छिलकों की छाबड़ी : मैं अभी अनशन पर हूं…

देखिए, इन दिनों मैं बहुत बिजी हूं। मेरे पास सिर खुजलाने की फुर्सत नहीं है। कोरी गप्पें मारने की भी फुर्सत नहीं है। पत्नी से लडऩे की भी फुर्सत नहीं है। उसको शॉपिंग करवाने की फुर्सत भी नहीं है। अस्पताल की लाइन में लगने की फुर्सत नहीं है। वर्क फ्रॉम होम करने की फुर्सत भी नहीं है। अब आप जानना चाहेंगे कि जब मुझे फुर्सत ही नहीं है तो मैं आखिर कर क्या रहा हूं? आपका सवाल जायज है। मैं वही कर रहा हूं जो देशहित में जायज है। यानी मैं अनशन पर बैठा हूं। मीडिया मेरी वीडियो बना रहा है। कैमरामैन मेरी फोटो खींच रहे हैं। सोशल मीडिया पर मैं बराबर हाईलाइट हो रहा हूं। इसलिए दो दिन से मैंने कुछ खाया-पिया नहीं है। भूख भी लग रही है, प्यास भी लग रही है, लेकिन मन मारकर बैठा हूं क्योंकि मैं अनशन पर बैठा हूं। अगर मैं अनशन से उठ जाऊंगा तो देश भटक जाएगा। लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। मुझे कवरेज मिलना बंद हो जाएगी। युवा दिशा भ्रष्ट हो जाएगा। मैं युवाओं के लिए, देश के लिए और कवरेज पाने के लिए अनशन पर बैठा हूं। अनशन पर मैं बैठा हूं तो बहुत से युवा सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। इन नारों से मुझे थोड़ी ऊर्जा भी मिल रही है। मेरे जिंदाबाद के नारे भी लग रहे हैं और जीवित रहते हुए मैं अपने जिंदाबाद के नारे पहली बार सुन रहा हूं। बहुत फील गुड भी हो रहा है। कभी-कभी तो लगता है कि जिंदगी में आदमी को इससे ज्यादा और क्या चाहिए- दो रोटी कम मिलें, लेकिन चार कैमरे ज्यादा मिलें! लेकिन कभी-कभी भूख हावी हो जाती है तो मैं सोचता हूं कि पुलिस मुझे उठा कर ले जाए और अस्पताल में भर्ती करवा दे।

जबरदस्ती मुझे ग्लूकोज लगा दे। जबरदस्ती मेरे मुंह में खाना ठूंस दे। मेरे दोनों हाथ-पांव भी जबरदस्ती बांध दे, ताकि मैं पुलिस को जबरदस्ती खाना खिलाने और ग्लूकोज लगाने से रोक न पाऊं। इससे एक पंथ दो काज हो जाएंगे। पब्लिक की सहानुभूति मेरे साथ हो जाएगी कि देखो, बेचारे को पुलिस ने जबरदस्ती खाना खिला दिया। युवा मेरे साथ हो जाएंगे कि देखो, हमारे लिए अनशन पर बैठ गया था। और सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अगले दिन अखबार में मेरी फोटो पहले पन्ने पर होगी- चेहरे पर संघर्ष, आंखों में क्रांति और हाथ में ग्लूकोज की बोतल! वैसे अनशन भी बड़ी सुविधाजनक चीज है। इसमें आदमी को ज्यादा काम नहीं करना पड़ता। बस बैठना पड़ता है। जितना ज्यादा बैठो, उतना बड़ा आंदोलनकारी। और अगर पीछे दो-चार झंडे हों, सामने कैमरे हों और आसपास नारे लगाने वाले युवा हों तो आदमी देखते ही देखते राष्ट्र का चिंतक बन जाता है। अब मेरी असली चिंता भूख नहीं है। मेरी चिंता यह है कि मेरी खबर कितनी बड़ी छपी। सुबह उठते ही सबसे पहले अखबार देखता हूं। अपनी फोटो ढूंढता हूं। खबर कितने कॉलम में छपी, यह देखता हूं। टीवी पर कितनी देर चला, यह देखता हूं। सोशल मीडिया पर कितने लाइक आए, यह गिनता हूं। अगर खबर छोटी छपी हो तो मुझे सरकार से ज्यादा संपादक पर गुस्सा आता है। आखिर मैं दो दिन से भूखा हूं और मुझे सिर्फ दो कॉलम मिले हैं! यह मेरे त्याग के साथ सरासर अन्याय है। कुछ साथी कह रहे हैं कि आंदोलन लंबा चलाओ। मैंने कहा- आंदोलन लंबा चलाने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन पेट का क्या करें? पेट बड़ा निर्दयी होता है। उसे नारे समझ नहीं आते। उसे लोकतंत्र की चिंता नहीं होती। उसे देशहित, जनहित और युवाहित से भी कोई मतलब नहीं होता। वह हर चार-पांच घंटे बाद अपनी अलग ही मांग रख देता है- रोटी दो! मैं उसे समझाता हूं कि चुप रह, देश संकट में है। वह कहता है- पहले मेरा संकट दूर कर! कभी-कभी मन करता है कि सरकार मेरी सारी मांगें तुरंत मान ले। लेकिन फिर डर लगता है कि अगर मांगें मान ली गईं तो आंदोलन खत्म हो जाएगा। कैमरे चले जाएंगे। पत्रकार चले जाएंगे। समर्थक घर चले जाएंगे और मैं फिर वही आम आदमी बन जाऊंगा, जिसे कोई पहचानता तक नहीं। इसलिए अब मैं सोच रहा हूं कि अपनी मांगों में कुछ ऐसी मांगें भी जोड़ दूं जो कभी पूरी न हों। आंदोलन चलता रहेगा, नारे चलते रहेंगे, कैमरे चलते रहेंगे और मैं लोकतंत्र बचाता रहूंगा।

गुरमीत बेदी

साहित्यकार