मोहिनी सूद—सोलन
Solan 54th Foundation Day: जिसने पानी पिया बघाट का, वह होकर रह गया बघाट का। सोलन को लेकर कही जाने वाली यह कहावत आज भी यहां की बदलती तस्वीर पर पूरी तरह सटीक बैठती है। रोजगार, कारोबार और बेहतर भविष्य की तलाश में वर्षों पहले सोलन पहुंचे कई लोग यहीं के होकर रह गए। बाहर से आए लोगों ने सोलन को अपना घर बनाया, तो सोलन ने भी उन्हें अपनेपन के साथ अपनाया। यही कारण है कि आज शहर की आबादी और स्वरूप दोनों में बड़ा बदलाव नजर आता है। एक सितंबर, 1972 को जिला बनने के बाद सोलन ने विकास की लंबी यात्रा तय की है और आज यह हिमाचल प्रदेश के प्रमुख आर्थिक केंद्रों में अपनी पहचान बना चुका है। सोलन जिला बनने के समय सोलन शहर एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था। उस समय शहर की आबादी करीब 10 हजार के आसपास थी। लोअर बाजार, चौक बाजार और गंज बाजार जैसे बाजार जरूर थे, लेकिन ज्यादातर दुकानें एक मंजिला हुआ करती थीं। दुकान के पीछे ही परिवार का घर होता था और बाजार में कहीं-कहीं दो मंजिला भवन ही नजर आते थे। समय के साथ शहर का विस्तार होता गया और आसपास के गांव भी धीरे-धीरे शहरी क्षेत्र में शामिल होते चले गए। कंडाघाट, धर्मपुर और कसौली तक नई कालोनियां और रिहायशी क्षेत्र विकसित हुए। आज सोलन शहर और आसपास के क्षेत्र की आबादी करीब एक लाख के आसपास पहुंच चुकी है।
सोलन की आर्थिक तरक्की में बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ यानी बीबीएन औद्योगिक क्षेत्र का सबसे बड़ा योगदान रहा है। बीबीएन आज देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल है और विशेष रूप से फार्मा उद्योग के बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। यहां बड़ी संख्या में उद्योग स्थापित हैं, जिनसे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है। औद्योगिक विकास के साथ क्षेत्र में सडक़, परिवहन, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार हुआ, जिसका असर पूरे जिले की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिला। जिला की तरक्की में खेती और बागबानी का भी अहम योगदान है। सोलन को मशरूम सिटी के साथ टमाटर की राजधानी के रूप में भी पहचान मिली है। यहां बड़े पैमाने पर बेमौसमी सब्जियों का उत्पादन होता है। टमाटर, शिमला मिर्च, मटर, लहसुन और मशरूम जैसी फसलें जिला के किसानों की आर्थिकी का महत्वपूर्ण आधार हैं। सोलन की सब्जी मंडी में रोजाना बड़ी संख्या में किसान और व्यापारी पहुंचते हैं और यहां से सब्जियां दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों तक भेजी जाती हैं। इसके अलावा सोलन का महोगबाग क्षेत्र पुष्प उत्पादन के लिए भी देशभर में अपनी पहचान बना चुका है। फूलों की खेती ने किसानों को पारंपरिक खेती के मुकाबले आय के नए अवसर दिए हैं।
उद्योग और कृषि के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और व्यापार के क्षेत्र में भी सोलन ने पिछले 54 वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार किया है। शूलिनी माता की धार्मिक आस्था, कसौली और चायल जैसे पर्यटन स्थलों की नजदीकी तथा कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग और रेल संपर्क ने भी जिला की अर्थव्यवस्था को गति देने में योगदान दिया है। पांच दशक पहले का शांत और छोटा कस्बा आज आधुनिक शहर का रूप ले चुका है। ऊंची इमारतें, बढ़ती कालोनियां, व्यस्त बाजार, औद्योगिक क्षेत्र और तेजी से बढ़ती आबादी सोलन के बदलाव की कहानी खुद बयां करती हैं। विकास के इस सफर में यहां आने वाले लोगों की भी बड़ी भूमिका रही है। रोजगार और कारोबार के लिए बाहर से आए लोग धीरे-धीरे यहां बसते गए और सोलन की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना का हिस्सा बन गए। इसलिए सोलन के 54 वर्ष के सफर को केवल एक जिला के विकास की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की कहानी भी कहा जा सकता है, जिन्होंने यहां आकर अपना भविष्य बनाया। शायद इसी वजह से आज भी सोलन के लिए कही जाने वाली कहावत दिल से निकलती है—जिसने पानी पिया बघाट का, वह होकर रह गया बघाट का।
पहचान और संस्कृति कायम
सोलन के पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष व समाजसेवी कुल रकेश पंत ने कहा कि 54 वर्षों में सोलन ने अपनी पहचान और संस्कृति को कायम रखते हुए आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाए हैं। जिला की सबसे बड़ी ताकत यहां के लोगों का आपसी जुड़ाव और मेहनत करने का जज्बा है। सोलन में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आए और यहां की आबोहवा में रच-बस गए।
क्या कहते हैं उपायुक्त सोलन
उपायुक्त सोलन मनमोहन शर्मा ने कहा कि 54 वर्षों में सोलन जिले ने विकास के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। भौगोलिक और सामाजिक विविधता इसकी विशेष पहचान है। प्रशासन का प्रयास है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों को बेहतर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने के साथ विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि उद्योग, कृषि, बागबानी, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में सोलन ने अपनी अलग पहचान बनाई है। भविष्य में भी जिले में आधारभूत ढांचे को मजबूत करने, यातायात व्यवस्था सुधारने और जनसुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि विकास का लाभ सभी वर्गों तक पहुंचे।
ऐसे पड़ा सोलन शहर का नाम
सोलन शहर का नामकरण मां शूलिनी के नाम से जुड़ा हुआ है, जो यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। शहरवासियों की आस्था मां शूलिनी में गहरी है और हर वर्ष आयोजित होने वाला ऐतिहासिक शूलिनी मेला इस आस्था को भव्य रूप देता है। देश प्रदेश से लोग इस अवसर पर सोलन पहुंचते हैं और मां शूलिनी का आशीर्वाद लेते हैं। शहर की पहचान केवल विकास और आधुनिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें समृद्ध धार्मिक परंपराओं और लोक संस्कृति में भी जुड़ी हैं। मां शूलिनी की कृपा को सोलन की खुशहाली और समृद्धि से जोडक़र देखा जाता है।