हालांकि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) अचानक देश से बाहर नहीं जा सकता, लेकिन एफडीआई के मुनाफे, डिविडेंड, ब्याज, सैलरी, रॉयल्टी और टेक्निकल फीस के रूप में पैसे बहिर्गमन की एक बड़ी देनदारी भी बनाता है…
जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से तेजी से पैसा निकालना शुरू किया और 2026 की पहली छमाही में सिर्फ छह महीनों के अंदर लगभग 30 अरब अमरीकी डॉलर देश से निकाल, बाहर ले गए, उससे भारतीय रुपए पर भारी दबाव पड़ा। इस वर्ष के प्रारंभ से, जून 2026 तक रुपया 89.5 रुपए प्रति डॉलर से गिरकर 94.18 रुपए प्रति डॉलर हो गया, यानी इसमें 5.23 प्रतिशत की गिरावट आई। ऐसे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बैंकों के लिए एक आकर्षक प्रस्ताव दिया और एक्सचेंज रेट रिस्क (विनिमय दर के जोखिम) के खिलाफ करेंसी हेजिंग की लागत को स्वयं वहन करना तय किया। इस नए प्रावधान का फायदा उठाते हुए, बैंकों ने डॉलर डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज को तेजी से बढ़ाया- पहले यह लगभग 3 से 4 प्रतिशत था, जिसे बढ़ाकर 3-5 साल की योग्य जमाओं (डिपॉजिट्स) के लिए 6 से 7 प्रतिशत या उससे ज्यादा कर दिया गया। अनिवासी भारतीयों ने इस पर उत्साह दिखाया और रिजर्व बैंक की स्पेशल स्वैप सुविधा के तहत विदेशी मुद्रा का अंतरप्रवाह प्रवाह सिर्फ दो हफ्तों में लगभग दोगुना हो गया।
यह 17 जुलाई को 20.718 अरब अमरीकी डॉलर था जो 31 जुलाई तक बढक़र 40.816 अरब अमरीकी डॉलर हो गया। रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अकेले विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक डिपॉजिट्स का हिस्सा 36.725 अरब अमरीकी डॉलर था, और बाकी लगभग 4 अरब अमरीकी डॉलर विदेशी मुद्रा में लिए गए कर्ज और विदेशी बाजार ऋण से आए। एफसीएनआर में हुई इस अचानक बढ़ोतरी से हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से बढऩे में निश्चित रूप से मदद मिली है। जुलाई 2026 के अंत तक विदेशी मुद्रा भंडार बढक़र 692.9 अरब अमरीकी डॉलर हो गया, जबकि मई 2026 के अंत में यह गिरकर 666.93 के निचले स्तर पर आ गया था- यानी सिर्फ दो महीनों में इसमें 25.9 अरब अमरीकी डॉलर की बढ़ोतरी हुई। रिजर्व बैंक की मौजूदा स्वैप स्कीम की खासियत यह है कि जब यह बैंकों को करेंसी जोखिम से मुक्त करती है, रिजर्व बैंक पर लगभग कोई खर्च नहीं आता। चूंकि रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का कस्टोडियन है, इसलिए जब भी एफसीएनआर बैंक डिपॉजिट से पैसे निकाले जाते हैं, तो वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार से भुगतान कर सकता है, यह भंडार पहले इन्हीं एफसीएनआर डिपॉजिट से बढ़ाया गया था। हम समझ सकते हैं कि जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने बाहर का रुख किया तो रुपए में तेजी से अवमूल्यन प्रारंभ हो गया। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा नई स्वैप स्कीम की मदद से अनिवासी भारतीयों से बड़ी जमा प्राप्त करना संभव हो पाया।
विदेशी निवेश सही या अनिवासी भारतीयों की जमा : पिछले 26 सालों में, अगर हम एक तरफ विदेशी निवेश (जिसमें विदेशी प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो निवेश दोनों शामिल हैं) और दूसरी तरफ अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई कुल रकम (रेमिटेंस) की तुलना करें, तो पाते हैं कि देश को वर्ष 2000-01 से 2025-26 तक कुल 1166.4 अरब अमरीकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और 295.7 अरब अमरीकी डॉलर का निवल पोर्टफोलियो निवेश प्राप्त हुआ। यानी पिछले 26 वर्षों में कुल 1462.1 अरब अमरीकी डॉलर का विदेशी निवेश देश को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर अनिवासी भारतीयों से देश में कुल 1780 अरब अमरीकी डॉलर के प्रेषण देश को प्राप्त हुए। आम तौर पर नीति-निर्माता और आर्थिक विश्लेषक विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, ताकि घरेलू संसाधनों की कमी को पूरा किया जा सके और भुगतान संतुलन में लगातार बने रहने वाले घाटे से निपटने के लिए विदेशी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ाई जा सके। लेकिन हम देखते हैं कि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को मिलाकर भी, तुलनात्मक रूप से कहीं ज्यादा योगदान अनिवासी भारतीयों का है। लेकिन समझना होगा कि जहां एक ओर अनिवासी भारतीयों का योगदान, विदेशी निवेश की तुलना में कहीं ज्यादा है, विदेशी निवेश कई प्रकार से देश पर देनदारी का बोझ बढ़ाता है, जबकि अनिवासी भारतीयों के प्रेषण से अत्यंत कम देनदारी बढ़ती है, क्योंकि एक बार राशि आने के बाद, अनिवासी भारतीयों द्वारा राशि वापस ले जाने की प्रवृत्ति बहुत सीमित होती है। यदि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की बात करें, तो अभी तक निवल रूप से इन निवेशकों द्वारा निवल 295.7 अरब अमरीकी डालर की राशि प्राप्त हुई, लेकिन आज इन निवेशकों के निवेश का पूंजीगत मूल्य 805.7 अरब अमरीकी डालर है। यदि रुपयों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के कुल निवेश को देखा जाए तो वह 12.57 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि आज उनके निवेश का कुल मूल्य 73.7 लाख करोड़ रुपए है, यानी कुल मिलाकर निवेश का लगभग 6 गुणा।
बड़ी बात यह है कि पोर्टफोलियो निवेशक अपनी मर्जी से अपने निवेश को कभी भी (बिना सूचना के) ले जा सकते हैं। इसका एक लघु रूप हम वर्ष 2026 के प्रथम 6 माह में देख चुके हैं, जब पोर्टफोलियो निवेशकों ने 30 अरब अमरीकी डॉलर की राशि विदेश भेजी। चाहे व्यावहारिक रूप से यह असंभव है, लेकिन सैद्धांतिक स्तर पर यह हो सकता है कि यदि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अपने समस्त स्टॉक को बेचने का निर्णय कर लें, तो यह भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार से भी अधिक होगा। अब यदि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात करें तो ध्यान में आता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि इस निवेश के साथ नई प्रौद्योगिकी आती है, जिससे उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद तो मिलते ही हैं, स्थानीय उद्योगों को भी तकनीक सुधार हेतु दबाव बनता है। साथ ही साथ देश में आंतरिक संसाधन कम होने पर भी देश में निवेश का स्तर बढ़ता है जिससे ग्रोथ तेज होती है। यह भी कहा जाता है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ बहुमूल्य विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है, जिससे भुगतान शेष की समस्या से निपटने में मदद मिलती है। लेकिन यह सब बातें और तर्क केवल सैद्धांतिक हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के संदर्भ में कुछ बातें जो सामान्यत: नजरअंदाज की जाती हैं, उनके निहितार्थों को समझने की जरूरत है। वास्तविकता यह है कि विदेशी कंपनियां, तकनीक के नाम पर विदेशों में उनके द्वारा विकसित तकनीक ही लेकर आती हैं। देश में उनके द्वारा शोध एवं विकास पर खर्च अत्यंत न्यून ही होता है। लेकिन जो तकनीक भी वो भारत में लाती है, उसकी बड़ी कीमत देश को रॉयल्टी और टेक्नीकल फीस के रूप में चुकानी पड़ती है।
यदि देखें तो रॉयल्टी और टेक्नीकल फीस की यह राशि निरंतर बढ़ती ही जा रही है और यह 2025-26 में 17.4 अरब अमरीकी डालर तक पहुंच चुकी थी। गौरतलब है कि वर्ष 2009 तक रॉयल्टी पर कुछ अधिकतम सीमा लागू थी, जिसके 2009 में हटने के बाद यह राशि साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। हालांकि विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) अचानक देश से बाहर नहीं जा सकता, लेकिन एफडीआई के मुनाफे, डिविडेंड, ब्याज, सैलरी, रॉयल्टी और टेक्निकल फीस के रूप में पैसे बहिर्गमन की एक बड़ी देनदारी भी बनाता है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2000-01 और 2025-26 के बीच आय का बहिप्र्रवाह 1010.4 अरब अमरीकी डालर था, जबकि इसी दौरान एफडीआई से कुल अंतप्र्रवाह 1166 अरब अमरीकी डॉलर था। आय यह बहिप्र्रवाह 2000-01 में सिर्फ 7.7 अरब अमरीकी डॉलर था और 2012-13 तक बढक़र 34.4 अरब अमरीकी डॉलर हो गया। 2025-26 में आय का बहिप्र्रवाह 103.2 अरब अमरीकी डॉलर था। बहरहाल, विदेश में जमा की कई राशि को भारत में लाना होगा।
डा. अश्वनी महाजन
पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय