शिक्षा के गिरते स्तर की खोज करते-करते अब दो लोग पकड़ में आए, पहला शिक्षक और दूसरा कुलपति। लेकिन सरकार ने निर्णय कर लिया है कि उसे शिक्षा में सुधार करना है…
हिमाचल प्रदेश सरकार प्रदेश में शिक्षा के स्तर को लेकर बहुत चिंतित हो गई है। शिक्षा की चिंता करनी चाहिए। यह बहुत जरूरी है। लेकिन स्तर क्यों गिर रहा है, सरकार इस पर भी विचार करती ही होगी। सरकार विचार करती है, केवल इतना कह देने मात्र से कुछ पता नहीं चलता। कौनसी सरकार विचार कर रही है, यह जान लेना और भी जरूरी है। सरकार के दो हिस्से होते हैं। एक राजनीतिक सरकार होती है जिसे राजनीति विज्ञान वाले कभी कभी अस्थायी सरकार भी कह देते हैं, क्योंकि इस सरकार की आयु केवल पांच साल होती है। ये सरकारें बदलती रहती हैं। जिस सरकार की आयु ही महज पांच साल होती है, उसके पास विचार विमर्श करने, सोचने समझने का समय नहीं होता। उसके सामने इससे भी बड़े मसले रहते हैं। सबसे बड़ा मसला तो अगला चुनाव जीतने का ही होता है। उसके लिए विचार करना जरूरी नहीं होता, बल्कि रणनीति बनाना जरूरी होता है। लेकिन फिर यह विचार वगैरह करने का काम कौन करता है? यह काम स्थायी सरकार यानी बहुत ही ऊंचे दर्जे के प्रशासनिक अधिकारी करते हैं। इसलिए हमें मान लेना चाहिए कि कुछ बहुत ही वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रदेश में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर विचार किया ही होगा। विचार किया होगा तो कुछ कारण भी ध्यान में आए ही होंगे।
यकीनन जब प्रशासनिक अधिकारी शिक्षा के गिरते स्तर पर विचार करते हैं तो उनके सारे विचार विमर्श से जो एक मात्र दोषी पकड़ा जाता है, वह शिक्षक ही होता है। शिक्षक तो पकड़ में आ जाता है लेकिन अब इसको शिक्षा के गिरते स्तर से कैसे जोड़ा जाए? कुछ साल पहले तो यह रास्ता निकाला था कि शिक्षकों से विद्यार्थी की परीक्षा लेने का अधिकार ही छीन लो। लेकिन फिर परीक्षा लेगा कौन? इसके उत्तर पर तो विचार किया जा चुका था कि परीक्षा लेने की जरूरत ही नहीं है। राजनीतिक सरकार को यह निष्कर्ष बहुत उत्तम लगा। परीक्षा होने से देश की किशोर पीढ़ी का शोषण होता था। परीक्षा के पैर उखड़ जाने से बच्चों के घरों में से वोट निकलेंगी। बच्चा जिद करेगा तो माता-पिता के पास क्या कोई विकल्प बचता है? लेकिन जब आठ दस साल के बाद विद्यार्थी दस से आगे गिनती करने में भी लडख़ड़ाने लगे तब हल्ला पड़ा कि परीक्षा लो। तब जनहित में सरकार ने परीक्षा लेकर देश का भविष्य बचा लिया था। शिक्षक को तसल्ली हुई कि अब बच्चे पढ़ेंगे तो शिक्षकों का भी सम्मान बढ़ेगा। लेकिन यह शिक्षकों की बहुत भारी नासमझी थी। बकरे की मां ज्यादा देर खैर नहीं मना सकती। अब फिर निष्कर्ष निकला है कि सारी बीमारी की जड़ तो वह तरीका है जिस पर चलकर अध्यापक विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाते हैं। इसके लिए जो साक्षात्कार होता है, उसकी अध्यक्षता विश्वविद्यालय का कुलपति करता है। सरकार का कहना है कि सारी गड़बड़ यहीं से शुरू हो जाती है। कुलपति ही सबसे ज्यादा गड़बड़ करता है। इस प्रकार शिक्षा के गिरते स्तर की खोज करते करते अब दो लोग पकड़ में आए, पहला शिक्षक और दूसरा कुलपति। लेकिन सरकार ने निर्णय कर लिया है कि उसे शिक्षा को सुधार कर ही दम लेना है।
हो सकता है सरकार ने चुनाव के समय इस प्रकार का वायदा भी कर लिया हो। हमें सरकार का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने यह फैसला नहीं कर लिया कि आगे से कोई शिक्षक कुलपति नहीं होगा, बल्कि किसी प्रशासनिक अधिकारी को ही यह महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा। वैसे तो पहले भी आईएएस अधिकारी समय समय पर इस पद पर बैठ कर शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाते रहे हैं। कुछ राज्यों ने तो यह भी कानून बनाया था कि विश्वविद्यालय का कुलाधिपति मुख्यमंत्री होगा। पड़ोसी राज्य पंजाब के मुख्यमंत्री बार बार यह प्रयास करते रहते हैं। विश्वविद्यालय का कुलपति आईएएस अधिकारी और कुलाधिपति मुख्यमंत्री। यदि ऐसा हो जाए तो शिक्षा का स्तर तो इतना ऊपर जा सकता है कि उसके बाद उसके लिए थोड़ा भी नीचे आना मुश्किल हो जाएगा। सरकार के पास एक दूसरा रास्ता भी था। वह शिक्षकों का विश्वविद्यालयों में प्रवेश ही बंद करवा सकती थी। न रहेगा बांस न रहेगी बांसुरी। लेकिन विचार विमर्श करने के बाद सरकार को सलाह देने वाली टीम ने, हो सकता है यह बताया हो कि इससे सरकार की भद्द पिटेगी। क्योंकि दुनिया में जहां-जहां भी विश्वविद्यालय पाए जाते हैं, उन विश्वविद्यालयों में शिक्षक प्राय: देखे जाते हैं। इसलिए कुछ सीमित संख्या में विश्वविद्यालय में शिक्षक रखना जरूरी है। फिर ऐसा क्या किया जाए कि विश्वविद्यालय में शिक्षक रखे जाएं और वहां शिक्षकों स्तर भी न गिरे। वह भी निरन्तर ऊपर उठता रहे। इस प्रश्न के उत्तर में सरकार ने निर्णय कर लिया है कि कुलपति के हाथ से शिक्षक भर्ती का अधिकार छीन कर प्रदेश के लोक सेवा आयोग को दे दिया जाए। इससे शिक्षा और शिक्षकों का स्तर यकीनन ऊंचा उठेगा। उसे ऊंचा उठना ही होगा। जब सरकार उसे ऊंचा उठाने के लिए इतना कुछ कर रही है तो उसका भी फर्ज बनता है कि वह भी ऊंचा उठने के लिए सरकार से सहयोग करे।
लेकिन सरकार और सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों यानी अस्थायी सरकार और स्थायी सरकार से बाहर भी लोग थोड़ा बहुत सोचते रहते हैं। वैसे सरकार ने अभी तक यह नहीं बताया कि उनको इस प्रकार स्वतंत्र रूप से सोचने का अधिकार है या नहीं? यह मान लेना चाहिए कि यदि नहीं बताया है तो सरकार से बाहर के लोगों को भी सोचने का अधिकार है ही। उसी अधिकार का प्रयोग करते हुए लोग सोच रहे हैं। उसका नमूना सुविधा के लिए प्रस्तुत है : विश्वविद्यालय का कुलपति कौन नियुक्त करता है? सरकार ही नियुक्त करती है। हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष और सदस्य कौन नियुक्त करता है? वह भी सरकार ही नियुक्त करती है। अब असली हैरानी शुरू होती है। विश्वविद्यालय का कुलपति और लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष दोनों को ही सरकार नियुक्त करती है। अब शिक्षक भर्ती का अधिकार एक से छीन कर दूसरे को दे रही है तो इससे शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार का अपने ही कुलपति पर से भरोसा उठ गया हो और उसका दंड वह पूरे विश्वविद्यालय को दे रही हो।
या फिर ऐसा भी हो सकता है कि जिसको कुलपति बनाया हो वह किसी विवशता में बनाया गया हो और अब उसके पर कतर कर विश्वविद्यालय को ही दंडित किया जा रहा हो? कहीं पे निगाहें कहीं पर निशाना! विश्वविद्यालय का कुलपति तो फिर भी लोकलाज के चलते किसी शिक्षक को ही लगाना पड़ता है। शिक्षक सरकार के आगे झुकेगा भी तो एक सीमा से ज्यादा नहीं झुक सकता। परन्तु लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष और दूसरे सदस्य तो, एक आध अपवाद को छोड़ कर, कभी भी शिक्षक नहीं होते। ताज्जुब है कि सरकार विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती के लिए शिक्षक पर भरोसा न करके गैर शिक्षकों पर भरोसा कर रही है। जहां तक पुराने रिकॉर्ड बताते हैं, पंजाब लोक सेवा का अध्यक्ष लंबे समय तक जेल में रहा था। झारखंड लोक सेवा आयोग को प्रदेश में चले आन्दोलन के चलते पद छोड़ कर भागना पड़ा था। हरियाणा में तो शिक्षक भर्ती मामले में ही एक मुख्यमंत्री अपने बेटे समेत दस साल जेल में काट आए थे। और फिर वहीं उन्होंने प्रायश्चित स्वरूप बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। सरकार के पास अपने अनोखे प्रयोग करने के लिए दूसरे अनेक महकमे हैं। उदाहरण के लिए माइनिंग, लोक निर्माण विभाग, शराब विभाग इत्यादि इत्यादि। वह वहां ऐसे नित्य नवीन प्रयोग कर सकती है और उससे जन कल्याण की विधियां भी विकसित कर सकती है। कहा जाता है कि सत्ता के बुर्के में लिपटे लोग विश्विद्यालयों से जितना दूर रहें, उतना ही शिक्षा के लिए बेहतर होता है। लेकिन यह भी कहा गया है कि सत्ता के कान नहीं नाखून होते हैं। लगता है विश्वविद्यालय उन्हीं नाखूनों का शिकार हो रहा है। इस मसले का ठोस समाधान हो।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री
वरिष्ठ स्तंभकार
ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com