हिमाचल के ग्लेशियरों में तैयार हो रहे 48 वॉटर बम, ब्यास-सतलुज में आ सकती है तेज बाढ़, भारी नुकसान का खतरा

झीलों का बढ़ता आकार और पानी की मात्रा बढ़ा रही टेंशन, ब्यास-सतलुज में आ सकती है तेज बाढ़, भारी नुकसान का खतरा

दिव्य हिमाचल ब्यूरो-मंडी

हिमाचली ग्लेशियरों में 48 वाटर बम पल रहे हैं। यह वाटर बम फटे, तो हर तरफ तबाही का मंजर ही नजर आएगा। इनके फटते ही ब्यास और सतलुज नदियां प्रचंड वेग में बहेंगी। भारतीय रिजन हिमालय में ग्लेशियर झीलों की संख्या दो हजार के आसपास बताई जा रही है। इन झीलों के बढ़ते आकार और पानी की मात्रा पर मंडी आईआईटी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग विंग ने शोध किया है। आईआईटी के इस शोध में ही खुलासा हुआ है कि हिमाचल के ग्लेशियरों में खतरनाक 48 वाटर बम तैयार हुए हैं।

घेपन मठ झील का आकार अब तक 178 फीसदी तक बढ़ गया है। समुद्रा टापू ग्लेशियर झील में 24.7 मिलियन घन मीटर पानी भरा हुआ है और वासुकी झील 13.4 हेक्टेयर में फैली हुई है। आईआईटी के शोध के तहत यह भी पता लगाने की कोशिश की गई है कि इन झीलों के आकार और पानी के बढते दवाब का कारण क्या है। मंडी आईआईटी इन झीलों पर साल 2015-16 से शोध कर रहा है। इसका डेटा विश्लेषण भी किया जा रहा है। एनडीएमए ने भी भारतीय हिमालय क्षेत्र में कुल 195 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित की हैं। इनमें से 67 झीलों को बहुत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा हैं।

घेपन झील :-

लाहुल-स्पीति घेपन झील सबसे ज्यादा रिस्की मानी जा रही है। यह सिस्सू के ऊपर, चंद्रा बेसिन में बनी है। इसका आकार 1.07 से 1.21 वर्ग किलोमीटर है और बीते 33 सालों में इसके आकार में करीब 178 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। इसमें 24.1 से 35 मिलियन घन मीटर पानी भरा हुआ है। इस झील को सबसे उच्च जोखिम वाला माना गया है। इसकी अधिकतम गहराई 46 मीटर के आसपास है। इसकी चपेट में सिस्सू, लाहुल घाटी, मनाली-लेह हाई-वे सहित अटल टनल के भी प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई है।

पारछू झील :-

किन्नौर और लाहुल सीमा पर पारछू झील स्वरूप में आई है। यह दस हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में फैली है।

समुद्रा टापू झील :-

लाहुल-स्पीति में ही समुद्रा टापू झील चंद्रा बेसिन में मौजूद है। इसका आकार 1.63 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 24.7 मिलियन घन मीटर पानी होने का अनुमान है। इसकी गहराई 59 मीटर तक हो सकती है। इससे चंद्रा घाटी को खतरा है।

हिम्सू, कलका झील:-

हिमाचल में हिम्सू, कलका को भी खतरनाक माना है। यह झीलें ब्यास औड्डर सतलुज बेसिन में हैं और यज्ञ 0.02 से 0.36 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई हैं।

वासुकी झील :-

कुल्लू के सोसन पार्वती बेसिन में वासुकी झील को भी खतरनाक माना जा रहा है। यह झील 13.4 हेक्टेयर में फैली है और इसमें 2.16 मिलियन घन मीटर पानी भरा है। इसकी चपेट में पार्वती और मणिकर्ण घाटी संवेदनशील हो गई है।

सांगला-बास्पा झील :-

सांगला घाटी में सांगला-बास्पा झील 14 से 19 हेक्टेयर भूमि में फैली हुई है और इसमें 1.5 मिलियन घन मीटर पानी जमा होने का अनुमान है। इसकी चपेट में बास्पा नदी और कुछ हाइडल प्रोजेक्ट आ सकते हैं।

प्रदेश सरकार ने भी माना खतरंनाक

आईआईटी रोपड़ के अध्ययन में नौ झीलें बहुत उच्च खतरा की श्रेणी में रखी हैं। इन झीलों के फटने की स्थिति में ब्यास नदी में 1385 घन मीटर प्रति सेकेंड और सतलुज में 3500 घन मीटर प्रति सेकेंड पीक डिस्चार्ज की संभावना है। हिमाचल में एनडीएमए ने 67 झीलों को खतरनाक की श्रेणी में रखा है। राज्य स्तर पर घेपन, सिस्सू, पारछू और सांगला क्षेत्र की झीलें खतरनाक माना है। इन झीलों के फटने से अस्थिर मोरेन बांध, भूकंप, रॉकफॉल, आइस कोर पिघलना मुख्य ट्रिगर। डाउनस्ट्रीम में बस्तियां, सडक़ें, हाइड्रो प्रोजेक्ट, कोलडैम, बास्पा, पंडोह आदि प्रभावित हो सकते हैं।

ग्लेशियर झीलों पर आएगा शोध पत्र

मंडी आईआईटी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग विंग प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने बताया कि ग्लेशियर झीलों का आकार बढ़ रहा है। इन पर शोध किया गया है। 2000 झीलों पर आईआईटी की टीम आकार और पानी की मात्रा का विश्लेषण कर रही है । इसको लेकर एक शोध पत्र भी जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।