
गठबंधन की बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने के लिए दीदी अब कांग्रेस और सोनिया गांधी के दरबार में मदद की गुहार लगा रही हैं। देश की सबसे कद्दावर विपक्षी चेहरा रहीं ममता बनर्जी की हकीकत अब यही है कि ‘इंडिया’ गठबंधन में किंगमेकर या प्रधानमंत्री पद की दावेदार वाली उनकी पुरानी मजबूत स्थिति अब नहीं रही। इसलिए वह इंडिया गठबंधन की शरण में हैं। कांग्रेस बेशक लोकसभा और ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर नहीं दे सकी, किन्तु गठबंधन में कांग्रेस का दबदबा है, इसलिए ममता को लगता है कि सहानुभूति पाकर कांग्रेस से डूबते को तिनका का सहारा मिल सकता है। राजनीति में जमीर को एक तरफ करके सत्ता के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। दरअसल नेताओं में नैतिकता या सिद्धांत बचा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सत्ता की
दूसरी ओर बेरोजगारी, कृषि आय, बढ़ती असमानता, महंगाई व सरकारी ऋण जैसे मसले हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत की आर्थिक प्रगति लोगों को सरकारी सहायता से आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है अथवा सहायता पर निर्भर आबादी का दायरा लगातार बढ़ रहा है...
जब से शादी हुई है, तब से पत्नी का एक ही गिला है कि मैं झूठ बोलता हूं। बात-बात पर झूठ बोलता हूं और कदम-कदम पर झूठ बोलता हूं। जब भी पत्नी गुस्से में होती है तो यह ताना जरूर मारती है कि मैंने किसी पॉलिटिशियन से शादी नहीं की थी बल्कि एक भले चंगे आदमी से की थी, लेकिन तुम तो झूठ बोलने में नेताओं से भी आगे निकल गए हो। मैं पत्नी के तानों और आरोपों पर सफाई देते-देते तंग आ गया था। आधी उम्र सफाई देने में ही बीत गई तो फिर धरती पर आने का फायदा क्या? मैंने पत्नी के तानों का जवाब देने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया और अपना नार्को टेस्ट करवा लिया। टेस्ट की रिपोर्ट भी आ गई है। मैं किसी दिन अपने फेसबुक पर इस रिपोर्ट को डाल सकता हूं, ताकि दुनिया को पता चल जाए कि बंदे ने नार्को टेस्ट करवाने की हिम्मत दिखाकर बहुत
4 जून 2024 को विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे और नवीन पटनायक की पार्टी चुनाव हार गई थी। इसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय से आई सभी फाइलें वापस कर दी। नई सरकार ने कार्यभार संभाला। स्वामी जी की हत्या की जांच कमीशन की रपट की खोज शुरू हुई। गृह मंत्रालय की अलमारियां छानी जाने लगीं। लेकिन रपट कहीं नहीं मिली। पूरी जांच करने के बाद गृह मंत्रालय ने पाया कि चार जून को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाकी सब फाइलें तो वापस आ गई थीं लेकिन स्वा
जिस तरह एथनोल उत्पादन कार्य को गंभीरता से तेज गति से बढ़ाया गया है, यदि उसी भावना से गोबर गैस उत्पादन को भी वाणिज्यिक स्तर पर प्रोत्साहन देकर आगे बढ़ाया जाए, तो बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है। इससे किसानों को भी गोबर उपलब्ध करवाने के बदले अतिरिक्त कमाई हो सकती है। जो खुद के लिए छोटा प्लांट लगा लेंगे, वे गैस सिलिंडर पर होने वाला खर्च बचा रहे होंगे। इस प्रक्रिया में गैस तो निकल जाती है, शेष गोबर डाईजेस्टर में अच्छी तरह सड़ कर बाहर आता है जो ज्यादा गुणवत्तापूर्ण खाद होता है। इसके अलावा फसलों के अपशिष्ट, पराली या गेहूं, गन्ना और कपास के अपशिष्ट भी सीएनजी, पीएनजी बनाने के लिए उपयोग कर लिए जाएं तो प्राकृतिक गैस के आयात में कमी आ सकती है...
वे गंभीर मुद्रा में मेरे यहां आए और बोले- ‘शर्मा जी इस मुल्क का क्या होगा?’ मैंने कहा- ‘अजी देश की चिंता छोडिय़े, इस समय तो यह सोचिये कि मेरा और आपका क्या होगा?’ वे बोले- ‘कभी तो सीरियस रहा करो यार। हर बात को मजाक में मत लिया करो।’ मैं थोड़ा संजीदा होकर बोला- ‘क्यों बोलो क्या बात है?’ ‘मैं पूछ रहा हूं कि इस देश का क्या होगा?’ मैं बोला- ‘आप व्यर्थ में चिंतित नहीं होवें, इस देश को कुछ नहीं होगा।’ ‘अजी होगा कैसे नहीं। पूरे नैतिक पतन के गर्त में
जब हम बार-बार उसी एक पर ध्यान लगाते हैं, तो हमारा मन शांत होने लगता है, क्योंकि अब वह इधर-उधर भटक नहीं रहा होता। यही एकाग्रता की शुरुआत है, यही ध्यान की पहली सीढ़ी है। बाबा बुल्ले शाह के भीतर जो परिवर्तन आया, वह किसी किताब से नहीं आया, वह अनुभव से आया। यह अनुभव तब जन्म लेता है जब हमारा अहंकार टूटता है। हमने अपने पूरे व्यक्तित्व को उसी के इर्द-गिर्द बना रखा है। हम जो भी करते हैं, उसमें हमेशा ‘मैं’ छिपा होता है- मैं जानता हूं, मैं कर सकता हूं, मैं श्रेष्ठ हूं। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर यही ‘मैं’ सबसे बड़ी दीवार बन जाता है। ‘रब दा की पाणा? एधरों पुट्टणा ते ओधर लाणा।’ यह वाक्य अपने आप में पूरा अध्यात्म है। हम यदि इसे गहराई से समझें, तो पाएंगे कि इसमें कोई जटिल साधना नहीं है, कोई कठिन तपस्या नहीं है। केवल एक बात कही गई है, अपना ध्यान जहां अभी
स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में भी कई चुनौतियां सामने आ रही हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, प्रशासन, जनप्रतिनिधि, व्यापारी संगठन, एनजीओ और स्थानीय नागरिक मिलकर समाधान के लिए सामूहिक प्रयास करें...
जिंदगी उस मिस्ड काल जैसी हो गई है, कि चाहे जिसके नाम उसे बजाते रहो, कोई उठाता नहीं। हां, अगर कोई मोबाइल करता है, और उसे उठा लो, तो वह अवश्य कोई नए धंधे वाला होता है। साइबर ठगी के धंधे वाला। जी हां, गुस्ताखी कर रहा हूं। आजकल न किसी काम के न काज के, नौ मन अनाज के वाले माहौल में नौ मन अनाज तो खैर कभी हमने देखा नहीं। पांच किलो अनाज अवश्य देखा है, जो सरकार रियायती अनाज की दुकान के बाहर हमारी कतार लगवा कर हमारे बीच बरसों से बांटती रहती है। पहले घोषणा हुई थी कि यह अनाज हमारे घरों तक पहुंचा दिया जाएगा। चार महीने बीतने भी नहीं पाए। अब फिर हुक्म हो ग