हिमाचल के लिए चुनौती बनने लगा जलवायु परिवर्तन, विशेषज्ञों की सलाह, प्रकृति के साथ संतुलन बनाना ही समाधान

कार्यालय संवाददाता-शिमला

जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने सबसे गंभीर संकट बनकर उभरा है और हिमालयी राज्य हिमाचल प्रदेश भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। प्रकृति और विकास के बीच संतुलन स्थापित किए बिना आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश, भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2023 में आई प्राकृतिक आपदाओं ने प्रदेश में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान पहुंचाया। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलते जलवायु चक्र और बढ़ते पर्यावरणीय दबाव का परिणाम है।

जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ी है। इसका असर अब मौसम के बदलते स्वरूप के रूप में दिखाई दे रहा है। अनियमित वर्षा, सूखा, जंगलों में आग और बढ़ता तापमान भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी हैं।

प्राकृतिक खेती से लाभ

हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने से मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरेगी और जल संरक्षण में भी बढ़ोत्तरी होगी, साथ ही इसका पर्यावरण पर दबाव कम पड़ता है। प्राकृतिक खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक साबित हो सकती है।

चार-आर का मंत्र अपनाने की जरूरत

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है। इसके लिए आम लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। जीवनशैली में 4आर— रिफ्यूज (अनावश्यक वस्तुओं को अस्वीकार करना), रिड्यूस (उपभोग कम करना), रीयूज (पुन: उपयोग करना) और रिसाइकिल (पुनर्चक्रण करना) — के सिद्धांत अपनाकर पर्यावरण पर पडऩे वाले दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

नई तकनीक की आवश्यकता

पर्यावरण संरक्षण के लिए विज्ञान और तकनीक की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण, जलवायु-स्मार्ट कृषि और आपदा प्रबंधन के क्षेत्रों में नई तकनीकों के विकास की आवश्यकता है।