प्रतिबिम्ब

यह कहानी उस बुढिय़ा से संबंधित है, जो अपने दो बेटों की अनदेखी के कारण संकटों भरा जीवन व्यतीत कर रही है। उसके बेटे अपनी मां की देखभाल ठीक से नहीं करते हैं। ऐसे में बुढिय़ा को एक स्त्री का साथ मिलता है, जो दयालू प्रवृत्ति की है। बुढिय़ा से उसकी आपबीती जानकर वह उसकी सहायता के लिए तैयार होती है। बुढिय़ा और स्त्री आपस में बतियाती रहती हैं। स्त्री बुढिय़ा की दीन-हीन दशा देखकर उसके लिए कुछ करना चाहती है। वह उसे मां कह कर संबोधित करती है। यह एक महिला का दूसरी बूढ़ी महिला के लिए सम्मान है। अब इससे आगे की कहानी।

महाकवि तुलसीदास को ‘समन्वय का सम्राट’ कहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त धार्मिक, दार्शनिक, सामाजिक और वर्णनात्मक कटुता को दूर कर एक सामंजस्यपूर्ण समाज की स्थापना की। उनकी समन्वय भावना को निम्नलिखित सोदाहरण स्पष्ट किया जा सकता है : 1. सगुण और निर्गुण का समन्वय : तुलसी ने सगुण (साकार) और निर्गुण (निराकार) के बीच के विवाद को समाप्त किया। उनका मानना था कि दोनों एक ही परब्रह्म के दो रूप हैं। ईश्वर प्रेम के वशीभूत होकर निराकार से साकार हो जाता है - ‘अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।’ 2. ज्ञान और भक्ति का समन्वय : उन्होंने ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग के द्वंद्व को समाप्त कर दोनों का अनूठा सामंजस्य स्थापित किया। तुलसी का स्पष्ट मत था कि ज्ञान के बिना भक्ति अधूरी है और भक्ति के बिना ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति संभव नहीं है। 3. सामाजिक और पारिवारिक समन्वय : तुलसी के साहित्य में समाज के हर वर्ग के प्रति गहरा आ

प्रगतिशील इरावती का नया अंक 25, प्रेम विशेषांक है। दुनिया भर में प्रेम के लिए कम होती स्पेस में प्रेम की बात करना या किसी साहित्यिक पत्रिका का प्रेम विशेषांक निकालना उन तमाम ताकतों के खिलाफ विद्रोह का एक सार्थक स्वर है जो वैश्विक स्तर पर प्रेम के खिलाफ तरह तरह की खुराफातों में मुब्तिला हैं। जाहिर है कि ऐसे समय में प्रेम भी या प्रेम ही प्रतिरोध का पर्याय हो सकता है। इरावती का यह प्रेम विशेषांक इन षड्यंत्रों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण साहित्यिक हस्तक्षेप है। यह प्रेम को निजी से सामाजिक, भावुकता से विचार, अनुभूति से प्रतिरोध की ओर ले जाता है। समकालीन हिंदी साहित्य में प्रेम पर लिखना एक जोखिम भरा काम है और बहुत कम लोग हैं जो प्रेम जैसे विषय पर लिख रहे हैं। राजेंद्र राजन जब कहते हैं कि, ‘यह अंक कहने को प्रेम विशेषांक है, लेकिन मैं इससे कतई संतुष्ट नहीं हूं’, यह एक गंभीर संपादक की पीड़ा है। संपादकीय में राजेंद्र राजन कहते हैं- ‘पत्रिका का प्रत्येक अंक चुनौती लेकर आता है। मोहभंग भी।’

यहां कहानी पलकें खोलकर मुस्कराना चाहती है। इसकी पाजेब में बजते घुंघरू, कई मौन-कई सन्नाटे तोडऩे का प्रयास कर रहे हैं। कई घरौंदे, कई समाज और कई शिकवे-शिकायतों का हुजूम।

‘विश्व ध्यानाधार’, त्रैमासिक पत्रिका का जनवरी-मार्च 2026 अंक धर्म-संस्कृति, ज्योतिष व अध्यात्म को समर्पित है। संपादक चमन सिंह जरयाल के संपादकत्व में पत्रिका का निरंतर व नियमित प्रकाशन संभव हो पा रहा है।

हिमाचल के मशहूर साहित्यकार, आंदोलनकारी, नाट्य एवं फिल्म निर्देशक, विचारक कृष्ण कुमार नूतन दुनियावी रंगमंच पर अपना किरदार निभाकर चले गए। वे अपने पीछे अपनी यादों का लंबा सिलसिला छोड़ गए हैं।

जिन दिनों बर्फ थी पहाड़ों पर/जिन रविवारों को/जगजीत और चित्रा जी को सुनते हुए सूखती थी/धूप में सफेद कमीजें/बैठक का फर्श चमकता था/फिनाइल की खुशबू में/जिन...

पिछले अंक में आपने पढ़ा… हेसण वह है जो मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार महादेव के नाम पर देवलुओं और कारदारों की ‘सेवा’ में रहती है। इस कहानी में जो पहली पीढ़ी की हेसण है, वह इस चिंता में रहती है कि मेरी तरह उसकी बेटी भी हेसण बनने के लिए मजबूर हो जाएगी। ऐसा

3. प्रदेश से दो बार लोकसभा सांसद व एक बार प्रदेश के शिक्षा मंत्री पद पर रहे प्रो. नारायण चंद पराशर ने एक पुस्तक चंपत के नाम से लिखी है। 4. पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक और जननेता स्वर्गीय लालचंद प्रार्थी ने ‘कुल्लू देश की कहानी’ नामक एक पुस्तक लिखी है। 5. पेशे से एक नेत्ररोग चिकित्सक डा. बीएल कपूर ने हिमाचल की कला, संस्कृति, इतिहास व लोकव्रीतियों पर लगभग सत्रह पुस्तकें लिखी हैं। इनकी पुस्तक ‘हिमाचल का इतिहास और परंपरा’ पठनीय पुस्तक मानी जाती है। डा. साहब को भूटिको वीवर कोआपरेटिव सोसायटी द्वारा लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। बिलासपुर की एक पत्रिका ‘शब्दमंच’ द्वारा भी इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। किसी भी साहित्यिक अथवा सांस्कृतिक समारोह में इनको भाषा विभाग अथवा अकादमी द्वारा आमंत्रित न करना प्रदेश के लेखकों के प्रति उदासीनता का ज्वलंत उदाहरण बन गया था, क्योंकि डा. साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे, इसलिए इन पर कुछ लिखा नहीं जा सकता।