विचार

लो जी! बरसात आ गई! अब बरसात में साल भर पेड़ काटने वाले कंधों पर कुदाल हाथ में मोबाइल ले जहां भी जगह मिलेगी वहीं पौधे लगाने निकल पड़ेंगे। वे पौधा एक लगाएंगे तो उसके साथ सेल्फी दस खिचवाएंगे। लो जी! बरसात आ गई! जिन सरकारी ठेकेदारों द्वारा कराए सरकारी निर्माणों की पेमेंट उनको हो चुकी है, वे आसमान में बादलों के न गरजने के बाद भी मोर बन नाचने लगेंगे। जिन सरकारी ठेकेदारों को उनके द्वारा कराए निर्माणों की पेमेंट अभी अटकी है वे बरसात से दोनों हाथ जोड़ प्रार्थना करेंगे कि हे बरसात! जब तक उनके द्वारा कराए सी ग्रेड सरकारी कामों की सरकार से पेमेंट नहीं हो जाती तब तक बरसना मत प्लीज! सच कहें तो इस निर्माण में हमें कुछ भी नहीं बचा है। ऊपर से नीचे तक इतना चढ़ावा चढ़ाना पड़ा है कि कुछ खाने के बदले उलटा अपनी जेब से लगाया है ताकि उन्हें लगे कि वे सरकार के विकासात्मक हाथों के साथ अपना हाथ मिला देश को गिरा रहे हैं। ऐसे में जो उनके द्वारा बना

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप पर कातिलाना हमला किया गया। वह बाल-बाल बच गए। हमलावर को भी वहीं ढेर कर दिया गया। यह अमरीका ही नहीं, दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह किसी भी लोकतंत्र में हो सकता है। कोई भी अतिवाद या उग्रवाद ऐसे हमले के लिए उकसा सकता है। इस पर गहन चिंतन-मनन, आत्ममंथन किया जाना चाहिए। अमरीका लोकतंत्र की जननी है। उसका लोकतंत्र प्राचीनतम है, लेकिन वहां बंदूक भी गोली-बिस्कुट और मूंगफली की तरह उपलब्ध है। औसतन हर हाथ में बंदूक, रिवॉल्वर है। अमरीका आत्म-रक्षा की दलीलें देता रहा है, लेकिन लोकतंत्र के साथ-साथ बंदूक-संस्कृति भी जारी है, यह विरोधाभास कैसे ढोया जा रहा है? लोकतंत्र में यह हत्यारा विरोधाभास भी मौजूद रहेगा, जो आने वाले किसी भी पल

चुनावी जीत के मायनों में सराबोर राजनीति के लिए बढ़ता स्थान दरअसल जनता में संकीर्णता पैदा कर रहा है। सत्ता की बढ़ती मर्जी में जनता की ख्वाहिशों का चित्रण, पुन: राज्य की हकीकत में झांक रहा है, तो फैसलों के पक्ष में तर्क बदलेंगे और कसौटियां भी नए मानदंडों में कसी जाएंगी। कुछ इसी तरह का फैसला 125 यूनिट बिजली की सीमा तक मुफ्तखोरी पर जब उकसा रहा था, हम तब भी हार रहे थे क्योंकि ऐसी कोई मांग जनता ने तो नहीं की थी। अगर तब गारंटियों के युद्ध में मुफ्त

जैविक रसायन, प्लास्टिक और ईवी से संबंधित उपकरणों सहित चीन से आयात प्रतिस्थापन के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआई) शुरू की जानी चाहिए। साथ ही रोजगार सृजन को बढ़ावा देना होगा...

साहित्येतिहास के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी भाषा तथा साहित्य का विश्वकोश भी तैयार किया जो एटलांटिक पब्लिशर्ज से दो खंडों में प्रकाशित हुआ। इसमें हिंदी के अनेक लेखकों की प्रविष्टियां हैं। प्रेमाख्यानों से संबंधित लगभग दो सौ प्रविष्टियां मेरी भी हैं। डा. गुप्त का देहावसान 21 मई 1996 को बीकानेर में हुआ...

हाल ही में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप पर जानलेवा हमला हुआ है। इसमें वो बाल बाल बच गए। सारी दुनिया ने इस हमले की घोर निंदा की है। इस हमले की वजह क्या रही, इसकी सच्चाई जांच से ही पता चलेगा, लेकिन ट्रंप पर हुए हमले ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की सुरक्षा की पोल खोल दी। वहां की खुफिया एजेंसियों की नाकामी भी सामने आ गई है।

पता नहीं बड़े साहिब ने मौसम फिल्म के लिए गुलज़ार का लिखा गाना ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन’ सुना है या नहीं, पर बड़े साहिब जब भी किसी मीटिंग की अध्यक्षता करते हैं, फुर्सत के रात दिन जीने लगते हैं। आधे घंटे की मीटिंग जब चार घंटे बाद खत्म होती है तो बाहर निकलने पर बाकी अफसरों पर हमदर्द का चुस्ती-फुर्ती लाने वाला टॉनिक सिंकारा भी काम नहीं करता। बेचारे निढाल से निकलते हैं मीटिंगों से। कुछ मरे-मरे से, कुछ बुझे-बुझे से। पर बड़े साहिब हैं कि उतने ही तरोताज़ा होते हैं जितना मीटिंग में जाने से पहले होते हैं। बिल्कुल ताज़ा गुलाब की तरह। ख़ुशबू भले न हो, पर बड़े साहिब खिले-खिले तो वैसे ही लगते हैं। यूं भी आदमी चाहे बड़ा उम्र के हिसाब से हो या पद के हिसाब से, जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है उसकी ख़ुशबू गायब होती जाती है। मीटिंगें

आम चुनाव के कुछ ही समय बाद देश के कुछ राज्यों में विधानसभाओं के उपचुनाव हुए। इन उपचुनावों में कांग्रेस और इसके साथी राजनीतिक दलों को अच्छी जीत और भाजपा को निराशा हाथ लगी। हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र में हर चुनाव में ऊंट किस करवट बैठ जाए अर्थात मतदाता किसके सिर जीत का ताज सजा दे, यह कोई पता नहीं, लोकतंत्र में मतदाता सर्वोपरि होता है।

कितनी मिट्टी खोदी होगी, कितने अवसर दफन हुए होंगे, जब जनादेश के गणित में उपचुनावों की मंडी में हम, आप और हमारा संताप हाजिरी लगा रहा था। इस बार हिमाचल के उपचुनाव एक कड़वी दास्तान, महंगी सहूलियत और लोकतांत्रिक विडंबना माने जा सकते हैं। राजनीतिक जरूरतें कितनी बढ़ गईं कि एक साथ नौ विधानसभा क्षेत्रों में फिर से मतदाताओं की कतारें लग गईं। सवाल अनेक, दोष एक कि हमें मतदाता और बेशकीमती मत के बावजूद हार, हताशा और हतप्रभ होने के लिए राजनीतिक चरित्र हमेशा पहले से और भौंडा, अप्रीतिकर और असंगत हो गया। ये उपचुनाव कितने जमा व कितने के भ्रम में कहता, सुनाता और लोरियों के मौसम में हमारी चेतना सुलाता रहा। हम जागे नहीं, सोए-सोए वोट देते रहे, क्योंकि देश में चौथे ऐसे प्रदेश के बाशिंदे हैं जहां प्रतिव्यक्ति राज्य की उ