किडनी की कार्यक्षमता पर होगा शोध, ज्यादा सटीक आकलन की दिशा में एम्स बिलासपुर करेगा काम

दिव्य हिमाचल ब्यूरो — बिलासपुर

किडनी की कार्यक्षमता के अधिक सटीक आकलन की दिशा में एम्स बिलासपुर में महत्त्वपूर्ण शोध किया जाएगा। संस्थान के नेफ्रोलॉजी विभाग में भारतीय आयु वर्ग और आबादी को ध्यान में रखते हुए ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट के अधिक सटीक अनुमान विकसित करने पर अध्ययन होगा। यह शोध भारतीय आबादी में किडनी की कार्यक्षमता के मूल्यांकन को और अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह अध्ययन भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा वित्त पोषित बहुकेंद्रीय शोध परियोजना के तहत किया जाएगा। परियोजना का उद्देश्य भारतीयों में किडनी के कामकाज के मूल्यांकन में सुधार करना तथा चिकित्सकीय अभ्यास में ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट के अधिक सटीक आकलन के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करना है। एम्स के नेफ्रोलॉजी विभाग में विभागाध्यक्ष एवं प्रधान अन्वेषक प्रो. संजय विक्रांत के मार्गदर्शन में इस परियोजना पर शोध कार्य किया जाएगा। ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट यानी जीएफआर किडनी की कार्यक्षमता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक है।

यह इस बात का अनुमान लगाने में मदद करता है कि किडनी एक निश्चित समय में रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को कितनी प्रभावी तरीके से फिल्टर कर रही है। किडनी की कार्यक्षमता में कमी आने पर जीएफआर में भी गिरावट देखी जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार क्रॉनिक किडनी डिजीज से लंबे समय से जूझ रहे मरीजों में किडनी की कार्यक्षमता की लगातार निगरानी उपचार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे मरीजों में जीएफआर के अधिक सटीक अनुमान से बीमारी में होने वाले बदलावों को बेहतर तरीके से समझने और उपचार की दिशा में आवश्यक निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।