भारत की परेशानी यह है कि इसकी गुटनिरपेक्षता की नीति अवसरवाद का शॉर्टहैंड बन गई है। एक सुपरपावर के खिलाफ दूसरी का खेल खेलने ने देश को कुछ सामरिक लाभ दिए होंगे, पर इससे हमने कोई भी मजबूत मित्र नहीं बनाए हैं। हमारे ताजातरीन सैन्य संघर्ष के दौरान जब चीन ने सरेआम पाकिस्तान का साथ दिया तो रूस कहां था? परंतु प्रधानमंत्री मोदी इसी अवसरवाद की नीति पर चल रहे हैं। एकमात्र अंतर यह है कि उनके विदेश मंत्री एस. जयशंकर इसे ‘बहु-गठबंधन’ नाम देना चाहते हैं। इस नीति की असफलता वर्ष 1962 में ही स्पष्ट थी, जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया। नेहरू ने सैन्य सहायता की चाह में रूस नहीं, बल्कि अमरीका से संपर्क साधा। तत्कालीन राष्ट्रपति कैनेडी ने सैन्य और अन्य संबंधित मदद उपलब्ध भी करवाई…
भारत अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बहुत अधिक नाराज है। वह स्वयं को भारत का मित्र बताते हैं, परंतु उन्होंने अभी-अभी हमारी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ घोषित कर दिया और संयुक्त राज्य अमरीका को हमारे निर्यात पर पंगु बना देने वाला 50 फीसदी टैरिफ (शुल्क) जड़ डाला। यह अमरीका द्वारा किसी भी देश से सर्वाधिक वसूलियों में एक है। इस पर भारत की अभी तक की प्रतिक्रिया अमरीका को चुनौती देने, तेवर दिखाने, और इसके प्रतिद्वंद्वियों से बात करने जैसे भ्रमित कदमों तक सीमित है। ऐसी खबरें हैं कि भारत कुछ अमरीकी हथियारों की खरीद भी रोक सकता है। परंतु भारतीय नेताओं के लिए यह तय करने का समय आ गया है कि क्या भारत की पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति को छोडकर अमरीका के साथ समान हित साधे जाएं।
ट्रंप ने अपने अमित्रतापूर्ण कृत्यों के दो कारण बताए हैं : भारत बड़ी तादाद में अमरीकी उत्पाद नहीं खरीदता, और अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहा है। पहला 25 फीसदी टैरिफ लगाते हुए ट्रंप ने कहा, ‘भारत अच्छा व्यापार सहयोगी नहीं रहा है क्योंकि वह हमारे साथ बड़ी मात्रा में कारोबार करता है, लेकिन हम उससे व्यापार नहीं करते।’ हालांकि ‘रूसी तेल खरीदने पर’ 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का ट्रंप का दूसरा हमला है, जिस पर भारत को ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।
हमारे नेताओं को पता होना चााहिए कि हालांकि ट्रंप का रवैया कठोर है, परंतु जल्द ही अमरीकी कांग्रेस जो कर सकती है, उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं। सेनेट में अमरीकी कानून निर्माता वह बिल पास करने को लगभग तैयार हैं जो रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। 100 सदस्यों के सदन में विधेयक के 80 संयुक्त प्रायोजक हैं और इसके सितंबर में पारित होने की संभावना है। स्पष्ट है कि भारत का रूस को समर्थन, ट्रंप के दुव्र्यवहार का प्रमुख कारण है। रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने को मध्यस्थता के प्रयासों के बीच वह भारत को अपने पाले में चाहते हैं। सेनेट में विधेयक को खुला समर्थन एक इशारा है कि शांति स्थापित करने के उनके प्रयासों पर अमरीका के लोगों का धैर्य समाप्त हो रहा है। रूस को संघर्ष रोकने के लिए राजी करने के ट्रंप के अवसर बढ़ जाएंगे, यदि भारत और चीन अपनी तेल खरीद कम करें, या रोक दें। ये दोनों देश इतना तेल खरीदते हैं जिससे रूस का लड़ाई में कुल खर्चा लगभग 100 बिलियन डॉलर पूरा होता है।
एक ‘मित्र’, भारत पर इतना अधिक दबाव बनाकर, ट्रंप चीन और रूस को इशारा दे रहे हंै कि वह अपनी ट्रेड नीति के प्रयोग से युद्ध रोकने के प्रति अत्यधिक गंभीर हैं। वर्तमान में वह उन दोनों देशों से मोलभाव कर रहे हैं और लग रहा है कि बातचीत अंतिम चरण में है।
भारत के लिए खुशखबरी होगी यदि ट्रंप युद्ध रुकवाने में सफल रहें और संकट टल जाए। यह संभव है कि दोनों देश तालमेल से चल रहे हैं, ताकि रूस व चीन को संदेश देने में ट्रंप को मदद मिले। संभव है इसीलिए रूसी तेल खरीदने पर भारत पर दंडस्वरूप लगाया गया 25 फीसदी टैरिफ 21 दिन के लिए टाल दिया गया है।
परंतु यदि संकट कायम रहता है, तो दोराहे पर खड़े भारत को एक पक्ष चुनना ही होगा। भारत ऐसा करने से अनिच्छुक रहा है, क्योंकि यह यूक्रेन युद्ध को यूरोप का संघर्ष मानता है। परंतु अमरीका की नीति, फिर चाहे ट्रंप हों या न हों, भारत को इस सोच पर चलने को बहुत मुश्किल बनाने जा रही है। भारत इसके दूरगामी परिणाम भुगतेगा जो और भी कठिन आर्थिक प्रतिबंधों से लेकर अमरीका के पाकिस्तान के और करीब जाने तक संभव हैं। ट्रंप पाकिस्तान के सेना प्रमुख से पहले ही मिल चुके हैं और उनके देश के तेल भंडारों को विकसित करने में अमरीकी सहायता का वचन दे चुके हैं।
भारत की 75 वर्ष पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति इस प्रकार अब तक के सर्वाधिक कठिन समयों में से एक का सामना कर रही है। अगर मोदी सरकार प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा 1949 में रेखांकित नीति की मौलिक परिभाषा का सख्ती से पालन करती है, तो यह शांति, अत: ट्रंप के पाले में खड़ी होगी। नेहरू ने कहा था कि भारत की विदेश नीति का उद्देश्य ‘‘किसी सुपरपावर या समूह से गठबंधन के बजाय हर विवादास्पद अथवा विवादित मसले का एक स्वतंत्र दृष्टिकोण के माध्यम से शांति की खोज करना है।’ रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति निश्चित तौर पर ‘शांति की खोज’ है और रूस का समर्थन बंद कर भारत एक ‘स्वतंत्र दृष्टिकोण’ का सही निर्णय लेगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने पहले ही कह दिया है कि रूसी तेल की खरीद कम करने से भारत की मुद्रास्फीति पर मामूली प्रभाव पड़ेगा।
गुटनिरपेक्षता की नीति के पांच मूल सिद्धांत (पंचशील) भी भारत द्वारा रूस का समर्थन करने के पक्ष में नहीं हैं। ये सिद्धांत हैं : क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, गैर आक्रामकता, हस्तक्षेप न करना, समानता, और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व। रूस ने जब यूक्रेन पर आक्रमण किया तो इन सबका उल्लंघन किया। भारत की परेशानी यह है कि इसकी गुटनिरपेक्षता की नीति अवसरवाद का शॉर्टहैंड बन गई है। एक सुपरपावर के खिलाफ दूसरी का खेल खेलने ने देश को कुछ सामरिक लाभ दिए होंगे, पर इससे हमने कोई भी मजबूत मित्र नहीं बनाए हैं। हमारे ताजातरीन सैन्य संघर्ष के दौरान जब चीन ने सरेआम पाकिस्तान का साथ दिया तो रूस कहां था?
परंतु प्रधानमंत्री मोदी इसी अवसरवाद की नीति पर चल रहे हैं। एकमात्र अंतर यह है कि उनके विदेश मंत्री एस. जयशंकर इसे ‘बहु-गठबंधन’ नाम देना चाहते हैं।
इस नीति की असफलता वर्ष 1962 में ही स्पष्ट थी, जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया। नेहरू ने सैन्य सहायता की चाह में रूस नहीं, बल्कि अमरीका से संपर्क साधा। तत्कालीन राष्ट्रपति कैनेडी ने महत्वपूर्ण सैन्य और अन्य संबंधित मदद उपलब्ध भी करवाई। अमरीका में भारत के राजदूत बीके नेहरू ने लिखा, ‘‘हम गुटनिरपेक्षता की बात करते हैं, पर कम से कम चीन के खिलाफ हम दरअसल अमरीका के सहयोगी बन गए थे।’’
सच्चाई यह है कि भारत को अमरीका की आवश्यकता है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता कि चीन ने हमारे देश को घेर लिया है और चीन के खिलाफ रूस भारत के साथ कभी खड़ा नहीं होगा। भारत को लोकतंत्र, व्यक्तिगत अधिकारों, मानवीय अधिकारों, और मुक्त बाजारों के हमारे साझा मूल्यों के कारण भी अमरीका का सहयोगी बनना चाहिए।
भानु धमीजा
सीएमडी, दिव्य हिमाचल
-(अंग्रेजी में ‘द क्विंट’ में प्रकाशित) (11 अगस्त, 2025)