वैचारिक लेख

ऐसा प्रतीत होता है कि बीबीएमबी का भी गुज्जर माफिया, अवैध खेती और अन्य गतिविधियों के प्रति मूक बने रहने के पीछे स्वार्थ है...

भीषण गर्मी पड़ रही है। सूर्य भी प्रचंड हो रहा है और मुखिया का भाषण भी आग उगल रहा है। यानी भाषण और गर्मी की दोहरी मार पड़ रही है। भाषण अटैची से शुरू होता है और अटैची पर खत्म हो जाता है। पब्लिक प्रचंड गर्मी से भी हलकान है और नेताजी के ‘राग अटैची’ की रहस्यमयी गुत्थी सुलझाने में भी नाकाम है। पब्लिक जगह-जगह पूछ रही है कि अटैची दिए गए थे तो अटैची गए कहां? जब अटैची दिए जा रहे थे तो सरकार कहां सोई थी और सरकार की सीआईडी कहां सोई थी? जब सरकार भी सोई थी और खुफिया एजेंसियां भी सोई थी, तो फिर जाग कौन रहा था? सरकार के बारे में तो माना जा सकता है कि सत्ता के नशे में चूर होकर सोई हुई थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डा. हेडगेवार के समय से लेकर डा. मोहन भागवत तक के काल में देश के इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों से बावस्ता रहा है और प्रयास करता रहा है कि देश की राजनीति देश की समाज रचना और संस्कृति के केन्द्र बिन्दु के इर्द-गिर्द निर्मित होनी चाहिए...

इस तरह हर जिले में किसी न किसी खेल के लिए प्ले सुविधा उपलब्ध है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि अच्छे प्रशिक्षकों व पूर्व खिलाडिय़ों को बुलाकर शिक्षा व खेल विभाग मिलकर खेल अकादमियां खोल दें। प्रदेश के दूरदराज शिक्षा संस्थानों में भी उपलब्ध खेल

अवैध निर्माण तथा अतिक्रमण की परम्परा हमारे यहां अनादि काल से चली आ रही है। आज जो किले, महल तथा बड़े-बड़े पुरातत्व स्थल हम देखते हैं, वे सब इसी श्रेणी में आते हैं। राजा की जितनी इच्छा हुई उतनी ही जमीन पर निर्माण कर दिया तथा बेगार रूप में श्रमिकों का शोषण कर लिया। उसी परम्परा का निर्वहन हमारे देश में इन दिनों बखूबी किया जा रहा है। ‘सबहि भूमि गोपाल की’ की तर्ज पर भारतीय नागरिक भूमि हड़पो अभियान के कुशल खिलाड़ी बनकर निर्माण एवं अतिक्रमण की दिशा में सक्रिय हैं। ‘राम नाम की लूट है’ वाला मुहावरा भी इस समय पूरी तरह चरितार्थ हो रहा है या यह भी कह सकते हैं कि ‘सैंया भये

यही वजह भी है कि इनकी शिक्षाओं को विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण के दृष्टिगत स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित किया गया है। बुद्ध का शाब्दिक अर्थ है जागा हुआ, एनलाइटेन्ड अर्थात जिसे सत्य और आत्मज्ञान की प्राप्ति हो चुकी हो। यहां इसका तुच्छ अर्थ केवल राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ से नहीं है, बल्कि उनके पहले भी अनेक समाधिस्थ व्यक्तियों को चैतन्यता, स

हम किसी भी धर्म, संप्रदाय, मत को मानते हों, हमारे इष्ट देव कोई भी हों, उसे बदलने की जरूरत नहीं है। बदलना है सिर्फ अपना नजरिया, अपना जीवन, अपना लाइफस्टाइल। इससे ही सब बदल जाएगा। सहज संन्यास मिशन के हम सब अनुयायियों का मानना है कि यदि हम जीवन का सम्मान करें, अपने मन को बुराइयों से दूर रखें, अपनी वाणी से किसी को चोट न पहुंचाएं, बुराइयों को दूर करने के लिए उचित प्रयत्न करें, अपने विचारों को अनियंत्रित न होने दें, सबकी भलाई के लिए काम

क्या कभी वे दिन भी आ जाएंगे, जबकि भरपूर मेहनत करने वाला अपमानित, लांछित और निर्वासित होकर किसी विरोधी धरना प्रदर्शन करने के काबिल भी नहीं रह जाएगा? पहले की तरह ही छुटभैये सभी अदब कायदे तोड़ कर पहचान के शिखर पर बैठ कर अब भी मुस्कराते रहेंगे। ऐसा सवाल पूछने वाले आजकल उजबक कहलाते हैं। वे दिन बीत गए, जब आत्मविश्वास से भरे हुए दृढ़-प्रतिज्ञ लोग रुक कर अजनबी धरती के किसी भी कोने पर पांव टिका कर कह देते थे कि ‘हम जहां खड़े हो गए, कतार वहां से ही शुरू हो जाती है।’ आज अंतरराष्ट्रीय मानक संस्थानों से लेकर भ्रष्टाचार को मापने वाली ट्रांस्पेरेंसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसी संस्थाएं

आज राजनीति में रसूख से कुछ भी हो सकता है। कद्दावर नेताओं ने अपनी जिंदगी में रसूख का इस्तेमाल कर महिलाओं के साथ ज्यादतियां भी की हैं। आज सेक्स शोषण के डर से महिलाएं राजनीति में आने से गुरेज करती हैं। क्या यह सच नहीं है कि बॉलीवुड के कास्टिंग काउच की तरह महिलाओं के लिए भी राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करने का रास्ता पॉलिटिकल बेडरूम से होकर नि