प्रो. चंद्ररेखा : रचना-धर्मिता की अंतर्वस्तु

प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल मो.-9418111108 रचना-धर्मिता व्यक्ति सापेक्ष है। परंतु उससे कहीं ज्यादा समय, स्थान व समाज सापेक्ष है। साहित्य स्व का विस्तार है और इस विस्तार में रचनाकार परिवेश को स्वयं में समाहित करते हुए, खुद परिवेश में समाहित हो…

झांसी की रानी से कम नहीं थी रानी खैरीगढ़ी

गंगाराम राजी मो.-9418001224 पुरस्कृत साहित्यकारों की रचनाधर्मिता - 1 हाल ही में हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी ने साहित्यकार गंगाराम राजी, बद्री सिंह भाटिया, प्रो. केशव राम शर्मा, इंद्र सिंह ठाकुर, प्रो. चंद्ररेखा ढडवाल तथा…

हिमाचली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उठी आवाज

आयोजन ‘बोलियां हमारी धरोहर हैं, हमारी संपत्ति हैं और इनका संरक्षण करके आप साहित्यकार बंधु बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। किसी व्यक्ति व सभ्यता का मूल्यांकन करना हो तो वह हम बिना भाषा ज्ञान के प्राप्त नहीं कर सकते। अतः भाषा का संरक्षण करना…

गंगाराम राजी पर हिमाचल के साहित्यकारों के विचार

डा. सुशील कुमार फुल्ल निरंतर सार्थक लिखने वाला कथाकार राजी। दीपावली की पूर्व संध्या पर अकादमी द्वारा पुरस्कारों की घोषणा हिमाचल के साहित्यिक जगत में व्याप्त सन्नाटे को तोड़ने का प्रशंसनीय प्रयत्न है। अकादमी की प्रासंगिकता…

डेंजर ज़ोन: मेरी रचनात्मकता

बद्री सिंह भाटिया मो. 9805199422 मेरे द्वारा लिखित उपन्यास ‘डेंजर ज़ोन’ को हि. प्र. कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी, शिमला द्वारा 2015 के लिए कहानी, नाटक व उपन्यास विधा में पुरस्कार की घोषणा हुई है। किसी कृति को पुरस्कार की घोषणा होने से…

व्यंग्य-साहित्य: संदर्भ एवं चुनौतियां

अमरदेव आंगिरस मो.-9418165573 आज साहित्य में व्यंग्य विधा को स्वतंत्र विधा मान लिया गया है। समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर अप्रत्यक्ष रूप से तंज या व्यंग्य किया जाता है। साधारण तथा लघु…

असली व्यंग्य वही जो अंतस को गहरे स्पर्श करे

गुरमीत बेदी मो.-9418033344 व्यंग्य रचनाएं हमारे भीतर गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने-सामने भी ला खड़ा करती हैं जिनसे हम आए दिन बावस्ता होते हैं। व्यंग्य लेखन समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति भी देता है और…

जीवनशास्त्र में व्यंग्य की है बड़ी सार्थकता

डा. शंकर वासिष्ठ मो.-9418905970 काव्यशास्त्र में शब्द की तीन शक्तियां विद्वत्जनों द्वारा स्वीकृत हैं। प्रथम ‘‘अभिधा’’ ... जिससे सीधे-सीधे वाच्यार्थ की प्रतीति होती है। दूसरी शब्द शक्ति लक्षणा है, जिससे लक्ष्यार्थ का बोध होता है। तीसरी…

व्यंग्य, व्यंग्य है इसमें फूहड़ता को कोई जगह नहीं

हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि और संभावना-2 अतिथि संपादक : अशोक गौतम हिमाचल में व्यंग्य की पृष्ठभूमि तथा संभावनाएं क्या हैं, इन्हीं प्रश्नों के जवाब टटोलने की कोशिश हम प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में करेंगे। हिमाचल में व्यंग्य का इतिहास…

जाना ठुणिये का शहर

हिमाचल प्रदेश के आधुनिक व्यंग्य परिदृश्य में रत्न सिंह ‘हिमेश’ ने व्यंग्य की परिमार्जित शुरुआत की। आरंभ में हिमाचल प्रदेश सरकार के ‘साप्ताहिक गिरिराज’ में उन्होंने ‘मैं भी मुंह में जुबान रखता हूं’ से अपनी व्यंग्य यात्रा का श्रीगणेश किया जो…

पंजाब से अलहदा होकर हिमाचल तक हिंदी का सफर

सीमांत क्षेत्रों में हिंदी का सफर हिमाचल के सीमांत क्षेत्रों में हिंदी व पंजाबी भाषा का सफर एक अलग ही कहानी बताता है। इन क्षेत्रों में भले ही सरकारी स्तर पर राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दी गई है, लेकिन यहां बोलचाल की भाषा पंजाबी ही…

मीडिया ने भाषा को आम जन तक पहुंचाया

हिमाचल में मीडिया की ग्रोथ के साथ भाषायी परिवर्तन - 2 अब वह जमाना नहीं रहा जब जालंधर, चंडीगढ़ या दिल्ली से प्रकाशित अखबार हिमाचल में आया करते थे। अब हिमाचल, खासकर कांगड़ा खुद एक मीडिया हब बन गया है। हिमाचल में अब यहीं से प्रकाशित…

हिंदी में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का अनावश्यक प्रयोग बढ़ा

हिमाचल में मीडिया की ग्रोथ के साथ आए भाषायी परिवर्तन - 1 अब वह जमाना नहीं रहा जब जालंधर, चंडीगढ़ या दिल्ली से प्रकाशित अखबार हिमाचल में आया करते थे। अव हिमाचल, खासकर कांगड़ा खुद एक मीडिया हब बन गया है। हिमाचल में अब यहीं से प्रकाशित अखबार…

हिंदी को प्रोत्साहन मिला, पर अंग्रेजी से खतरा

क्या वास्तव में हिमाचल हिंदी राज्य है -2 क्या वास्तव में हिमाचल हिंदी राज्य है? क्या हिंदी को राज्य में वांछित सम्मान मिल पाया है अथवा नहीं? इस बार राष्ट्र भाषा से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रश्नों पर विभिन्न साहित्यकारों के विचारों को लेकर हम आए…

हिंदी को नहीं मिल पाया वांछित सम्मान

डा. हेमराज कौशिक मो.- 9418010646 भारतीय संविधान सभा में 14 सितंबर, 1949 को हिंदी भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकृत हुई थी। वह राजभाषा के साथ-साथ राष्ट्र भाषा और व्यापक जनसमुदाय से जुड़ी भाषा है। हिंदी की क्षमता और समृद्धि हिंदी प्रदेशों…