विकास के साथ जरूरी है प्रकृति का संरक्षण

हाल ही में नेपाल में ग्लेशियर फटने से भारी तबाही हुई है। इसमें जान-माल का नुक्सान हुआ। कुदरत के इस कहर के पीछे पहाड़ों पर अंधाधुंध निर्माण है। सडक़ों का निर्माण करने के लिए पहाड़ों के सीने को छलनी किया जा रहा है। हमारे देश में भी बरसात का मौसम पहाड़ी क्षेत्रों पर भारी पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में यहां बरसात ने बहुत कहर बरपाया है। ताश के पत्तों की तरह इमारतों को ढहते देखा है। अपनी सुख सुविधाओं के लिए सडक़ों, रेलमार्गों और अन्य विकास के काम जरूरी हैं, लेकिन इससे भी जरूरी है प्रकृति का संरक्षण। अगर हम बीज बबूल के बोएं और फिर इससे हम आम जैसे मीठे फल की इच्छा रखेंगे, तो यह हमारी सबसे बड़ी नासमझी नहीं होगी तो और क्या होगा?

-राजेश कुमार चौहान, सुजानपुर टीहरा