हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के दिन भुवनेश्वरी जयंती मनाई जाती है। देवी भुवनेश्वरी दस महाविद्याओं में से चतुर्थ महाविद्या हैं। मां भुवनेश्वरी शक्ति का आधार हैं तथा प्राणियों का पोषण करने वाली हैं। मां भुवनेश्वरी जी की जयंती इस बार 23 सितंबर के दिन मनाई जाएगी। देवी भुवनेश्वरी को भुवनेश्वर रुद्र की शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। देवी भुवनेश्वरी अपने भक्तों को अभय सहित नाना प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। गृहस्थजन, संतान प्राप्ति की कामना से देवी भुवनेश्वरी की आराधना करते हैं। देवी पुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार, मूल प्रकृति ही स्वयं देवी भुवनेश्वरी के रूप में विद्यमान है। देवी भुवनेश्वरी को वामा, ज्येष्ठा एवं रौद्री आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है। ये देवी स्वयं ही शताक्षी एवं शाकंभरी देवी के रूप में विराजमान है। देवी भुवनेश्वरी संपूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी है, वह स्वयं ही संपूर्ण सृष्टि के रूप में विद्यमान है। देवी भुवनेश्वरी आदि शक्ति के रूप में भी लोकप्रिय है। देवी भुवनेश्वरी अपने भक्तों को संतान, धन, ज्ञान तथा सौभाग्य आदि प्रदान करती हैं। देवी भुवनेश्वरी मणिद्वीप पर निवास करती हैं। इनका स्वरूप कांति पूर्ण एवं सौम्य है। देवी अपने तेज से संपूर्ण सृष्टि को देदिप्यमान करती हैं। मां भुवनेश्वरी की साधना से शक्ति, लक्ष्मी, वैभव और उत्तम विद्याएं प्राप्त होती हैं। इन्हीं के द्वारा ज्ञान तथा वैराग्य की प्राप्ति होती है। इनकी साधना से सम्मान की प्राप्ति होती है। महानिर्वाण तंत्र में वर्णित है कि समस्त महाविद्याएं देवी भुवनेश्वरी की सेवा में तत्पर रहती हैं तथा सात करोड़ मंत्र देवी मां की उपासना में लीन रहते हैं।
देवी भुवनेश्वरी जयंती कथा- देवी भागवत में प्राप्त वर्णन के अनुसार, एक समय दुर्गम नामक एक दैत्य ने अपने अत्याचारों से समस्त देवी-देवताओं को त्रस्त कर दिया। दुर्गम दैत्य के अधर्म से व्याकुल होकर देवताओं एवं ब्राह्मणों ने हिमालय पर्वत पर भगवती भुवनेश्वरी की आराधना की। देवताओं एवं ब्राह्मणों की आराधना से प्रसन्न होकर देवी स्वयं वहां बाण, कमल पुष्प तथा शाक, मूल आदि लिए हुए प्रकट हुई थीं। देवी मां ने नेत्रों से सहस्रों जल धाराएं प्रकट कर दीं, जिससे पृथ्वी लोक के समस्त प्राणी तृप्त हो गए। देवी माता के नेत्रों से उत्पन्न अश्रुधाराओं के कारण समस्त नदियों एवं समुद्रों में अथाह जल भर गया तथा समस्त पेड़-पौधे, जड़ी-बूटी तथा औषधीयों की सिंचाई हो गई। देवी भुवनेश्वरी ने दुर्गमासुर से युद्ध किया तथा उसे परास्त कर देवताओं पर आए घोर संकट का निवारण किया। दुर्गमासुर का अंत करने के कारण देवी भुवनेश्वरी देवी दुर्गा के नाम से प्रतिष्ठित हो गईं।
श्री भुवनेश्वरी पूजा- मां भुवनेश्वरी की साधना के लिए कालरात्रि, ग्रहण, होली, दीपावली, महाशिवरात्रि, कृष्ण पक्ष की अष्टमी अथवा चतुर्दशी शुभ समय माना जाता है। लाल रंग के पुष्प, नैवेद्य, चंदन, कुमकुम, रुद्राक्ष की माला, लाल रंग इत्यादि के वस्त्र को पूजा-अर्चना में उपयोग किया जाना चाहिए। लाल वस्त्र बिछाकर चौकी पर माता का चित्र स्थापित करके पंचोपचार और षोडशोपचार द्वारा पूजन करना चाहिए।