प्रो. चंद्ररेखा : रचना-धर्मिता की अंतर्वस्तु

प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल

मो.-9418111108

रचना-धर्मिता व्यक्ति सापेक्ष है। परंतु उससे कहीं ज्यादा समय, स्थान व समाज सापेक्ष है। साहित्य स्व का विस्तार है और इस विस्तार में रचनाकार परिवेश को स्वयं में समाहित करते हुए, खुद परिवेश में समाहित हो जाता है। परस्पर निर्भरता और अभिन्नता दोनों चीजें हैं। इसलिए यह तो तय है कि मानवीय सुख-दुःख और संघर्ष के प्रति संवेदनशील दृष्टि के अभाव में लेखन संभव नहीं है और यदि है तो सार्थक नहीं है। जो दूसरों से संबद्ध है वह दूसरों पर आश्रित भी है। उपजीव्य यदि समाज है तो क्रिया की प्रतिक्रिया भी इसी समाज से अपेक्षित है… सामाजिक स्वीकार व समर्थन रचनाकार की जरूरत है। क्योंकि यह समर्थन लोक तक उसकी पहुंच को मजबूत करता है… मैं यह मानती हूं कि कला व साहित्य के संवर्धक, प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा दिया गया प्रोत्साहन पुरस्कार, रचयिता के लिए सुखद व आश्वस्तकारी है। इसलिए सराहनीय है। मैं हिमाचल कला, संस्कृति, भाषा अकादमी के प्रति आभार व्यक्त करती हूं कि उन्होंने मेरी पुस्तक का संज्ञान लिया और उसे अपनी पुरस्कार सूची में शामिल किया। सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के  संज्ञान से रचना की सम्प्रेषणीयता बढ़ती है। रचना के प्रति जिज्ञासा बढ़ने से पाठक संसार में वृद्धि होती है। और लेखकीय मंतव्य की पहुंच का दायरा विस्तृत होता है। आज के समय में लेखन तथा प्रकाशन के हक में स्थितियां बेहतर हुई हैं। परंतु पढ़ने की प्रवृत्ति कम हुई है। कारण बहुत सारे हैं। मोबाइल व इंटरनेट के प्रति रुझान है, तो बाजार, सत्ता व तथाकथित अनुष्ठानात्मक धर्म का तिलिस्म भी है, जिनका संचालन व्यक्ति को उपभोक्ता, मतदाता तथा केवल और केवल विवेकहीन अनुयायी बनाने की फितरती कवायद में है। गंभीर साहित्य व चिंतन -मनन के प्रति उदासीनता के मूल में यही वजह मुख्य है। ऐसी स्थितियों में पुस्तकों को दिया जाता महत्त्व बहुत खास हो जाता है। लेखकों की पुस्तकें खरीद कर उन्हें विभिन्न पुस्तकालयों तक पहुंचाने का कार्य भी अकादमी करती है। बहुत जरूरी है कि अकादमी की गतिविधियों में निरंतरता बनी रहे। पिछले कुछ वर्ष किन्हीं कारणों से, पुरस्कार योजना स्थगित रही। मुझे दुःख है कि कितने ही महत्त्वपूर्ण लेखक और उनकी कृतियां अकादमी द्वारा दिए जाते प्रेरणात्मक सम्मान से वंचित रह गए। इसलिए यह नैरंतर्य बना रहना आवश्यक है। आभार ज्ञापन के साथ-साथ भविष्य के लिए शुभकामनाएं भी देना चाहूंगी। ‘अक्खर-अक्खर जुगनू’ 2015 में प्रकाशित मेरी पहली पुस्तक है। इसमें 60 कविताएं युक्त छंद में तथा 48 कविताएं गतिछंद में अर्थात गेय हैं। सामाजिक विसंगतियों तथा मन की बेचैनियों का रूप-स्वरूप विश्लेषित करते हुए सही स्थिति व मनस्थिति के संकेत देने की कोशिश की है। इस पुस्तक की पहली समीक्षा ‘दिव्य हिमाचल’ समाचारपत्र में ओंकार सिंह द्वारा की गई। पुस्तक समीक्षा, रचनाकार और पाठक के बीच कड़ी बनती है। समीक्षक पुस्तक की भाषा शैली के प्रमाण में विश्लेषित करते हुए निहितार्थ को उद्घाटित करता है। सामाजिक संदर्भों में उसकी विवेचना में उसे समसामायिक मूल्यों के आधार पर परखता है। उसकी उपयोगिता को रेखांकित करता है। उसके प्रयासों से पुस्तक अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचती है… यद्यपि मेरा अधिकांश लेखन हिंदी भाषा में है। परंतु पहाड़ी भाषा के प्रति सहज आकर्षण तो है ही। मैं यह महसूस करती हूं कि जीवन के सत्य और मर्म को अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता इस भाषा के शब्द भंडार तथा मुहावरे में है। लोकोक्तियों तथा लोकगीतों में इसका भाव सौंदर्य मुखर हुआ है। जो सर्वाधिक लोकगीतों तथा गाथाओं में परिलक्षित हुआ है। उस शब्द सागर, शिल्प व स्वर  को आने वाली पीढि़यों के लिए सहेजने का एक विनम्र, सांझा प्रयास श्री जन्मेजय सिंह गुलेरिया तथा मैंने ‘लोकभाव स्वरांजली भाग एक तथा भाग दो’ के रूप में किया है… 2016 में हिंदी कविताओं का संग्रह ‘जरूरत भर सुविधा’ पुस्तक प्रकाशित हुई और 2019 में कहानी संग्रह ‘सीवनें उधड़ती हुई’ तथा उपन्यास ‘समय मेरे अनुरूप हुआ’ नामक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। इन पुस्तकों की चर्चा व समीक्षा ने मुझे उत्साहित तो किया ही, साथ ही पाठकों तथा समीक्षकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौती भी सामने रखी है… साहित्य अकादमी ने मेरे पहाड़ी भाषा में लिखे कविता संग्रह को संज्ञान देकर विचार विश्लेषण के केंद्र में ला दिया। इसके लिए पुनःधन्यवाद। व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों की विवेचना के अंतर्गत स्त्री, शोषित तथा वंचित के दुःख-संघर्ष को शब्दबद्ध करने तथा सत्य के हिमायती लोगों को बरबस अकेला करते हुए कमजोर करने की साजिशों के विरुद्ध सामर्थ्य पर लिखने की कोशिश मैंने की है… व्यक्ति मात्र को विचार संपन्न तथा विवेकशील बनाने का दायित्व साहित्य का है ताकि वह नकारात्मक हाथों का मोहरा बनने से बचा रहे। स्वतंत्र चेता निर्णायक होकर जी सके। अनिष्ट और काल का पर्यायी बनती भीड़ न हो जाए। जो मानवीय सभ्यता की राह का अवरोध है। निषेध है मानव मात्र के चित्त की उदारता, उसकी उन्नति तथा उड़ान का। ऐसे महान प्रयत्नों में लगे समस्त रचनाकर्मी मेरी प्रेरणा और मेरे लेखन का महत्त्वपूर्ण उपादान हैं।

पुरस्कृत साहित्यकारों की रचनाधर्मिता-2

हाल ही में हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने साहित्यकार गंगाराम राजी, बद्री सिंह भाटिया, प्रो. केशव राम शर्मा, इंद्र सिंह ठाकुर, प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल तथा सरोज परमार को साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित करने की घोषणा की। इन साहित्यकारों की पुरस्कृत रचनाओं के प्रति रचनाधर्मिता क्या रही, संघर्ष का जुनून कैसा रहा, अपने बारे में साहित्यकारों का क्या कहना है तथा अन्य साहित्यकार व समीक्षक इनके बारे में क्या राय रखते हैं, इसी का विश्लेषण हम इस नई सीरीज में कर रहे हैं। पेश है इस विषय में प्रतिबिंब की दूसरी किस्त :

प्रो. चंद्ररेखा के साहित्य पर विद्वानों के विचार

पहाड़ी कविता संग्रहों से गुजरते हैं तो अक्सर कविता की समकालीनता इनसे दूर छिटकी नजर आती है। इस लिहाज से चंद्ररेखा ढडवाल के कविता संग्रह ‘अक्खर अक्खर जुगनू’ को पढ़ना सुखद और आश्वस्तकारी लगता है। कविता, कहानी, गजल, लोक साहित्य जैसे अनेक क्षेत्रों में लगातार काम कर रही चंद्ररेखा ढडवाल इन दिनों हिंदी जगत में एक कथाकार के रूप में सशक्त उपस्थिति दर्ज कर रही हैं। खास तौर पर अपने उपन्यास ‘समय मेरे अनुरूप हुआ’ के माध्यम से। जो इन दिनों खूब चर्चा में है। उनके समूचे लेखन में भाषाई सधेपन के साथ सजग, संवेदनशील और अग्रगामी दृष्टि के साथ समकालीन जीवन की जटिलताओं का महीन विवेचन विशेष रूप से आकर्षित करता है। सुखद यह कि लेखिका जब अपनी लोक भाषा कांगड़ी में कविता करती हैं तो अपनी भाषागत स्निग्धता को न सिर्फ  बचाए रखती हैं, बल्कि लोक की मिठास से उसे और समृद्ध करती हैं। समकालीनता की चुनौती को भी स्वीकार करती हुई उसका बेहतर ढंग से निर्वहन करती हैं। ‘अक्खर अक्खर जुगनू’ की कविताएं इसका प्रमाण हैं। मसलन स्त्री विमर्श या स्त्री स्वातंत्र्य का परिपक्व स्वर। यहां औरत घर की लक्ष्मी कहलाने के अपने रूढ़ मुहावरे को धन स्वामित्व की वंचना से प्रश्नांकित करती है। या जब वह कहती है कि उसकी कविता पुरुष ने ही लिखी-पढ़ी-सुनी, तो वह न सिर्फ  बौद्धिक जगत में स्त्री आवाज का दखल चाहती है, बल्कि नियोजन-निर्धारण में भी स्त्री हिस्सेदारी या हक की बात करती है। जन पक्षधरता का स्वर भी यहां मेरे जैसे पाठक को आश्वस्त करता है। इसके अलावा भी समकालीन और लोक जीवन की अनेक ध्वनियां यहां मौजूद हैं। छंद और मुक्त छंद दोनों ने कविता को संवारा है। यह कविता संग्रह निश्चय ही पहाड़ी कविता यात्रा को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाता है।

-आत्मा रंजन, साहित्यकार

‘अक्खर अक्खर जुगनू’ काव्य संग्रह की कविताएं मानो अक्षर

अक्षर जुगनू बटोर कर, सूर्य की आलोक परिधि में प्रवेश का द्वार खोल देती हैं। संग्रह की एक-एक पंक्ति आधुनिक बोध से संपन्न मूल्यपरक सूक्ति है। लोक भाषा व मुहावरे में सनातन

सत्य की अभिव्यक्ति देखिए : ‘मिट्टिया दे खेलणू राम जी इन्हा टुट्टणा ही टुट्टणा। बगदियां नदियां दा नीर जी समुद्रां पुज्जणा ही पुज्जणा।’ भीड़ में तब्दील होते व्यक्ति को सचेत करती पंक्तियां हैं – ‘जिन्हां दे मनसूबे/सैह नीं करदे वार/नीं खांदे मार/भीड़ उछालयी पत्थर/कनैं लहूलुहान भी भीड़ ही हुंदी।’ 

-भूपेंद्र सिंह, परंपरा व आधुनिक बोध संपन्न पाठक

स्वच्छंद कविता, गीत व गजल विधा की गंगा, जमुना व सरस्वती की त्रिवेणी है चंद्ररेखा ढडवाल का काव्य संग्रह – अक्खर अक्खर जुगनू। गंगा, जमुना की तेज धारा की तरह जहां यह समाज में फैली अव्यवस्थाओं पर प्रहार है, वहीं सरस्वती की तरह, धीर-गंभीर अपने कर्त्तव्यों का वहन करती नारी की कथा, व्यथा, संघर्ष, बलिदान और त्याग की संवेदनाओं से भरी रचनाएं सीधे हृदय तक उतर आती हैं। सभी रचनाओं में इनका मौलिक चिंतन और दर्शन परिलक्षित होता है। पहाड़ी भाषा के शब्द व मुहावरे को अक्षुण्ण रखते हुए। संग्रह के लिए हार्दिक बधाई।

-पवनेंद्र पवन, हिंदी व पहाड़ी गजल के समर्थ हस्ताक्षर

रुचि निर्माण में कई घटनाओं की भूमिका

इंद्र सिंह ठाकुर

मो.-8091733078

मैं सदैव इसी ऊहापोह में रहता हूं कि अपनी बात कहां से शुरू करूं। मेरी साहित्यिक रुचि के निर्माण में अनेक घटनाओं, परिस्थितियों की शीतल-ऊष्ण हवाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राथमिक कक्षा से लेकर मैट्रिक तक का सफर मेरा ग्रामीण परिवेश में रहा। यदा-कदा किसी कवि की कविता को पढ़कर सुनना और सुनाना मुझे प्रीतिकर लगता था। जैसे ही अध्ययन के लिए शहर आया, मेरे मित्रों ने मेरे साहित्य के विद्यार्थी को तराशने का प्रयास किया जिसमें गुरुजनों का आशीष भी रहा। इसी बीच समाज के सफेद-काले चेहरों की रंगत का अनुभव भी समय-समय पर होता रहा, जीवन के बसंत का उल्लास और पतझड़ की नीरसता अब बखूबी समझ में आने लगी थी। इसी बीच बीए की उपाधि भी पूरी हुई। तत्पश्चात एमए की शिक्षा प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में पहुंचा। यहां का उच्च शिक्षित वातावरण मेरे लिए अजूबे से कम नहीं था। विषय विशेषज्ञ आचार्यगण, उनका सोर्स मात्र मन में उमंग पैदा करता था कि मैं भी कविता करूं और रचना की समीक्षा करूं। काल के कपाल में स्वयं को निरखता-परखता कभी गरीबी की हताशा में अपनी कविता को और धारदार बनाने की कोशिश करता, फिर समीक्षक साथियों के मध्य उसे रखता, अपने में एक अलग अनुभूति होती थी। इसी वातावरण में मैं प्रायः सोचता था कि लोग इतने निर्दयी क्यों हो जाते हैं। उधर मेरा संवेदनशील मन चैन नहीं लेने देता, घटनाएं मेरी भावनाओं को झकझोरती और शब्द कलम से फूटकर कविता की सतरंगी धारा बनकर बह निकलती। इसी तरह मेरा कवि मन काव्य की ओर प्रेरित हुआ। मेरा पहला काव्य संग्रह ‘कागज में एक कलम रहती है’ 2005 में प्रकाशित हुआ, जिसमें मेरे बाल कवि से लेकर युवा मन के भावों का समायोजन है। इसी वर्ष मेरी पीएचडी की शिक्षा भी पूरी हुई। अब मैं आलोचना के क्षेत्र में मित्रों के साथ इस विधा के मानदंडों की तलाश में समालोचकों की समालोचना का अध्ययन करने लगा। आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित, आचार्य पूरन चंद टंडन, आचार्य रामसज्जन पांडेय और आचार्य चमन लाल गुप्त जैसे विद्वानों ने मेरी कविता को तराशने का जो कार्य किया, वह मेरे लिए सबसे बड़ा संबल था। इसी बीच मेरी आलोचना की पुस्तक प्रकाशित हुई ‘आठवें दशक की हिंदी कविता’। पुनः आलोचकों ने मेरी कविता को अपनी महीन दृष्टि से नए रूप में लाया और टिप्पणी दी कि कविता में मीटर होना चाहिए, शास्त्र होना चाहिए, छंद होना चाहिए। इसी यात्रा में 2013 में मेरा दूसरा काव्य संग्रह आया ‘तुम ही तो थे’। इस पर मुझे पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पुरस्कार वर्ष 2015 का है क्योंकि 2015 से अकादमी द्वारा कोई पुरस्कार नहीं दिए गए थे। मेरे लिए यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि हिमाचल साहित्य अकादमी ने मेरे काव्य संग्रह को चयनित किया। एक साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मैं यही कहना चाहूंगा कि कदम चूम लेती है ख़ुद आके मंजिल यदि मुसाफिर हिम्मत न हारे। आज साहित्य सर्जना और प्रकाशन द्रुतगति से बढ़ रहा है। साहित्य शिल्पी को यह ध्यान देना बहुत आवश्यक है कि वह समाज को क्या दे रहा है क्योंकि साहित्य समाज का दीपक है और दर्पण भी। कविता इस विधा में अपना प्रभाव शीघ्र रखती है। कविता छोटी हो, किंतु प्रभावशाली, जैसे कबीर और बिहारी के दोहे। यह तभी संभव है जब साहित्यकार शब्द साधक हो, प्रभावशाली शब्द तभी आएंगे जब शब्द साधना होगी। यह मुझे मेरे साहित्यिक आलोचकों ने समय-समय पर कहा। मैं समीक्षा और आलोचना को अधिक पसंद करता हूं। इस विधा से रचनाकार की रचनाधर्मिता को निकट से देखने का अवसर मिलता है।

इंद्र सिंह ठाकुर पर विशेषज्ञों के विचार

‘तुम ही तो थे’-युवा कवि इंद्र का ऐसा कविता संग्रह है जिसमें कहीं हरित वनों को काटे जाने का मुद्दा उठाया है तो कहीं प्रेम की तरंग जो मानव मन को उद्वेलित कर देती है। संग्रह में कहीं न कहीं मानवीय संबंध की बनती-बिगड़ती तस्वीर भी दिखाई देती है।’  

-प्रो. रामसजन पांडेय, पूर्व  विभागाध्यक्ष, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक

‘तुम ही तो थे’ काव्य संग्रह, आज की सदी के लिए एक अलग संदेश देने का काम करता है। वस्तुवादी समाज में आज किसी के पास भी किसी के लिए समय नहीं है, सब अपने-अपने रास्ते, अपने-अपने घरौंदे के निर्माण में लगे हैं। यह किसी को ज्ञात नहीं कि आत्मिक सुख की अनुभूति कहां है, सब भागे हैं एक दौड़ में, जीत किसी की भी नहीं हो रही है। अपने इन गीतों के माध्यम से इंद्र सिंह ठाकुर ने प्रयास किया है कि गीत पढ़कर भागा मानव कुछ ठहरे, सोचने के लिए रुके। यह रुकाव विकास में अवरोध नहीं है, बल्कि उसके अंतर्मन को शांत करने का प्रयास मात्र है। पाठक जब इन गीतों से रूबरू होगा, अवश्य उसे एक अलग अनुभूति होगी।’                                                        

-बलदेव वंशी, साहित्यकार

‘तुम ही तो थे’ युवा कवि इंद्र की इस तीसरे कविता संग्रह में जो कविताएं आई हैं, वे एक ऐसे वातावरण को निर्मित करती हैं, जहां पाठक थोड़ा रुककर सोचता है…कि हम क्या हैं। ‘तू मचलता क्यों नहीं’, ‘कहां बात करूं’ ऐसी कविताएं हैं जो ठहराव के बहाने एक सूत्र को प्रस्तावित करती हैं। देखा जाए तो इंद्र की अधिकांश कविताएं विगत वर्षों में आए कविता-संग्रहों से कुछ अलग हैं।’

-प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, पूर्व विभागाध्यक्ष, लखनऊ विश्वविद्यालय

शब्द सम्राट डा. पीयूष गुलेरी को नमन

श्रद्धांजलि

एक साल पहले इन्हीं दिनों शब्द सम्राट डा. पीयूष गुलेरी का निधन हो गया था। उन्हीं को याद करते हुए हम इस बार उन्हें श्रद्धास्वरूप उनके कृतित्व को याद कर रहे हैं। डा. गुलेरी ने अपने साहित्यिक करियर के शुरुआती दौर में हिंदी, संस्कृत, हिमाचली, डोगरी, पंजाबी, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओं के सम्यक अध्ययन तथा लेखन के बाद हिमाचली, हिंदी एवं डोगरी के बाल साहित्य, गद्य तथा पद्य विधाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। पीएचडी में अपने शोधकार्य में उन्होंने हिंदी साहित्य के अमर कथाकार श्री चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को आधार बनाकर, जो मौलिक एवं प्रामाणिक शोध प्रबंध प्रस्तुत किया, उससे न केवल ‘गुलेरी’ को साहित्य सर्जक, पुरातत्त्ववेत्ता, प्राच्य विद्या विशारद, प्रकांड भाषाविद्, ज्योतिर्विज्ञानी, निबंध लेखक तथा पत्रकार के रूप में पहचान मिली, बल्कि उन्हें भी हिंदी साहित्य जगत में अलग मुकाम हासिल हुआ। बाद में पुस्तक के रूप में प्रकाशित यह शोध प्रबंध पिछले कई दशकों से अनुपलब्ध था, किंतु एनजीओ ‘गुंजन’ के सहयोग से पुनः प्रकाशित यह पुस्तक शोधार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए अब उपलब्ध है। वह पहाड़ी कविता के अग्रणी पुरोधा थे और साल 1969 में पहली मर्तबा पहाड़ी साहित्य के इतिहास में उनका काव्य संग्रह ‘मेरा देश म्हाचल’ प्रकाशित हुआ। वे पहाड़ी भाषा आंदोलन को दिशा देने वाले पहले व्यक्ति थे। बाद में उन्होंने इस पुनीत कार्य में श्री लाल चंद प्रार्थी और श्री नारायण चंद पाराशर के साथ मिलकर पहाड़ी भाषा के साहित्य को नई दिशा एवं दशा प्रदान की। उनके अन्य अहम कार्यों में काव्य संकलन छौंटे, मेरियां गजलां : तेरे गीत, गोर्की की अमर कृति मां का अनुवाद, हिंदी दियां क्हाणियां (अनुवाद) संयुक्त संपादन, किरनी फुल्लां दी, गूंगा हृदय : बहरी पीर, गुलेरी रचना संचयन तथा गुलेरी जी की चर्चित कहानियां शामिल हैं। अपने पारिवारिक दायित्व में उलझे रहने के बावजूद उन्होंने अपनी मेधा, श्रम तथा सतत ऊर्जा से भले ही भाषा तथा साहित्य में अमूल्य योगदान दिया, किंतु समाज ने उन्हें वह स्थान प्रदान नहीं किया, जिसके वह वास्तव में हकदार थे। गुलेरी जी बेहद मिलनसार, हंसमुख और सरल हृदय के स्वामी थे। उनका इस संसार से रुखसत होना सचमुच ही साहित्य जगत के लिए गहन दुख का विषय है। डा. गुलेरी की सेवाओं को याद करते हुए हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुशील कुमार फुल्ल कहते हैं कि उन दोनों की दोस्ती पांच दशक से अधिक पुरानी थी, जब दोनों सन् 1967 में जालंधर के राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में एलटी के छात्र थे। डा. गुलेरी के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए डा. फुल्ल कहते हैं कि उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, जालंधर से साठ के दशक में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘पर्वत की गूंज’ में पहाड़ी कविता को नई पहचान प्रदान की। गुलेरी जी अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन साहित्य जगत आज भी उन्हें याद करता है।                      

-फीचर डेस्क

धर्म की निर्देशिका के रूप में पुस्तक

‘धर्म-ॐ-हिंदुत्व : एक प्रस्ताव’ पुस्तक में जातियों के जंजाल को काटकर भाषा की शुद्रता का खात्मा करने का यह पुस्तक सुझाव देती है, समाधान बताती है और धर्म-अध्यात्म की भी भरपूर सीख देती है। आम आदमी या फिर पाठक इस पर क्या अमल करेगा, यह भी शोध का विषय होना चाहिए। किताब के प्रसार व प्रचार से बाहर निकल कर भी एक ग्रंथ लिखा जाना चाहिए, जिसमें सभी तरह के सामाजिक प्राणियों की बाणी को स्थान मिले। धर्म की पोथी वांचने से न तो धर्म, जैसे कि पुस्तक में बताया है कि धर्म का अर्थ अच्छाई और अधर्म का अर्थ बुराई है। तो शेष कार्यों में यह भी शामिल होना चाहिए। पूरी पुस्तक में धर्म-अध्यात्म के विचार का घनत्व अति अधिक है, जबकि विमर्श के लिए जगह कम मिली है। प्रस्तुत ग्रंथ पर टिप्पणी को बहुत कम रास्ता छोड़ा गया है। पठनीयता भी कम की गई है। विज्ञान, धर्म, आधुनिकता-पुरातनता व सनातन संस्कृति को एक हार में जब पिरोया जाए तो संस्कृति बहुरंगी लगती है, लेकिन फूल अगर एक ही किस्म का हो तो विविधता का आकर्षण मारा जाता है। युवा वर्ग को धर्म परायणता के उद्देश्य से शिक्षित करने के लिए लिखी गई यह पुस्तक एक निर्देशिका की तरह काम करती रहेगी, ऐसी मेरा मानना है, जिसमें धर्म से ऊपर उठ कर इन्सानियत को भी महत्त्व दिया गया है।

-ओंकार सिंह

पुस्तक समीक्षा

* पुस्तक का नाम : धर्म-ॐ-हिंदुत्व : एक प्रस्ताव

* प्रकाशक का नाम : श्रीयम् मोहनलाल पी. कापडिया एंड फेमिली चेरीटेबल ट्रस्ट, सूरत, गुजरात

* मूल्य : निशुल्क

निरंतर साहित्य साधना में लीन परमानंद शर्मा

जन्मदिन विशेष

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो चुपचाप साहित्य साधना में लीन रहते हैं और उसी में आनंदोपलब्धि से सराबोर हो जाते हैं। ऐसी ही एक विभूति पंडित परमानंद शर्मा हैं, जिन्होंने पर्यटन नगरी धर्मशाला में रह कर अपने अनेक महत्त्वपूर्ण  ग्रंथों की रचना की। अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, हिमाचली आदि अनेक भाषाओं के ज्ञाता परमानंद शर्मा का जन्म जालंधर जिला के एक गांव घोडि़याल में 17 नवंबर, 1923 को हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। फिर बीए की उपाधि दोआबा कालेज जालंधर तथा एमए अंग्रेजी राजकीय महाविद्यालय लाहौर से सन् 1945 में पास की। पंजाब, हरियाणा, पेप्सू, हिमाचल के राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन के पश्चात सन् 1982 में धर्मशाला कालेज से प्रिंसिपल के रूप में सेवानिवृत्त हुए। अपने सेवा काल में भी शर्मा जी ने हिंदी एवं अंग्रेजी में खूब लिखा और रिटायर होने पर भी प्रचुर मात्रा में सृजन किया। मूलतः देश भक्ति और राष्ट्रवाद के समर्थक शर्मा जी ने प्रबंध काव्य, खंड काव्य एवं मुक्तक कविता का सृजन किया। आदर्शवादी विचारधारा के पोषक कवि ने छत्रपति ग्रंथ की रचना कर हिंदी के रामधारी सिंह दिनकर की परंपरा के कवियों को प्रभावित किया और उन्होंने शर्मा जी की रचनाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की। पंजाब सरकार ने इन्हें सन् 1964 में पंजाब का राज कवि घोषित किया। उनका पहला प्रबंध काव्य छत्रपति साधु आश्रम होशियारपुर प्रेस से छपा और चारों तरफ  युवा कवि की चर्चा होने लगी। छत्रपति महाकाव्य के अतिरिक्त इनका प्रबंध काव्य बैरागी भी काफी प्रसिद्ध हुआ जो बंदा वैरागी के यशस्वी जीवन पर आधारित था। परमानंद शर्मा पिंगल शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान हैं और अनुशासन से लेखन में विश्वास रखते हैं।

-डा. सुशील कुमार फुल्ल