कुंडेश्वर धाम : 5000 साल पुराना स्वयंभू शिवलिंग, जहां आज भी भगवान शिव को जल चढ़ाने आती हैं ऊषा

बुंदेलखंड की काशी कहे जाने वाले शिव धाम कुंडेश्वर में भगवान भोलेनाथ का स्वयंभू शिवलिंग है। यह शिवलिंग करीब 5000 साल पुराना बताया जाता है। द्वापर युग में बाणासुर की पुत्री ऊषा ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। वर्तमान में किंवदंती है कि ऊषा आज भी भगवान शिव को जल अर्पित करने आती है। मगर उन्हें कोई देख नहीं पाता है। कुंडेश्वर स्थित देवादिदेव महादेव आज भी शाश्वत और सत्य हैं, इसका जीता जागता प्रमाण स्वयं प्रतिवर्ष चावल के बराबर बढऩे वाला शिवलिंग है। समूचे उत्तर भारत में भगवान कुंडेश्वर की विशेष मान्यता है। यहां प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के आते हैं। यहां भक्त और भगवान के बीच आस्था और विश्वास का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो हर किसी का मन मोह लेता है।

क्यों कहा जाने लगा कुंडेश्वर- बताया जाता है कि कुंडेश्वर का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन इसके बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। प्राचीनकाल में यहां एक छोटी सी बस्ती थी। एक महिला अपने घर में जमीन में बनी ओखली में धान कूट रही थी कि अचानक उसने हाथ से धान पलटते समय पाया कि ओखली के चावल रक्त रंजित हो गए हैं। वह घबराकर मिट्टी के कूड़े से ओखली ढक्कर लोगों को बुलाने भागी, लौटने पर सभी ने देखा कि स्वयं भू शिवलिंग कूड़े को सिर पर रखकर प्रकट हो गए। इसी दिन से वे कूड़ा देव कुंडेश्वर कहे जाने लगे। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, जमड़ार नदी की एक चट्टानी पहाड़ी को काटकर आगे बढ़ाने के लिए एक प्राकृतिक कुंड सा बन गया है। इसी कुंड के दाएं तट पर शिवजी का प्राचीन मंदिर स्थित है कुंड के समीप स्थित होने से इनका नाम कुंडेश्वर महादेव पड़ा होगा। तीसरी लोक मान्यता के अनुसार, उत्तरप्रदेश के ललितपुर जिले की प्राचीन ऐतिहासिक नगरी बानपुर महाराजा बाणासुर की राजधानी थी। उनकी पुत्री राजकुमारी ऊषा के द्वारा महाभारत काल में शिवजी की गोपनीय आराधना इसी अथाह कुंड में की गई। क्योंकि इस आराधना के लिए राजकुमारी ऊषा रात्रि में बिना सूचना के यहां आती थी। बाद में राजा को राजकुमारी के अचानक रात्रि में कहीं जाने की सूचना प्राप्त हुई, तो राजा द्वारा उनका पीछा किया गया और गोपनीय आराधना का भेद खुल गया। घोर वन में कुंड के किनारे स्थित होने के कारण ये कुंडेश्वर के नाम से विख्यात हुए। सन् 1932 में तत्कालीन राजशासन के मंत्री अश्वनी कुमार पांडे ने छोटे से मठ में स्थित भगवान शिव के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। जीर्णोद्धार के समय में की गई खुदाई में लगभग 5 फुट नीचे शिवजी की प्रतिमा में पहनी हुई पत्थर की जलाधारी निकली, जो संभवत: शताब्दियां पूर्व भगवान शंकर को पहनाई गई होगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 25 फुट तक खुदाई होने पर भी शिवलिंग यथावत मिला, किंतु जल का स्रोत बढ़ जाने के कारण आगे की खुदाई को बंद करना पड़ा। जहां एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया, तब से आज तक निरंतर यह स्थान अपना विस्तार करते-करते इतना सुंदर व दर्शनीय हो गया है।

हर साल बढ़ता है शिवलिंग- कुंडेश्वर धाम के शिवलिंग के बारे में यह भी मान्यता है कि यह शिवलिंग एक चावल के दाने बराबर प्रतिवर्ष बढ़ता है। शिवधाम में पर्यटकों का वर्षभर तांता लगा रहता है। महाशिवरात्रि का दिन कुंडेश्वर में हर-हर महादेव के नारों से शुरू होता है, जहां रात्रि के अंतिम प्रहर से ही नदी में स्नान के लिए नागरिकों में होड़ लग जाती हैं। दिन भर पूजा-अर्चना करने के पश्चात शाम ढलते कुंडेश्वर के शिवालय में शिव विवाह का माहौल दिखाई देने लगता है। श्रावण मास में तो भगवान भोलेनाथ के इस धाम में भक्तों का मेला लगा रहता है।