सच्चरित्र मानव

अवधेशानंद गिरि

जब तक सृष्टि है तब तक विषमता का रहना सर्वथा अनिवार्य है। प्रकृति, स्वभाव एवं व्यवहार आदि की इस विषमता में भी जो समता देखता है,उसके मन में व्यवहार भेद होने पर भी राग द्वेष या मोह-घृणा का अभाव होता है। जो तमाम भेदों को एक ही शरीर के विभिन्न अंगों तथा अवयवों के भेदों की भांति मानकर सबके सुख में सुखी और सबके दुख में दुखी होकर यथायोग्य-यथासाध्य अपने निज दुख का निवारण करता है, वही यथार्थ मानव है।

जब मानव का ‘स्व’ अत्यंत विस्तृत होकर प्राणिमात्र में फैल जाता है तब उसे सर्वत्र एकात्म भाव के दर्शन होते हैं। तब व्यवहारादि में भेद रहते हुए भी उसके समस्त आचरण देह के विभिन्न अवयवों के समान हित करने और सबको सुखी करने वाले शरीरधारी की भांति प्राणिमात्र के लिए हितकर तथा सुखोत्पादक हो जाते हैं।

संसार में जो भय, संदेह, अशांति, दुख एवं क्लेश आदि का उद्भव तथा विस्तार होता है, उसमें प्रधान कारण इस ‘स्व’ एवं ‘मैं’ का संकोच ही है। ‘स्व’ शरीर और नाम से जकड़ा हुआ है। इसीलिए मानव को शरीर दिया गया है कि वह सब प्राणियों को अपनी आत्मा में समझे और अपनी आत्मा को सब जीवों में देखे।

इस प्रकार जगत के लघु-विशाल समस्त प्राणियों में आत्मनुभूति करके सबको सुख पहुंचाने वाला सच्चरित्र मानव ज्ञानी मानव है। जब तक सृष्टि है तब तक विषमता का रहना सर्वथा अनिवार्य है। नन्हीं सी चींटी के साथ भी एक सा व्यवहार सिर्फ  आत्मदृष्टि से ही संभव है।

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