बाबा हरदेव
गतांक से आगे…
अत: सद्गुरु गुरसिख को मिटना सिखाता है क्योंकि मिटने के प्रेम का प्रादुर्भाव होता है। इसलिए सद्गुरु को कुम्हार एवं धोबी की संज्ञा दी गई है। कुम्हार पहले तो मिट्टी को रौंदता है फिर उसे आकार देता है। सद्गुरु धोबी की भांति जन्मों-जन्मों की मैल उतारकर जीवन को उज्ज्वल कर देता है। इस प्रकार सद्गुरु द्वारा गुरसिख का जन्म होता है। वर्तमान में सद्गुरु माता सविन्दर जी भक्तों को सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी द्वारा दी हुई शिक्षाओं को अपनाने के लिए बल दे रही हैं, क्योंकि हम सद्गरु के प्यार-दुलार में यह भूल ही गए कि शिक्षाओं को अपनाना भी है। सद्गुरु बाबा जी हमें सचेत कर रहे परंतु हम श्रेष्ठता की भावना व उत्कृष्ठता की मनो ग्रंथि इस कद्र कुंठित हो चुके थे। सद्गुरु द्वारा चैतन्य करने पर भी हम सचेत नहीं हो पा रहे थे। सद्गुरु के वचनों को सुनकर दूसरों को सुनाकर ही तृप्त हो रहे हैं काश हमने उनके अमूल्य वचनों को जीवन में अपनाया होता। संत निरंकारी के संपादक श्री हरजीत निषाद जी से विचारों का आदान-प्रदान हो रहा था, वैसे कहना तो यही उचित है कि मात्र आदान से ही हो रहा था। प्रदान करने की तो दास की क्षमता ही नहीं है।
वो कह रहे थे कि सद्गुरु माता सविन्दर हरदेव जी आज हमें छोटे-छोटे विचारों के रूप में जो मंत्र प्रदान कर रही हैं, उन्हें दोहराने के साथ जीने की नितांत आवश्यकता है। इसी से हमारा कल्याण है। आइए सद्गुरु माता जी के चरणों में एक-दूसरे के लिए अरदास करें कि हम आपके आशय अनुसार जीवन को जी पाएं और मानव समाज के सामने एक रोशन मीनार बन सकें।
भारतीय संस्कृति का एक सूत्र वाक्य है, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’। अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने की इस प्रक्रिया में गुरु का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय परंपरा में शिक्षा को शरीर, मन और आत्मा के विकास द्वारा मुक्ति का साधन माना गया है। शिक्षा मानव को इस सोपान पर ले जाती है, जहां पर अपने समग्र व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। हमारे जीवन को संवारने में गुरु का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सारी दुनिया गुरु-गुरु पुकारती है लेकिन विरला ही गुुरु को जानता है।
जिससे दीक्षा लेते हैं, वह दीक्षा गुरु है और जिससे सत्य, असत्य का बोध प्राप्त हो वह सद्गुरु है। सद्गुरु हमारे जीवन में वही काम करता है, जो आजकल ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम यानी जीपीएस करता है। जब कोई रास्ता नहीं सूझता तब हम दिशा जानने के लिए जीपीएस का सहारा लेते हैं और अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। इसी तरह सद्गुरु की शरण में आया व्यक्ति कभी रास्ता नहीं भटकता। गुरु नानक देव जी कहते हैं कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति को भ्रम में नहीं रहना चाहिए। बिना गुरु के कोई भी दूसरे किनारे तक नहीं जा सकता। हम अभी भी भ्रम में ही हैं और शायद लगातार रहते हैं। यह भ्रम अंग्रेजी का डाउट है। अस्पष्टता है, पता नहीं चल रहा कि इधर जाएं या उधर। यह निर्णय क्षमता हमें सद्गुरु प्रदान करता है। सद्गुरु जीवन जीने की कला सिखाता है।
सब विद्याओं में श्रेष्ठ विद्या ब्रह्म विद्या प्रदान करता है। सद्गुरु शरीर में अवश्य होता है लेकिन सद्गुरु ज्ञान है शरीर नहीं। मानव रूप में प्रकट सद्गुरु प्रेम से भरा हुआ और मनमोहक है। ब्रह्म ज्ञान की दात देने वाले सद्गुरु की कृपा से ही जीवन में शांति, सुख, प्रसन्नता और आनंद का आगमन होता है। जे. कृष्णामूर्ति हमें हमारी कमजोरी दिखाते हुए कहते है, आप किसी गुरु का चयन करते हैं, क्योंकि आप भ्रांत है और आस लगाते हैं कि आप जो चाहते हैं वह गुरु आपको देगा। -क्रमश: