भारत पर मंडराया बड़ा खतरा, अगले 6 महीने ला सकते हैं महासंकट, लोग झेल सकते हैं भुखमरी की मार

भारत में मानसून इस बार कम बारिश के साथ खत्म हो रहा है। मानसून की विदाई के साथ ही मौसम विज्ञानियों और जलवायु वैज्ञानिकों ने एक ऐसी चेतावनी जारी की है, जो हैरान कर देने वाली है। ​इस बार मानसून कमजोर बारिश के साथ भले ही विदा हो रहा हो, लेकिन आने वाले महीने भारत समेत पूरी दुनिया के लिए बहुत भारी पड़ने वाले हैं। प्रशांत महासागर की गहराइयों में एक ऐसा खतरा सुलग रहा है जो तबाही मचा सकता है और बो खतरा है सुपर अल नीनो

यह किस हद तक खरतनाक हो सकता है ये बताने से पहले यह जानना जरुरी है कि आखिर सुपर अल नीनो है क्या और इसकी स्तिथि कैसे बनती है अल नीनो एक प्राकृतिक और मौसमी जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर में होती है। इस दौरान मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इससे पूरे इलाके में तापमान बढ़ जाता है। इसकी वजह से दुनियाभर में मौसम, हवाओं और बारिश का पैटर्न बदल जाता है। इसके कारण दुनिया के कुछ इलाकों में बारिश और बाढ़ आती है, जबकि कुछ इलाकों को भीषण गर्मी और सूखे सामना करना पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में क्या होता है की भूमध्य रेखा के पास चलने वाली जो व्यापारिक हवाएं है वो गर्म पानी को पूर्व से पश्चिम की तरफ धकेलती हैं। यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ लेकर जाती है। लेकिन अल नीनो के समय ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी वापस पूर्व की तरफ पेरू के तटों की ओर इकट्ठा होने लगता और समुद्र का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है। जब तापमान में यह वृद्धि 2°C से अधिक हो जाती है, तो इसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है। भारत के वैज्ञानिकों का मानना है कि ट्रॉपिकल पैसिफिक में अल नीनो के चेतावनी वाले संकेत पहले ही दिख रहे हैं। समुद्र की सतह का तापमान 0.5°C की सीमा से ऊपर बढ़ गया है और अगस्त में 2.6°C तक पहुंच गया है। वैज्ञानिकों के बताए गए अनुमानों से पता चलता है कि तापमान में अंतर 4°C से ऊपर जा सकता है। ​यह सिर्फ गर्मी या तापमान बढ़ने की बात नहीं है, बल्कि यह संकट हमारी थाली से खाना भी छीन सकता है।

शिकागो विश्वविद्यालय के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के एक नए अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में चल रहे ‘सुपर अल निनो’ के कारण सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनियाभर में करीब 4 लाख 51 हजार अतिरिक्त गर्मी से जुड़ी मौतें हो सकती हैं। इनमें भारत में लगभग 15,800 अतिरिक्त मौतें शामिल हैं। यह अनुमान सितंबर से फरवरी 2027 तक के लिए है। लेकिन भीषण गर्मी जून या जुलाई 2027 तक जारी रहने की संभावना है। ​इस भयंकर गर्मी का असर इंडोनेशिया, भारत, नाइजीरिया से लेकर अमेरिका तक देखने को मिलेगा। इसके साथ ही सूखा, जंगलों की भीषण आग और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भारी तबाही की आशंका जताई गई है।

वर्तमान में धरती को गर्म कर रहा यह अल नीनो अपने अनुमानित शिखर पर पहुंचने से महीनों पहले ही रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज कर चुका है। वैज्ञानिकों ने गर्मी के इस अप्रत्याशित रूप को गॉडजिला लेवल करार दिया है। हालांकि अल नीनो एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन इंसानी गतिविधियों और ग्लोबल वार्मिंग ने इसे जानलेवा बना दिया है। इस अध्ययन में दुनिया भर के 24,000 से अधिक क्षेत्रों के मौसमी तापमान और मौतों पर इसके स्थानीय प्रभाव के आंकड़ों को शामिल किया गया है। शोधकर्ताओं ने जून 2026 से फरवरी 2027 के पूरे अल नीनो काल के दौरान संभावित तापमान की तुलना पिछले तीन दशकों के औसत तापमान से की है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सका है कि इस बार अत्यधिक गर्मी के कारण कितनी अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।

अल नीनो न केवल मौतों का कारण बनेगा, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति को भी बुरी तरह तबाह करेगा। ‘वर्ल्ड फूड प्रोग्राम’ के अनुसार, इसके प्रभाव से दुनिया भर में लगभग 5 करोड़ लोग गंभीर भूख का सामना करेंगे और खाद्यान्न की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इतना ही नहीं ​भारत के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और इकोलॉजिकल एक्सपर्ट्स ने इस सुपर अल नीनो को लेकर गंभीर चिंता जताई है। साथ ही इसके लिए तैयार रहने की अपील पर हस्ताक्षर भी किए हैं। इस घटना का देश की प्राकृतिक प्रणालियों पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। यह संकट किसानों, मछुआरों और चरवाहों की आजीविका पर भारी दबाव डालेगा। इसके अलावा, कोरल ब्लीचिंग, जंगलों में आग की घटनाएं और वर्षावनों के बड़े पेड़ों को नुकसान जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। जानवरों के व्यवहार में बदलाव और फलों के उत्पादन में देरी जैसे इकोलॉजिकल बदलाव भी देखने को मिलेंगे।

हिमाचल प्रदेश जैसे हमारे अपने राज्यों में जहाँ पहले ही मानसून फीका रहा है, वहाँ आने वाले दिनों में सूखा, जंगलों की आग और पानी का संकट गहरी चिंता का विषय बन गया है। इस बार मानसून के दौरान हिमाचल प्रदेश में सामान्य से 10% कम वर्षा दर्ज की गई है। ऐसे में आने वाले समय में प्रदेश में कम बर्फबारी, कम बारिश और तापमान में भारी बढ़ोतरी जैसे गंभीर और अप्रत्याशित मौसम बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ‘क्लाइमेट इंपैक्ट लैब’ के सह-संस्थापक और शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा 4,51,000 मौतों का यह आंकड़ा चौंकानेवाला लग सकता है। लेकिन इसमें सभी लोग शामिल हैं। वहीं यूसी बर्कले की डॉ. तम्मा कार्लटन का कहना है कि आपातकालीन व्यवस्था और बेहतर तैयारियों से कई जानें बचाई जा सकती हैं। जैसे –गर्मी और लू की समय पर चेतावनी देना, लोगों को गर्मी से राहत दिलाने के लिए शेल्टर बनान, भीषण गर्मी के दिनों में अस्पतालों में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की तैनाती बढ़ाना। और कड़क धूप और गर्मी में बाहर काम करने वाले मजदूरों के लिए नियम व सुरक्षा तय करना। ​वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि भले ही यह एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन इंसान की लापरवाही और बढ़ते प्रदूषण ने इसे खतरनाक बना दिया है।