15 साल बाद इस बार जन्माष्टमी पर बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए क्या है आधी रात खीरा काटने की परंपरा का सच

इन दिनों हर गली महोल्ला, बाजार आपको कृष्ण रंग में रंगा हुआ नजर आ रहा होगा, कहीं बाल गोपाल का साज श्रंगार का सामान बाजारों की शोभा बढ़ा रहा है तो कहीं नन्हें बाल गोपाल और राधा रानी के रूप में तैयार बच्चे साक्षात कान्हा का रूप लग रहे हैं। चारों तरफ इस उत्साह की वजह है जन्माष्टमी, जो कि 4 सितंबर को मनाई जाएगी। इस बार की जन्माष्टमी सिर्फ कान्हा के जन्मोत्सव की वजह से ही खास नहीं है, बल्कि करीब 15 साल बाद अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का ऐसा संयोग बन रहा है, जिसे बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र के दौरान हुआ था। यही वजह है कि इस संयोग को कृष्ण जन्म से विशेष रूप से जोड़कर देखा जाता है। श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार और श्रीविष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है जन्माष्टमी सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि धर्म, आस्था और भक्ति का उत्सव है। इस दिन देशभर के मंदिरों में विशेष सजावट होती है, बाल गोपाल को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और रात 12 बजे उनके जन्म का उत्सव मनाया जाता है। अब बात करते हैं तिथि और शुभ महुर्त की।

इस बार अष्टमी तिथि 4 सितंबर को करीब 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होकर 5 सितंबर की रात करीब 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात करीब 12 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर 5 सितंबर की रात करीब 11 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। यानी इस बार जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग विशेष चर्चा में है। अब बात करते हैं कि जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा किस तरह की जाए। आमतौर पर भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और रात में भगवान कृष्ण के जन्म के बाद व्रत खोलते हैं। आधी रात को बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं, पालने में झुलाया जाता है और फिर माखन-मिश्री, पंजीरी, पंचमेवा, फल और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। पूजा में तुलसी दल रखना भी विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

लेकिन जन्माष्टमी की पूजा में एक ऐसी चीज भी होती है, जिसे देखकर अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है—आखिर आधी रात को खीरा क्यों काटा जाता है। दरअसल कई क्षेत्रों की धार्मिक लोक-परंपराओं में खीरे को नवजीवन और जन्म का प्रतीक माना जाता है, खीरे को भगवान कृष्ण के जन्म से पहले गर्भ के प्रतीक के रूप में रखा जाता है और मध्यरात्रि में उसे काटकर कृष्ण जन्म का उत्सव मनाने की परंपरा है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और कृष्ण जन्मोत्सव को एक अलग ही आध्यात्मिक भाव देती है। इसी के साथ जन्माष्टमी पर खान-पान को लेकर भी विशेष सावधानी रखी जाती है। अगर आपने व्रत रखा है तो व्रत के नियमों का पालन करें और अगर व्रत नहीं रखा है, तब भी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मांसाहार और तामसिक भोजन से बचना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन करना और मन-वचन-कर्म से शुद्धता बनाए रखना विशेष महत्व रखता है।

वहीं अगर कोई व्यक्ति हर साल जन्माष्टमी का व्रत रखता है लेकिन किसी वजह से इस बार व्रत नहीं कर पा रहा है, तो अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में दान, सेवा और जरूरतमंद को भोजन कराने को पुण्यकारी माना गया है। इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद को भोजन कराना, दान देना या सेवा करना इस दिन की भावना के अनुरूप माना जा सकता है। अब बात उस समय की, जिसका भक्तों को सबसे ज्यादा इंतजार रहता है—कान्हा के जन्म का शुभ मुहूर्त। इस साल निशीथ काल करीब रात 11 बजकर 57 मिनट से 5 सितंबर की रात 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इसी दौरान भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा। मध्यरात्रि का क्षण करीब 12 बजकर 21 मिनट माना जा रहा है। यही वह समय होगा जब मंदिरों में भक्त बाल गोपाल के जन्म की खुशी में झूम उठेंगे। हालांकि पूजा से जुड़े समय स्थानीय पंचांग के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं। वहीं शुक्रवार को राहुकाल सुबह करीब 10 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। ऐसे में शुभ कार्यों के लिए स्थानीय पंचांग की सलाह लेना बेहतर रहेगा।