लेकिन शहर को नहीं खबर

तो हिमाचल छोटे-मोटे गांवों से बना राज्य है,लेकिन विकास की अंधी दौड़ गांवों को दीमक की भांति खोखला कर रही है। ग्रामीणों में शहर की तरफ भागने की होड़ सी लगी हुई है। विडंबना यह है कि न तो राज्य सरकार, न शहरी विकास विभाग और न ही नगर एवं ग्राम…

सात शहरों को बन रही योजना

नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग श्रमशक्ति के लिहाज से बेहतर कार्य कर रहा है। स्टेट टाउन प्लानर एएन गौतम के मुताबिक विभाग संबंधित क्षेत्रों में अवैध निर्माण शुरू होते ही काम को रोक देता है। टीसीपी महकमा वर्तमान में प्रदेश के सात नए शहरों के लिए…

निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दों की हवा

राज्य निर्वाचन आयोग ने चार दिसंबर को नगर निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी कर कार्यक्रम तय कर लिया है। इसी के साथ हिमाचल के 48 नगर निकायों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। स्थानीय निकाय चुनाव में सबसे अहम मुद्दा सीवरेज, बेहतर जलापूर्ति,…

नगर निकाय कहीं हक न छीन लें

हिमाचल में गांवों से पलायन बढ़ने से शहरों का विस्तार जोर पकड़ने लगा है। ग्रामीण हमेशा ही शहरी निकाय में जुड़ने का विरोध करते आए हैं। नगर निकाय में ग्रामीण क्षेत्रों के शामिल हो जाने से ग्रामीणों के सारे अधिकार छिन जाते हैं। दूसरा पहलू यह भी…

छोटे-मोटे मामले प्रधान के हवाले

भारतीय संविधान ने पंचायत प्रधान से लेकर नगर निकाय अध्यक्षों को विकास के साथ-साथ छोटे-मोटे विवादों को निपटाने की शक्तियां दी हैं। पंचायत प्रधान संबंधित क्षेत्र में दीवानी व फौजदारी से जुड़े छोटे मुकदमों को निपटा सकता है। इसका मकसद पंचायत…

डेढ़ साल से धूल फांक रही शहरीकरण योजना

हिमाचल में गत एक दशक से शहरीकरण ने रफ्तार पकड़ी है। इससे शहरों की संख्या में भी वृद्घि हो रही है। गौर करने वाली बात यह है कि नगर एवं ग्राम नियोजन महकमा सुनियोजित विकास के लिए जो भी प्रस्ताव सरकार को भेजता है, वह लंबे समय तक कागजों में धूल…

घाटे में चल रहे स्थानीय निकाय

प्रदेश के अधिकतर स्थानीय निकाय घाटे में चल रहे हैं। शहरी निकायों की आमदनी अठन्नी तथा खर्चा रुपया होने से इनका घाटा बढ़ता जा रहा है। इन्हें स्वयं ही बजट जेनरेट करना पड़ता है,राज्य सरकार की ओर से नाममात्र बजट ही निकायों को दिया जाता है। सरकार…

तपोवन में सत्र का कितना तप

तपोवन (धर्मशाला) में स्थापित किया गया विधानसभा परिसर अब राजनीतिक मजबूरी बन गया है। भले ही वर्ष 2005 में तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने इस परिसर का निर्माण कांगड़ा की अनदेखी के आरोपों के चलते किया था, मगर अब यह कांग्रेस ही नहीं भाजपा के लिए भी…

कटौती सरकारी निर्देश नहीं

 दि. हिः विधानसभा में खर्च कटौती क्यों?  तुलसी रामः खर्चे में कटौती के किसी तरह के सरकार से निर्देश नहीं मिले हैं। कटौती का प्रयास हमने अपनी तरफ से शुरू किया है। इसके चलते विस स्टाफ भी कम ले जाएंगे। यह सारा तामझाम जनता के पैसों से होता…

खर्च कटौती की असलियत

तपोवन (विधानसभा) में वर्ष 2008 में आयोजित किए गए शीतकालीन सत्र पर लगभग 80 लाख रुपए का खर्च आया था। पिछले वर्ष यह दर 46 लाख के आसपास बताई गई। अब इसे कम करके लगभग 36-37 लाख रुपए करने की कवायद है। राज्य सरकार ने उन्हीं सचिवों व अफसरों को…

कोशिशें और कामयाबी

वर्ष 2008 में भाजपा की सरकार बनने के बाद विधानसभा सत्र में होने वाले खर्च पर सरकार ने जमा-जोड़ शुरू किया। इस दौरान दो बार विधानसभा सत्र तपोवन में हुए। एक बार दो बैठकें तथा दूसरी बार छह बैठकें की गईं। दोनों ही सत्रों में 80 लाख के आसपास धन…

धर्मशाला ज्यादा खर्चीला

राजधानी में विधानसभा सत्र के दौरान मात्र विधायकों, मंत्रियों और पत्रकारों तथा प्रशासनिक अमले के खाने, आवाजाही व डीए पर ही खर्च किया जाता है। खाने पर प्रति व्यक्ति 500 रुपए प्रतिदिन, आवाजाही पर दस रुपए प्रति किलोमीटर तथा विधायकों, मंत्रियों…

जल्दबाजी में उठाया कदम

कांगड़ा जिला मुख्यालय में विधानसभा की स्थापना कर भले ही तत्कालीन सरकार ने विपक्ष द्वारा लगाए गए क्षेत्रवाद के ठप्पे को हटाने के लिए बड़ा कदम उठाया हो, लेकिन नगरोटा बगवां के पूर्व विधायक राम चंद भाटिया इसे कांग्रेस सरकार द्वारा जल्दबाजी में…

घर द्वार मिले सरकार

धर्मशाला में विधानसभा भवन तैयार करके उसमें शीतकालीन सत्र चलाना पूरे हिमाचल को एक सूत्र में बांधना तथा निचले क्षेत्र की जनता को सरकार तथा प्रशासन के नजदीक लाकर उनकी समस्याओं का समाधन करना सराहनीय है।  विधानसभा का नाता भले ही आम व्यक्ति से…

हर सत्र धर्मशाला में हो

सब लोग शिमला नहीं जा सकते हैं। इसलिए प्रदेश की जनता की इच्छा के अनुरूप ही धर्मशाला में विधानसभा का शीतकालीन सत्र लगाने का फैसला लिया गया है। विशेषकर चंबा, पांगी, कांगड़ा के सुदूरवर्ती क्षेत्र मंडी, कुल्लू, हमीरपुर, ऊना की जनता को शिमला न…