कुदरत के स्वर्ग में यमराज

कल-कल बहती नदियों और खूबसूरती से लदे पहाड़ों पर मेहमान रोमांच नहीं करेंगे तो कुदरत के इस शृंगार का क्या फायदा। हिमाचल में यह आकर्षण नहीं होगा तो पर्यटक यहां आएंगे ही क्यों। जरूरत है तो सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था और सुविधाएं बढ़ाने की। यदि यह सब…

पूरी व्यवस्था पर दोष मढ़ना गलत

पर्यटन निदेशक मोहन चौहान का का कहना है कि हिमाचल में हर साल औसतन सवा से डेढ़ करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं। इनकी सुरक्षा व सुविधा के लिए हर संभव कदम उठाए जाने का प्रयास रहता है। यदि किसी आर्गेनाइजेशन या प्रोजेक्ट की खामी से कोई हादसा पेश आ जाए…

पावर प्रोजेक्टों के पास आपदा प्रबंधन प्लान ही नहीं

* सतलुज की बाढ़ के बाद कभी नहीं हुए ड्रिल * जिला आपदा प्रबंधन प्लान के साथ प्रोजेक्ट प्लान मैच जरूरी प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील हिमाचल में जो प्रोजेक्ट स्थापित हुए हैं, उनमें से ज्यादातर के पास आपदा प्रबंधन प्लान ही…

रणनीति पर अमल नहीं

पर्यटन सीजन से पूर्व ही पुलिस व पर्यटन महकमा परिवहन विभाग के साथ संयुक्त बैठकें करता है। सभी पर्यटक स्थलों पर यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए कदम उठाए जाते हैं। जिला प्रशासन से भी ये बैठकें होती हैं। जहां पर्यटकों को ऊंचे दामों…

नया आकर्षण बढ़ाया जाए

हिमाचल में नए पर्यटन आकर्षण बढ़ाने की आवश्यकता है। नयनादेवी रोप-वे के साथ-साथ बिजली महादेव, जाखू रोप-वे आदि हिमानी रोप-वे योजना के साथ-साथ अन्य कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जो पर्यटकों का आकर्षण बन सकते हैं। नदियों व खड्डों किनारे ही ऐसे सुरक्षित…

बेसिन स्तर पर रिपोर्ट बनाने की जरूरत

विशेषज्ञों की राय में जब तक प्रदेश में बेसिन-वाइज आपदा प्रबंधन के लिए अध्ययन नहीं होता, इसका माइक्रो व मेक्रो स्तर पर प्लान तैयार नहीं कर लिया जाता, संबंधित तीनों ही सरकारी एजेंसियों के बीच कब और कैसा समन्वय स्थापित रहेगा, इस पर तवज्जो नहीं…

बचाव कार्यों में पिटा पहाड़

हिमाचल भूकंप व प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील राज्यों में शुमार है। वर्ष 2000 व 2004 में सतलुज ने जो रौद्र रूप दिखाया था, उसे पूरा देश नहीं भूल सकता। बावजूद इसके हिमाचल में आपदा प्रबंधन की व्यवस्था अभी भी सवाल खड़े करती है। दावे…

प्रयोग होते रहे, दिक्कत किसी ने नहीं समझी

सत्तासीन सरकारों ने प्रदेश में चाय बागीचों के विकास के लिए कई ऐलान किए। इनके रखरखाव के साथ-साथ नए बागीचों को तैयार करने के लिए सुविधाएं शामिल थीं। इसके तहत कृषि विभाग ने भी प्रयास आगे बढ़ाए, मगर ये सिरे नहीं चढ़ सके। कारण वही कि मार्केटिंग…

खुशबूदार पर दानेदार नहीं

हिमाचल में चाय की जो खेती हो रही है, वह चाइना हाईब्रिड प्रजाति की पौध है। इसकी चाय खुशबूदार तो होती है, मगर दानेदार नहीं। जबकि दार्जिलिंग व असम में दानेदार चाय का उत्पादन होता है। स्तरीय लोगों में ही इस चाय की डिमांड रहती है। जो महंगी होने…

10 साल में बिके छह टी गार्डन

चाय बागीचों की प्रदेश में बिक्री का कोई भी पुख्ता आंकड़ा राजस्व विभाग के पास नहीं है। हालांकि पालमपुर में प्रशांत भूषण से संबंधित मामला अभी भी विवादित है। यह टी-गार्डन की जमीन बताई जाती है, जिसे आगे उन्हीं की सोसायटी को दे दिया गया।…

कागजों से बाहर नहीं निकली योजना

वर्ष 2008-09 में चाय बागानों को बढ़ावा देने के लिए एक योजना भी बनाई गई थी। इसके तहत चंबा व अन्य पहाड़ी इलाकों में चाय की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी थी, मगर यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल सकी। ट्रायल के तौर पर चंबा व धर्मशाला के कुछ…

कांगड़ा चाय की पतझड़ जारी

जिस चाय की चुस्की से अंग्रेजों की सुबह होती थी, आज वही कांगड़ा चाय गुमनामी के अंधेरों में उजाले की तलाश कर रही है। वक्त के थपेड़ों और आसान होती जिंदगी ने पहाड़ की पत्ती को ऐसे धक्का दिया कि बागान के बागान उजड़ गए, उत्पादक कंगाल हो गए, कल तक…

उजड़े चाय बागानों के लिए लाएंगे पालिसी

अब तक कितने हेक्टेयर पर टी गार्डन उजड़ गए हैं? जहां उजड़ गए हैं, वहां सरकार नए सिरे से क्या करने जा रही है? कौल सिंह : इस बारे में जल्द एक पालिसी लाने जा रहे हैं। मंत्रिमंडल में चर्चा के बाद इसे अनुमोदित किया जाएगा। चाय बागान उजड़ने…

चंबा में 3200 हेक्टेयर पर होगी खेती

कांगड़ा चाय की महक से अब चंबा की घाटियां लबरेज होंगी। चंबा जिला के विभिन्न क्षेत्रों में चाय उत्पादन के लिए 3200 हेक्टेयर भूमि का चयन किया गया है। चंबा में चाय की खेती को पंख लगने से कांगड़ा चाय के कम हो रहे उत्पादन में आने वाले दिनों में…

उजड़े बागीचों को बेच नहीं सकते

हिमाचल में उजड़े चाय बागीचों की खरीद-फरोख्त पर पूर्णतय प्रतिबंध है। उजड़े चाय बागीचों की जमीन भी नहीं बिक सकती। हालांकि ऐसे भी कई मामले आए हैं, सरकार ने जब विशेष परिस्थितियों में इन्हें बेचने की अनुमति दी है। इनमें जमीन की किस्में भी बदल दी…