सनातन जीवन में पर्यावरण की रक्षा का मूल कर्तव्य

वैदिक काल से लेकर महात्मा गांधी युग तक भारतीय चिंतन की हर धारा में पर्यावरण के प्रति गहरी आत्मीयता और स्पष्ट दृष्टि मिलती है। भारतीय सनातन परंपरा को विश्व की प्राचीनतम जीवन पद्धति माना जाता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति को कभी भोग की वस्तु नहीं माना गया, बल्कि उसे ऊर्जा का स्रोत और जीवन का आधार माना गया है…

आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और पारिस्थितिक संकट से जूझ रहा है, तब पश्चिमी जगत पर्यावरण संरक्षण के नए-नए सूत्र खोज रहा है। लेकिन भारत के लिए यह कोई नई खोज नहीं है। हजारों वर्षों से भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति के प्रति आस्था और सम्मान का भाव दृष्टिगत होता रहा है।

वैदिक काल से लेकर महात्मा गांधी युग तक भारतीय चिंतन की हर धारा में पर्यावरण के प्रति गहरी आत्मीयता और स्पष्ट दृष्टि मिलती है। भारतीय सनातन परंपरा को विश्व की प्राचीनतम जीवन पद्धति माना जाता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रकृति को कभी भोग की वस्तु नहीं माना गया, बल्कि उसे ऊर्जा का स्रोत और जीवन का आधार माना गया है। वेदों में वर्णित शांति पाठ इसका सबसे सुंदर उदाहरण है। यह शांति पाठ किसी राजा, देवता या विचार के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रकृति के लिए है : ‘ओउम द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष: शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्ति: रोषधय: शान्ति:। /वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिब्रह्मा शान्ति: सर्व: शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।। / ओउम शान्ति: शान्ति: शान्ति:।’
अर्थात आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो, औषधियों में शांति हो। यह प्रार्थना बताती है कि हमारे पूर्वज पर्यावरण के हर तत्व के प्रति सजग और संवेदनशील थे। ऋग्वेद के भूमि सूक्त में पृथ्वी को मां कहकर पुकारा गया है- ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’, अर्थात भूमि मेरी मां है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं। जो धरती को मा माने, वह उसे कैसे नष्ट कर सकता है?

भारतीय आस्था में पंचतत्व यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को केवल भौतिक तत्व के रूप में नहीं देखा गया है। इन्हें दैवीय शक्तियों का स्वरूप माना गया है। इसीलिए नदियों में गंगा, यमुना, सरस्वती को देवी के रूप में पूजा जाता है। वृक्षों में भगवान का निवास माना जाता है। पीपल में विष्णु और तुलसी में लक्ष्मी का रूप स्वीकार किया गया है। सूर्य को प्रत्यक्ष देवता मानकर प्रतिदिन जल अर्पित किया जाता है। गाय को माता कहकर उसकी रक्षा की जाती है।

यह पर्यावरण संरक्षण की एक व्यावहारिक और टिकाऊ व्यवस्था थी, जिसे आस्था का रूप देकर जन-जन तक पहुंचाया गया था। उपनिषदों का केंद्रीय संदेश है- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’, अर्थात यह संपूर्ण जगत ब्रह्म है। जब हम प्रकृति के हर कण में परमात्मा देखते हैं, तो उसे नष्ट करने की कल्पना भी पाप लगती है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं जल में रस हैं, सूर्य-चंद्र में प्रकाश हैं, वायु में गंध हैं। यह दर्शन मनुष्य को प्रकृति का अभिन्न अंग मानता है। भारतीय शास्त्रों में वृक्षों के महत्व को धार्मिक कर्तव्य से जोड़ा गया। मत्स्य पुराण कहता है कि दस कुएं खोदने के बराबर पुण्य एक तालाब बनाने से, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र से, और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष लगाने से मिलता है।

विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जो व्यक्ति वृक्ष काटता है, वह पाप का भागी होता है। यही कारण था कि भारत के गांवों में पंचवटी की परंपरा थी- पीपल, बरगद, आंवला, बेल और अशोक- ये पांच वृक्ष हर बस्ती के पास लगाए जाते थे। इस प्रकार नदियों की सफाई, पौधारोपण, जैव विविधता का संरक्षण आदि सब भारतीय परंपरा में सदियों से जीवन का हिस्सा रहे हैं। आज जरूरत है कि हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। तब शायद हम उन संकटों को टाल सकें, जो आज पूरी मानवता पर मंडरा रहे हैं।

-डा. रविंद्र सिंह भड़वाल, शिक्षाविद