सामाजिक परिप्रेक्ष्य में नई उम्मीदों का संसार हर बार हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं से बाहर निकलता है, तो इस बार सफलता के रास्ते पर एक लंबी कतार सामने आई है। पिछले साल के मुकाबले इस बार सफलता का पहाड़ 8.86 प्रतिशत ऊंचा होकर 92.02 फीसदी तक पहुंच गया। जाहिर है बारहवीं की परीक्षा ने शहरी और ग्रामीण हदों को चौपट करके सफलता की मंजिलें तराशी हैं। मैरिट का हिसाब लगाएं तो 61 सरकारी स्कूल खिड़कियां खोल रहे हैं, तो निजी साठ स्कूलों ने भी ताज हथियाए हैं। हम मैरिट की टॉप पोजीशन में शिक्षा का रंग रोगन देख रहे हैं, तो यह भी पता चलता है कि इस सूबे की बेटियां अब अभिभावकों की शोहरत में इंकलाब लिख रही हैं। जमा दो की ओवरआल मैरिट के 121 स्थानों में 99 में बेटियों का राज बताता है कि कितने खुशमत हैं वे अभिभावक जिनके आंगन में ये जज्बात पैदा होते हैं। ऐसा लग रहा है कि बारहवीं के कुल 500 माक्र्स थम गए हों और इसलिए 487 से 496 अंकों के बीच 76 बच्चों ने शिक्षा की कसीदाकारी कर डाली। बेशक विज्ञान के छात्रों ने सबसे अधिक 49 मैरिट हासिल कीं, लेकिन स्कूल की छत के नीचे वाणिज्य विषय के 36 और कला संकाय के 36 बच्चे अगर मैरिट में आ रहे हैं, तो यह हिसाब सीबीएसई पाठ्यक्रम से अलग और सुनहरा है। यह इसलिए भी कि इंजीनियरों-डाक्टरों की पांत से अलग यहां बच्चे प्रशासनिक अधिकारी, आफिसर, बैंक अधिकारी, चार्टर्ड अकाउंटेंट और सीए भी बनना चाहते हैं। सरकारी स्कूलों में सफलता के नए आंकड़े एक ओर शिक्षक वर्ग की अहमियत का परचम फहराते हैं, तो दूसरी ओर परिसर के माहौल को चार चांद लगाते हैं। इस बार के स्कूल परीक्षा परिणाम शिक्षा बोर्ड बनाम सीबीएसई परीक्षा बोर्ड होने जा रहे हैं। जब से सीबीएसई पाठ्यक्रम की ओर सरकारी स्कूल बढ़े हैं, इनके मूल्यांकन के पैमाने भी सख्त हुए हैं। ऐसे में बारहवीं परीक्षा के परिणाम यह भी साबित कर रहे हैं कि न तो सरकारी स्कूल और न ही हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड की सफलता के मानदंड कहीं नीचे गिरे हैं।
यह दीगर है कि अब इनका मुकाबला सीबीएसई स्कूलों से होगा, जहां अनुभवी शिक्षक भी एक चयन प्रक्रिया से गुजर कर अपना दायित्व संभाल रहे हैं। वार्षिक परीक्षाओं में जमा दो के बाद एक नया सफर और करियर की बुलंदी का संघर्ष आमादा होता है। हिमाचल में भी शिक्षा से संपन्नता और स्वावलंबन के सामाजिक दौर शुरू हैं, जहां अभिभावक बच्चों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के मुकाबले में खड़ा करना चाहते हैं। डाक्टरी व इंजीनियरिंग से इतर ख्वाहिशों में नए पल चुने जा रहे हैं, तो हिमाचली बच्चे चंडीगढ़-दिल्ली व अन्य मैट्रो शहरों की तरफ रुखसत कर रहे हैं। खास तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों में हिमाचल की बेटियों का रुझान, जिंदगी की नई कसौटी है। ऐसे में जिस तरह सरकार अपने तीन सौ स्कूलों को सीबीएसई पाठ्यक्रम के झूले में बैठा रही है, उसी तरह हिमाचल के कुछ कालेजों को दिल्ली व अन्य महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों से संबद्ध कर देना चाहिए। प्रदेश की मैरिट में कला संकाय व वाणिज्य विषय की श्रेष्ठता को देखते हुए हमें कुछ चयनित कालेजों को विशेष विषय के राज्य स्तरीय कालेज बना देना चाहिए। मसलन राज्य के राजनीति-अर्थशास्त्र, इतिहास, गीत-संगीत एवं कला, वाणिज्य, विज्ञान, डिफेंस स्टडीज, खेल, भाषा व गणित आदि विषयों के राज्य स्तरीय कालेज बनाकर अध्ययन की उच्च परंपरा शुरू करनी चाहिए। इतना ही नहीं, कुछ ग्रामीण कालेजों को कम्युनिटी, कृषि, बागबानी और पर्यावरण कालेजों के रूप में स्थापित करना होगा। नगरोटा सूरियां के कालेज को मत्स्य अध्ययन, ढगवार मिल्क प्लांट के साथ डेयरी स्टडी सेंटर तथा राज्य में शहरीकरण की रफ्तार को देखते हुए एक अदद शहरी एवं ग्रामीण विकास के अध्ययन का केंद्र तथा फिल्म एवं टीवी संस्थान खोलने की आवश्यकता को गंभीरता से लेना होगा।