आस्था

आयुर्वेद में गाय के घी को अमृत समान बताया गया है।  अगर गाय के घी को नियमित रूप से अपने भोजन में शामिल किया जाए तो इससे वजन भी नियंत्रित रहता है और किसी भी प्रकार की बीमारी भी नहीं लगती। देशी घी का मतलब है गाय के दूध से बना शुद्ध घी, जो कि

हस्तरेखा में बिंदु का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। सफेद बिंदु हमेशा ही उन्नतिकारक माने गए हैं। लाल रंग के बिंदु बीमारियों के सूचक हैं और पीले रंग के बिंदु रक्त में कमी को दर्शाते हैं परंतु काले बिंदु या तिल लक्ष्मीदायक होते हैं। यदि हाथ बंद करने पर हथेली का तिल मुट्ठी में बंद रहता

कई हजार लोगों मे कुछ लोगों के ऐसे अनुभव भी रहे हैं कि किसी दिन उन्होंने महसूस किया कि वे अपने शरीर से बाहर थे और हल्के हो कर हवा में तैर रहे थे। वे अपना शरीर पड़ा हुआ देख रहे थे और वह सब कुछ भी खुली आंखों से देख रहे थे जो वहां

गरुड़ बुद्धिमान और शक्तिमान पक्षी है। यह बौद्ध मत में कहा गया है ,पर हमारे हिंदू मत में भी वह भगवान विष्णु का वाहन है । गरुड़, का शिकार सर्प है इस लिए उसे शक्तिशाली माना जाता है । उसकी उड़ान की ऊंचाइयां अन्य पक्षी नहीं ले पाते इस लिए पक्षी समाज में  भी वह

हम खुद को ऐसे शहर में या ऐसी जगह में घूमते हुए देखते हैं जहां हमारा जाना  नहीं हुआ  होता पर फिर भी लगता है कि पहले हम कभी यहां आए हैं… आपने अपने जीवन में भी पाया होगा कि कुछ स्वप्न अंतराल ले कर बार-बार आते हैं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जिनका

कनैडियन प्राविंस एक ऐसा क्षेत्र है जो बाढ़ से तबाह हुआ। इस क्षेत्र में नदी के किनारे रहने वाले समुदाय बसते थे। ये नौ समुदाय थे जिनकी फली-फूली हुई संस्कृति थी। इस क्षेत्र की स्थापना 1700 में हुई और तब से अंत होने तक ये लोग यहीं रहे। सन 2009 में एक शौकिया फोटोग्राफर  लुइस

षड्चक्र शक्ति संचरण के एक व्यवस्थित, सुनिश्चित क्रम को कहते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र में विद्युत, ध्वनि, प्रकाश सभी रूपों में शक्ति के संचार क्रम की व्याख्या चक्रों (साइकिल्स) के माध्यम से ही की जाती है। इन सभी रूपों में शक्ति का संचार, तरंगों के माध्यम से होता है। एक पूरी तरंग बनने के क्रम को

ऐसे तीर्थों में कोकामुख प्रमुख है, इसका परिचय मैं पहले ही करा चुका हूं। कोकाकुख में मैं  सदा विद्यमान रहता हूं… मेरी भक्ति से प्रेरित होकर, मेरे निकट, मेरे मंदिर या मूर्ति के सामने नृत्य करने वाला अगले जन्म में सम्राट बनता है और फिर उस जन्म में जो मन लगाकर मेरी भक्ति करता है,

अन्तःकरण (मन, बुद्धि आदि) तो वेदाध्ययन, यज्ञ, नाम-जाप और कठोर योगाभ्यास के बाद ही शुद्ध होते हैं। जैसे यजुर्वेद मंत्र 19/39 में कहा पुनन्तु मा देवजनाः अर्थात जब जीव वेद के विद्वान से संपर्क बनाता है तो विद्वान अपनी विविध अपनी विविध प्रकार की वैदिक शिक्षाएं देकर उसके अंतःकरण को शुद्ध कर देता है। अथर्ववेदइ