दिव्य हिमाचल ब्यूरो-शिमला
अनुबंध सेवा की वरिष्ठता को नियमित सेवा में गिने जाने से रोकने के मामले में हिमाचल सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की क्यूरेटिव यानी रिव्यू याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले पारित आदेश में ऐसी कोई त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने हिमाचल सरकार एवं अन्य की ओर से दायर रिव्यू याचिका पर यह आदेश पारित किया।
यह याचिका देविंद्र कुमार एवं अन्य से जुड़े मामले में विशेष अनुमति याचिका संख्या 24885/2026 में पारित आदेश के संबंध में दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मामले में मौखिक सुनवाई की अनुमति देने के लिए दायर आवेदन खारिज किया जाता है। हालांकि रिव्यू याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ कर दिया गया। इसके बाद अदालत ने पुनर्विचार याचिका और उसके समर्थन में दिए गए आधारों पर विचार किया, लेकिन पहले के आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं पाई। इसी आधार पर रिव्यू याचिका खारिज कर दी गई। अदालत ने लंबित आवेदनों का भी निपटारा कर दिया। हिमाचल प्रदेश में अनुबंध आधार पर सेवाएं देने वाले कर्मचारियों की वरिष्ठता का प्रश्न लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। इस मामले में राज्य सरकार के कर्मचारी एक्ट के प्रावधानों और अनुबंध सेवा की अवधि को वरिष्ठता में शामिल करने से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विवाद रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका पर कार्यवाही समाप्त हो गई है। हालांकि, आदेश में अनुबंध सेवा की वरिष्ठता के संबंध में कर्मचारी एक्ट की वैधता या उसके सभी प्रावधानों पर अलग से कोई विस्तृत निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है। इसलिए इसके व्यापक प्रभाव का आकलन मूल फैसले और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अध्ययन के बाद ही किया जा सकता है।
दिसंबर से हाईकोर्ट में एक्जीक्यूशन याचिका की सुनवाई
अनुबंध की वरिष्ठता एवं परिणामी लाभ कर्मचारियों को देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने का वक्त दिया है। इनमें से दो महीने हो चुके हैं। दूसरी ओर हिमाचल हाईकोर्ट में चल रहे अवमानना और एक्जीक्यूशन याचिकाओं के मामले में दिसंबर महीने से सुनवाई शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट की चार महीने की डेडलाइन को देखते हुए हाईकोर्ट ने ही ये विंडो विभागों को दे रखी है। दिसंबर से संबंधित विभागों के सचिवों या विभागाध्यक्षों को कर्मचारियों के भुगतान पर निर्णय लेना होगा।