प्रतिबिम्ब

कविता एक सांस्कृतिक व सामाजिक प्रक्रिया है। इस अर्थ में कि कवि जाने-अनजाने, अपने हृदय में संचित, स्थिति, स्थान और समय की क्रिया-प्रतिक्रिया स्वरूप प्राप्त भाव-संवेदनाओं के साथ-साथ जीवन मूल्य भी प्रकट कर रहा होता है। और इस अर्थ में भी कि प्रतिभा व परंपरा के बोध से परिष्कृत भावों को अपनी सोच के धरातल

कविता एक सांस्कृतिक व सामाजिक प्रक्रिया है। इस अर्थ में कि कवि जाने-अनजाने, अपने हृदय में संचित, स्थिति, स्थान और समय की क्रिया-प्रतिक्रिया स्वरूप प्राप्त भाव-संवेदनाओं के साथ-साथ जीवन मूल्य भी प्रकट कर रहा होता है। और इस अर्थ में भी कि प्रतिभा व परंपरा के बोध से परिष्कृत भावों को अपनी सोच के धरातल

‘अक्खरां दे दीये’ नाम से ही किताब की प्रतिबद्धता अपने आचरण की समीक्षा कर देती है। हिमाचली भाषा के उद्गम पर अनुवाद की वैतरणी पार करते कई संगम व स्रोत दिखाई देते हैं। यहां कोई भाषायी नाका नहीं, बल्कि उर्दू शायरी की समीक्षा उस बोली में हो रही है, जो हिमाचली भाषा को समृद्ध करती

प्रकाशक रचना साहित्य एवं कला मंच, पालमपुर की साहित्यिक, सामाजिक संवेदना की त्रैमासिक पत्रिका ‘रचना’ का जुलाई-दिसंबर 2021 विशेषांक आ गया है। मौन साहित्य साध्वी संतोष शैलजा को समर्पित पति-पत्नी कविता विशेषांक बहुत ही आकर्षक है। यह पति-पत्नी के एक-दूसरे के प्रति प्रेम को अभिव्यक्ति देता है। डा. सुशील कुमार फुल्ल इसके संपादक हैं। प्रस्तुत

वार्षिकी : वर्ष 2021 साहित्य की दृष्टि से हिमाचल के लिए कैसा रहा, यह जानने की जब कोशिश हुई तो कई आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए। वैसे कोरोना वायरस के चलते कुछ निष्क्रियता जरूर देखी गई, इसके बावजूद हिमाचल में साहित्य का भरपूर सृजन हुआ, हालांकि अधिकतर गतिविधियां ऑनलाइन ही चलीं। साहित्यिक आयोजनों के तहत कविता

कविता एक सांस्कृतिक व सामाजिक प्रक्रिया है। इस अर्थ में कि कवि जाने-अनजाने, अपने हृदय में संचित, स्थिति, स्थान और समय की क्रिया-प्रतिक्रिया स्वरूप प्राप्त भाव-संवेदनाओं के साथ-साथ जीवन मूल्य भी प्रकट कर रहा होता है। और इस अर्थ में भी कि प्रतिभा व परंपरा के बोध से परिष्कृत भावों को अपनी सोच के धरातल

शिवा पंचकरण मो.-8894973122 कालिदास से लेकर तुलसीदास तक की रचनाएं पढ़ें तो एहसास होता है कि मनुष्य के भाव अपने मूल से जुड़े रहे, लेकिन भाषाएं, बोलियां काल के प्रवाह के साथ मनुष्यों की तरह अपने वस्त्र बदलती रहीं। इसके साथ ही वस्त्र बदले लेखन कला ने, गीत-संगीत ने, कविताओं-कहानियों ने। कई शब्द जुड़े, कई

अर्थ खोजते मजमून, मजबूरियां और मुकाम। सृजन प्रक्रिया में कवि खुद में साक्ष्य खोजता हुआ, लेखन की सार्थकता को परवान चढ़ाता है, ‘बुद्ध आएं, न आएं, सब्जीवाला रामू जानता है – इसी जन्म में, आज के दिन, अभी/बेच देने हैं आलू टमाटर गोभी। संध्या से पूर्व, कर देनी है रेहड़ी खाली।अपनी अनुभूतियों के कंकाल से

ऊना निवासी हिद अबरोल का नज़्म संग्रह ‘ख़्वाबों के पेड़ तले प्रकाशित हुआ है। 232 पृष्ठों पर आधारित यह संग्रह अयन प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। इसकी कीमत 450 रुपए है। शायरी में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रह बेशकीमती है। राशिद जमाल फारूकी इसके विषय में लिखते हैं कि ज़ाहिद अबरोल