वैचारिक लेख

इन झीलों को कम खतरनाक नहीं आंका जा सकता और उत्तराखंड जैसी त्रासदी कहीं और न हो, इसके लिए इन झीलों की सतत निगरानी हो… जलवायु परिवर्तन आज के युग की वास्तविकता बन चुकी है। प्रचलित विकास मॉडल के लिए ऊर्जा की अत्यधिक आवश्यकता है और यह जरूरत लगातार बढ़ती ही जा रही है। वही 

अशोक गौतम [email protected] कबीर के साथ अपनी पहचान चौथी-पांचवीं से है। मास्साब ने पीट-पीट कर तब कबीर से मेरी पहचान करवाई थी। उन्होंने पीटते-पीटते कहा था कि जो कबीर से दोस्ती नहीं करोगे तो समाज में आना बेकार। कल उन्हीं कबीर साहब का फोन आया, ‘और बंधु क्या कर रहे हो?’‘कुछ नहीं! जबसे जोड़-तोड़ कर

सरकारी और निजी दोनों प्रकार के बैंकों की विशेष लोगों को गलत ऋण देने की प्रवृत्ति होती है जिस पर अंकुश रिजर्व बैंक को लगाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वित्त मंत्री को बधाई है कि उन्होंने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फैसला किया है। जानकार बताते हैं कि दो छोटे सरकारी बैंकों

वैचारिक मतभेद होना आवश्यक है, लेकिन मनभेद घातक होता है। रेडियो और सोशल मीडिया के माध्यम से जिस भी व्यक्ति ने यह देखा-सुना, उसे बहुत पीड़ा हुई कि आज संवैधानिक व्यक्ति के ऊपर किस तरह से लोकतंत्र का हनन हो रहा है। भारतीय संविधान में महामहिम राष्ट्रपति और महामहिम राज्यपाल का पद संवैधानिक पद है

अजय पाराशर लेखक, धर्मशाला से हैं सुबह की सैर के दौरान मैंने पंडित जॉन अली से पूछा, ‘‘क्या काबुल में सचमुच गधे नहीं होते?’’ तो प्रत्युत्तर में नेता प्रति पक्ष की तरह वह प्रति प्रश्न उछालते हुए बोले, ‘क्या रात में अंधेरा नहीं होता?’ उनके आशय को समझने के बावजूद मैं विशुद्ध भारतीय चरित्र की

निश्चित रूप से मैकेंजी की बदलते हुए वैश्विक रोजगार से संबंधित रिपोर्ट के मद्देनजर देश में डिजिटल रोजगार के मौकों को बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर डिजिटल रोजगार के मौकों को बड़ी संख्या में प्राप्त करने के लिए अभी से ही रणनीतिक कदम उठाए जाने जरूरी हैं। तभी नए अवसर नई पीढ़ी की मुट्ठियों में

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं।

निर्मल असो स्वतंत्र लेखक अचानक अखबार से आए फोन के कारण मैं प्याज के दाम की तरह उछला। संपादक को भरोसा था कि मेरे जैसे लोग अब केवल हास्य ही तो पैदा कर सकते हैं, इसलिए अनुरोध था कि कुछ ऐसा लिखूं कि व्यंग्य हो जाए। वैसे मेरा अनुभव यही था, फिर जो लिखा भी

प्रेमचंद की एक कहानी है ‘कफन’! इसके दो पात्र घीसू और माधव निकम्मे और आलसी हैं। जब लड़के की पत्नी मर जाती है तो गांव वाले बाप-बेटे को कफन-दफन के लिए पैसा देते हैं जिसे ये दोनों शराब और खाने में उड़ा देते हैं। प्रेमचंद ने गरीबी की हकीकत बयान की थी, मगर कुछ लोग