संस्मरण साहित्य का मूल स्वभाव केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उसे वर्तमान की चेतना में पुन: जीना है। बीता हुआ समय जब स्मृति में लौटता है तो वह घटनाओं का सिलसिला भर नहीं रहता, उसमें रिश्ते, शहर, चेहरे, संघर्ष, सुख-दु:ख और जीवन से अर्जित अनुभव भी शामिल हो जाते हैं। सूरज प्रकाश की पुस्तक ‘उम्र की गुल्लक’ इसी अर्थ में एक आत्मीय और बहुआयामी संस्मरण-संग्रह है। इसका शीर्षक ही पुस्तक के मर्म को व्यक्त करता है- मनुष्य जाने-अनजाने जीवन की छोटी-बड़ी घटनाओं को स्मृतियों की गुल्लक में जमा करता रहता है। पुस्तक की आरंभिक कविता में यह भाव अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त हुआ है- ‘सब कुछ भरता रहता है/उम्र की गुल्लक में/चाहे-अनचाहे/जाने-अनजाने।’ बचपन की कोई घटना, दोस्ती, शिक्षक की डांट, किसी प्रिय व्यक्ति की स्मृति या कोई मामूली-सी घटना समय के साथ इसी गुल्लक में जमा होती रहती है। वर्षों बाद पीछे मुडक़र देखने पर यही छोटी-छोटी स्मृतियां जीवन का अनमोल खजाना बन जाती हैं। पुस्तक की संरचना भी इसी स्मृति-दृष्टि के अनुरूप है। संस्मरण मुख्यत: तीन हिस्सों- कुछ चेहरे, कुछ शहर और ‘मैं’ में विभाजित हैं। ‘कुछ चेहरे’ में लेखक अपने साहित्यिक मित्रों, सहयात्रियों और उन व्यक्तित्वों को याद करते हैं जिन्होंने उनके जीवन और लेखन को प्रभावित किया। काशीनाथ सिंह, प्रेम जनमेजय, धीरेंद्र अस्थाना, नीलम बशीर, शेखर जोशी, शमशेर, श्रीलाल शुक्ल, विनोद भट्ट आदि के प्रसंग केवल व्यक्तिचित्र नहीं, बल्कि हिंदी साहित्यिक संसार की एक जीवंत तस्वीर भी प्रस्तुत करते हैं। इन संस्मरणों की विशेषता यह है कि लेखक अपने पात्रों को केवल श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देखते, बल्कि उनके मानवीय पक्षों को भी पकड़ते हैं। शरद जोशी के प्रसंग से उन्हें यह जीवन-संदेश मिलता है कि ‘बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा-सा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है।’ यह कथन उनके लिए महज किसी वरिष्ठ साहित्यकार की टिप्पणी नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का सूत्र बन जाता है। लेखक की दृष्टि आत्मप्रशंसा से मुक्त है, वे अपने साहित्यिक संबंधों के माध्यम से व्यक्तित्वों के विविध आयाम पाठक के सामने रखते हैं। ‘कुछ शहर’ खंड में देहरादून, अहमदाबाद और मुंबई केवल भौगोलिक स्थान नहीं रह जाते, बल्कि लेखक के व्यक्तित्व-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। देहरादून बचपन और किशोरावस्था का शहर है, अहमदाबाद जीवन के एक महत्त्वपूर्ण दौर का और मुंबई कर्मक्षेत्र का। लेखक का यह कथन- ‘कोशिश करूंगा यह बताने की कि कितना तो बनाया उस मोहल्ले ने मुझे और कितना बनने से रोका बार-बार मुझे।’, बताता है कि शहर मनुष्य को केवल रहने की जगह नहीं देता, वह उसके व्यक्तित्व को गढ़ता भी है और उसकी सीमाएं भी निर्धारित करता है। इसी खंड में चालीस वर्ष बाद पुराने स्कूल लौटने का प्रसंग विशेष रूप से मार्मिक है। अतीत की स्मृतियों को फिर से जीने की आकांक्षा और वर्तमान में विद्यालय की बदहाल स्थिति से उपजी निराशा निजी स्मृति को व्यापक सामाजिक प्रश्न में बदल देती है।
इस तरह संस्मरण व्यक्ति से निकलकर समाज तक पहुंचता है। तीसरा खंड ‘मैं’ सबसे अधिक आत्मपरक है। इसमें लेखक अपने जीवन, परिवार, पिता और रिश्तों से जुड़ी उन छोटी-बड़ी घटनाओं को सामने रखते हैं जिन्होंने उन्हें भीतर से बदला। ‘पिता और मैं’ में पिता-पुत्र संबंध की जटिल आत्मीयता दिखाई देती है, जबकि ‘नमक के बहाने’ जैसी मामूली घटना बदलते सामाजिक संबंधों पर गहरी टिप्पणी बन जाती है- ‘चम्मच भर नमक लायक संबंध भी नहीं रहे हैं हमारे।’ साधारण घटना से असाधारण अर्थ निकाल लेना लेखक की संस्मरण-दृष्टि की बड़ी शक्ति है। मोबाइल ने बचायी हमारी जान, वह यादगार घटना, बायें पैर की चप्पल, वो होली और ‘कठपुतली का खेल’ जैसे संस्मरण जीवन के विविध रंगों को सामने लाते हैं। भाषा सहज, आत्मीय, संवादधर्मी और कहीं-कहीं बेबाक है। लेखक की शैली में किस्सागोई का आकर्षण है। वे घटनाओं को केवल बताते नहीं, उनका दृश्य पाठक के सामने उपस्थित कर देते हैं। काशीनाथ सिंह से जुड़े प्रसंग में ‘काशी का अस्सी’ की दुनिया का मुंबई में पुनर्निर्माण इसका सुंदर उदाहरण है। हास्य, विस्मय और आत्मीयता का यह मेल पुस्तक को पठनीय बनाता है। पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मस्वीकृति और आत्मालोचन भी है। लेखक अपने बारे में बने भ्रमों के टूटने की बात करते हैं। यही ईमानदारी संस्मरण को आत्मप्रशंसा से बचाती है और उसे आत्मावलोकन का स्वर देती है। स्वयं के भीतर झांकने की यह क्षमता पुस्तक को केवल घटनाओं का वृत्तांत न बनाकर आत्मा की यात्रा में बदल देती है। आधुनिक तकनीक भी पुस्तक के अनुभव-संसार में उपस्थित है। ‘मेरे लिखने का कमरा मेरे मोबाइल में समा गया है’ में लेखक लिखते हैं- ‘यह है मेरे लिखने का कमरा, जो अपनी पूरी सुविधाओं के साथ मोबाइल फोन में समा गया है।’ यहां कमरा भौतिक स्थान से आगे बढक़र लेखक की रचनात्मक दुनिया का रूपक बन जाता है। कुल मिलाकर ‘उम्र की गुल्लक’ केवल संस्मरणों का संग्रह नहीं, बल्कि एक लेखक की अपने समय, समाज, मित्रों, शहरों और स्वयं के साथ की गई आत्मीय बातचीत है। संभावना प्रकाशन, हापुड़ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 395 रुपए है।
-अजय पाराशर