुछ पुराने मंदिरों से सुरक्षित है, जो किसी न किसी तरह मौसमों के उतार-चढ़ाव और समय की मार से बच गए हैं। नक्काशी किए हुए दरवाजे, खिड़कियों की चौखटें, अग्रभाग, बारजे, पट्टियां आदि इस कला के ऊंचे सौंदर्य को दर्शाते हैं। धातु के