इस नृत्य का आयोजन भूत-प्रेतों को भगाने और प्राकृतिक प्रकोपों को हटाने के लिए किया जाता है। इस लोक नृत्य में सभी नर्तक मुखौटा पहनकर नाचते हैं। नर्तकदल में से दो नर्तक शेर का मुखौटा पहनते हैं। इस नृत्य में शेष नर्तकदल इन दो शेरों को काबू करने का प्रयत्न करते हैं, जिसका स्पष्ट अभिप्राय यही है कि भूत-प्रेत और आपत्ति को वीरता से काबू में किया जा सकता है…
गतांक से आगे …
लामा नृत्य :
लामा या प्रेम नृत्य किन्नौर के आदिवासी भिक्षुओं में अधिक लोकप्रिय हैं। इस नृत्य का आयोजन भूत-प्रेतों को भगाने और प्राकृतिक प्रकोपों को हटाने के लिए किया जाता है। इस लोक नृत्य में सभी नर्तक मुखौटा पहनकर नाचते हैं। नर्तकदल में से दो नर्तक शेर का मुखौटा पहनते हैं। इस नृत्य में शेष नर्तकदल इन दो शेरों को काबू करने का प्रयत्न करते हैं, जिसका स्पष्ट अभिप्राय यही है कि भूत-प्रेत और आपत्ति को वीरता से काबू में किया जा सकता है। इस लोक नृत्य के साथ ढोल,लामा नरसिंगे और शहनाई बजाए जाते हैं। लाहुल-स्पीति के क्षेत्रांे मंे भी यह लोक नृत्य लोकप्रिय हैं।
थरक्याङ नृत्य :
इस नृत्य में थर (बाघ) की तरह नर्तक लोक तीव्र गति से नाचते हुए आगे कदम बढ़ाते हैं और पीछे हटते हैं। इसके नृत्य गीत भी नाटी की तरह ही होते हैं। इस नृत्य में बोचीं नाटी का लोकगीत गाया जाता है। प्रायः यह नृत्य तभी प्रदर्शित होता है, जब कोई शिकारी बाघ को मारता है। ऐसे अवसर पर शिकारी के सिर पर वीरता की प्रशंसा के लिए पगड़ी बांधी जाती है और बाघ की खाल में भूसा भरकर उसे नचाया जाता है।
नागन कायङ नृत्य :
यह नृत्य अधिक लोकप्रिय नहीं। कुछ विशेष जगहों पर इसका प्रदर्शन होता है। चगोव, फुल्याच या ऐराटड, मेलों में यह नृत्य कभी प्रदर्शित होता है। इस नृत्य में एक विशेष व्यक्ति कंडे की देवी नागिन बन जाता है और हाथ में पानी से भरा ‘क्रो’ दिया जाता है। इससे गिरा हुआ पानी सौभाग्य चिन्ह समझा जाता है। इसलिए इस जल को अपने शरीर पर गिराने के लिए अन्य नर्तक सर्प की तरह नाचते हुए नागिन के पास जाते हैं।
मकर नृत्य :
इसी प्रकार मकर नृत्य में नर्तक मुख पर मुखावरण पहनते हैं। शरीर पर लंबा चोला पहनते हैं, जिसके बाजू लंबे होते हैं। इस पहनावे में नर्तक का कोई भी अंग दिखाई नहीं देता है। इस नृत्य के साथ एक कथा भी जुड़ी है। भोटा राजाओं में लंग दर्मा राजा बहुत अत्याचारी था। उसने हिमाचल प्रदेश के धर्म और संस्कृति को नष्ट करने में कोई भी कसर न उठा रखी थी। उसने अनेक बौद्ध-बिहार, पुस्तकालय नष्ट किए। पंडित और लामा मौत के घाट उतारे। उस समय विजय उत्सव हो रहा था तो उसमें यह मकर नृत्य भी हो रहा था। यह लाहौल स्पिति का लोकप्रिय नृत्य समझा जाता रहा है। इस नृत्य में लामा लोग ‘गिथर उत्सव पर नाचते हैं’। नर्तक लोग खुकरी के साथ नाचते हैं।
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