वैचारिक लेख

व्यर्थ पैसा जो भवनों, इमारतों, दफ्तरों, अपनी सुविधाओं के लिए दिल खोल कर लगाया जा रहा है, उस सभी को स्वास्थ्य सुविधा के लिए दे देना चाहिए। बजाय इसके कि सरकार पेंशनरों को भी न बख्शे… हमारे मुख्यमंत्री उन्हीं गांव से हैं जिनसे हम सभी हैं। गांव का परिवेश बहुत स्वच्छ, सुंदर, सकारात्मक और विनम्र

डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट आरगेनाइजेशन यानी डीआरडीओ भारतीय सेना के नान फाइटिंग डिफेंस सिविलियन विंग का महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसका मुख्य उद्देश्य सेना के लिए जरूरी हर चीज़ की खोजबीन करना तथा जो सामान सेना के पास किसी दूसरे जरिए से आया है, उसका सेना की जरूरत के हिसाब से विकास करना है। जब इन

क्या खेल विभाग के साथ मिलकर इन खिलाड़ी सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए मंच उपलब्ध नहीं करवाया जा सकता है? विद्यालयों के प्रधानाचार्यों व शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को चाहिए कि वे खेल सुविधा व प्रतिभा के अनुसार अपने विद्यालय में अच्छे प्रशिक्षकों के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएं ताकि हिमाचल के खिलाडि़यों

भारत ने ट्रिप्स प्रावधानों में छूट की गुहार लगाई है, किंतु कई देश अड़ंगा डाल रहे हैं। ऐसे में सरकार को ये अनिवार्य लाइसेंस तुरंत देने चाहिएं ताकि महामारी से त्रस्त जनता को कंपनियों के शोषण से बचाया जा सके… आज कोरोना वायरस, जिसे चीनी या वुहान वायरस भी कहा जा रहा है, ने लगभग

हमारे सुपुत्र बरखुरदार चिरंजीत कुलभूषण उर्फ बंटी साहब सरकार से कहां कम हैं? जो लक्ष्य सरकार एक पंचवर्षीय योजना में नहीं प्राप्त कर पाती है, भला वे क्यों पांच वर्ष में दसवीं कक्षा पास कर लेते। फख्र का विषय तो यह है कि वे इस बार छठी बार परीक्षा देने के बाद भी वही फेल

जीवन में हम अक्सर देखते हैं कि हमारे ज्यादातर रिश्तों में मिठास नहीं रही, गर्मी नहीं रही और वो धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। रिश्ते तो ऐसे होने चाहिएं जो सार्थक हों, जिनमें खुशी मिले और परिपूर्णता महसूस हो। सभी तरह की खोजों का नतीजा यह है कि जिन रिश्तों में बातचीत चलती रहती है,

आज घरों में कैद विद्यार्थी सिर पर हाथ लिए बैठने और अपने भविष्य की चिंता करने के अलावा किसी अन्य स्थिति में नजर नहीं आ रहा है। मानो मानसिक दबाव, तनाव, चिंता और कोरोना की भयंकर लहर सब कुछ नष्ट करने को आतुर सी हो, ऐसा प्रतीत होता है। लेकिन इन युवा विद्यार्थियों को चिंता

वह पूरी उम्र एक चेहरे, एक नाम और एक पहचान की तलाश में रहे, लेकिन एक आंकड़ा बनकर रह गए। चचा गालिब ने इनकी हालत देखकर कब्र में करवट बदली होगी। आखिरी दिनों में उनकी दृष्टि चली गई थी। आखिरी दिनों तक वह अपने शागिर्दों को संदेश से परहेज नहीं करते थे। जाते-जाते भी कह

राज्यों को इनके घरों के पास कामकाज के इंतजाम करने होंगे। यह ग्रामीण व्यवस्था को सुदृढ़ करने से मुमकिन हो सकेगा। रोजगार की परिकल्पना नए सिरे से किए जाने की जरूरत है… प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल की शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि राज्य प्रवासी मजदूरों का भरोसा जगाए रखें और