आस्था

गुरु पूर्णिमा अथवा व्यास पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को कहा जाता है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की लाखों श्रद्धालु परिक्रमा देते हैं। बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं क्योंकि आज के दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था। ब्रज में इसे ‘मुडि़या पूनों’ कहा जाता है। आज का दिन गुरु-पूजा का दिन होता

चौपाई श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥ तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥ तुम अनाथ के नाथ गुंसाई। दीनन

देवभूमि हिमाचल में देवी-देवताओं के पूजन के लिए अलग-अलग स्थानों पर तौर-तरीके भी अलग-अलग ही हैं। बात संक्रांति की हो या किसी त्योहार या रीति-रिवाज की अपने देवता के प्रति लोगों की आस्था सहज ही झलक पड़ती है। देवभूमि में कुछ ऐसे धार्मिक आयोजन भी हैं, जो पूर्ण रूप से परंपरा से जुड़े हैं और

भगवान शिव के देशभर में असंख्य मंदिर हैं। इन सब में 12 ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्त्व है। सोमनाथ को प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। श्रावण में इसके दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की खूब भीड़ लगती है। यह ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र नगर में समुद्र तट के समीप स्थित है। सोमनाथ का शाब्दिक अर्थ है

आपने ऐसे कई मंदिरों के बारे में सुना होगा, जिनके बारे में मान्यताएं प्रचलित हैं कि वहां साक्षात भगवान का वास होता है, लेकिन क्या आपने कभी ये सुना है कि भगवान का बसेरा किसी तालाब आदि में भी हो सकता है। जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं। अब इतना तो सब जानते ही

बाबा हरदेव गतांक से आगे… जब वह उस तार के ऊपर सहज भाव से चलता जाता है, तभी वास्तव में उसकी ज्यादा जय-जयकार होती है। इसी तरह से इस मार्ग के ऊपर भी जो चल पड़ता है, उसको भी संसार में यश प्राप्त होता है। भक्त का ऐसा ही जीवन होता है। वह आठों पहर

स्वामी विवेकानंद गतांक से आगे… इन प्रश्नों के उत्तर में संपूर्ण संसार के पर्यटन एवं अनुभव के पश्चात मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि उनका केंद्र हमारा धर्म है। यही भारतवर्ष है जो अनेक शताब्दियों तक शत-शत विदेशी आक्रमणों के आघातों को झेल चुका है। यही वह देश है जो संसार की किसी भी चट्टान

ओशो कहीं न कहीं यह भय है, जो मुझे संकीर्ण, कठोर, दुःखी, हताश, क्रोधित और आशाहीन कर जाता है।  और यह इतना सूक्ष्म लगता है कि मैं किसी तरह भी इससे संबंधित नहीं हो पाता। मैं इसको और अधिक स्पष्टता से कैसे देख सकता हूं? उदासी, चिंता, क्रोध, क्लेश और हताशा, दुख के साथ एकमात्र

स्वामी रामस्वरूप श्रीकृष्ण गीता के कई श्लोकों में स्वयं को ब्रह्मवस्था में ईश्वर कह रहे हैं। फलस्वरूप ही अर्जुन भक्ति प्रेम में मग्न होकर श्रीकृष्ण महाराज के वचनों को ही कह रहे हैं कि हे कृष्ण मैं आपकी बात को मानता हूं। पुनः श्लोक 10/12 में आगे अर्जुन श्रीकृष्ण महाराज को कह रहे हैं कि