लचित बडफूकन-बंदा बहादुर का योगदान

भाई परमानंद और करम सिंह हिस्टोरियन के इस विवाद के लगभग तीस साल बाद डा. गंडा सिंह ने 1935 में बंदा सिंह बहादुर पर एक गंभीर ग्रंथ लिखा। इसके बाद बंदा बहादुर का मूल्यांकन हुआ…

पिछले दिनों मुझे दो अलग-अलग स्थानों पर दो सेमिनारों में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ। मंडी गोविंदगढ़ के देशभगत विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में बंदा बहादुर पर सेमिनार थे। इसी प्रकार असम में वहां के सीमांत चेतना मंच की ओर से अढ़ाई साल तक चले लंबे युद्ध में औरंगजेब की सेना को ब्रह्मपुत्र के तट पर सराय घाट में परास्त कर देने वाले महान सेनापति लचित बडफूकन के बारे में सेमिनार रखा गया था। बंदा बहादुर ने तो पंजाब में सोनीपत से लेकर सरहिंद तक के बड़े इलाके में से मुगल शासन को समाप्त कर वहां गुरु नानक देव जी के नाम से खालसा राज की स्थापना ही कर दी थी। अपने एक हुकमनामा में वह इसको सतयुग कहता है। उसकी युद्ध नीति सचमुच गहरे अध्ययन का विषय है। लेकिन इतिहास में या विश्वविद्यालयों के रक्षा व युद्धनीति विभागों में महान सेनापतियों की सूची में उसका नाम नहीं है। अलबत्ता पूजा स्थानों पर उसका नाम जरूर लिया जाता है या फिर उसके नाम पर पूजा घर बना लिए गए हैं। यही स्थिति लचित बडफूकन की है। यदि बडफूकन औरंगजेब की सेना को उस समय परास्त न कर पाते तो पूरा पूर्वोत्तर भारत ही नहीं, पूरा दक्षिण पूर्व एशिया भी इस्लाम में जा चुका होता। लेकिन शेष भारत की बात तो दूर, लचित बडफूकन को पूर्वोत्तर भारत के ही कई राज्यों के विद्यार्थी नहीं जानते।

कुछ साल पहले जब भारत सरकार ने पहली बार दिल्ली के विज्ञान भवन में लचित बडफूकन को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, तो दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के छात्र ही पूछ रहे थे कि बडफूकन कौन था। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि हम यूरोप के दसियों महान सेनापतियों के नाम तो गिना सकते हैं, लेकिन अपने देश के उन सेनापतियों के जिन्होंने अरबों, तुर्कों और मुगलों के विदेशी साम्राज्य को धूल चटा दी थी, उनका हमारे इतिहास के पाठ्यक्रमों में कहीं स्थान नहीं है। इसका कारण क्या हो सकता है? सबसे बड़ा कारण तो यही हो सकता है कि जिन मुगलों को पंजाब में बंदा बहादुर ने और असम में लचित बडफूकन ने पराजित किया था, उनके इतिहासकार और दरबारी इतिहास लिखने वाले भला बडफूकन या बंदा बहादुर का गुणगान कैसे कर सकते थे? उसके बाद अंग्रेज आ गए। वे भारतीय सेनापतियों के रणचातुर्य को कैसे महिमामंडित कर सकते थे? इन दोनों ही कारणों से भारत के ये महान सेनापति हाशिए पर चले गए। लेकिन अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी ये सेनापति इतिहास के हाशिए पर ही कैसे रहे? वामपंथी इतिहासकार तो बहुत ही उच्च स्वर से दावा करते थे कि वे राजाओं का नहीं, बल्कि सामान्य जन का इतिहास लिखेंगे। इतिहास के केन्द्र में आम आदमी रहेगा, न कि राजा और नवाब। उसके बाद भी ये दोनों महान सेनापति उपेक्षित ही रहे। दरअसल वाममार्गी इतिहासकारों की दुविधा यह रही कि उन्होंने अरबों, तुर्कों व मुगल आक्रमणकारियों को विदेशी मानने के स्थान पर उन्हें देसी भारतीय बताना, लिखना और सिखाना शुरू कर दिया। इतिहास सिखाने और लिखाने का काम पंडित नेहरु ने मौलाना अबुल कलाम को ही दे दिया, वे पहले शिक्षा मंत्री थे। अब मुगलों से लडऩे वाले और उन्हें हराने वाले लचित बडफूकन और बंदा बहादुर भारत के जननायक कैसे हो सकते थे।

भारत सरकार तो इरफान हबीब के पिता से किताब लिखवा रही थी जिसमें महमूद गजनवी को नायक स्थापित किया जा रहा था। ओडिशा के उस समय के राज्यपाल विशंबर नाथ पांडे औरंगजेब को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक सिद्ध करने को किताब छपवा रहे थे। बंदा बहादुर का मामला तो और भी उपेक्षित था। समकालीन या बाद के ईरानी इतिहासकारों द्वारा अपनी पुस्तकों में दिए गए छिटपुट प्रसंगों के अलावा बंदा बहादुर का किसी ने जिक्र नहीं किया। मुगल इतिहासकारों ने जाहिर है बंदा बहादुर को नकारात्मक तरीके से ही प्रस्तुत किया। निर्मला पंथ के साहित्यकारों के ग्रन्थों में जरूर उनका जिक्र मिल जाता है। महाराजा रणजीत सिंह के स्वर्गवास के बाद जब अंग्रेजों ने पंजाब/सप्तसिन्धु पर कब्जा कर लिया, तो ब्रिटिश सरकार ने पंजाब का इतिहास लिखने के लिए कुछ लोग इस काम में लगाए। गुरु सिंह सभा का जन्म भी इसी अंग्रेजी काल खंड में हुआ। गुरु सिंह सभा से प्रेरित विद्वानों ने भी पंजाब का इतिहास लिखना या लिखवाना शुरू किया। लेकिन इन प्रयासों में भी बंदा बहादुर उपेक्षित ही रहा। इसका श्रेय करम सिंह हिस्टोरियन को जाता है कि उन्होंने सबसे पहले ‘बंदा सिंह बहादुर’ नाम से एक छोटी सी पुस्तिका लिखी। यह आश्चर्य की बात है कि चीफ खालसा दीवान ने इसे 1905 में प्रकाशित किया। इसे पंजाब में बंदा सिंह बहादुर के व्यक्तित्व को लेकर लिखी गई पहली पुस्तक कहा जा सकता है। इसके बाद दूसरी पुस्तक भाई मति दास जी, जिन्होंने गुरु तेग बहादुर जी के साथ दिल्ली के चांदनी चौक में देश और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया था, के वंशज भाई परमानंद जी ने ‘वीर वैरागी’ नाम से पुस्तक लिखी। लेकिन अब तक ब्रिटिश साम्राज्य ने पंजाब में हिंदू-सिख का विवाद खड़ा कर दिया था। इसलिए उन विवादों के केन्द्र में बंदा सिंह बहादुर भी घेर लिया गया। बंदा बहादुर खालसा पंथ में दीक्षित होने से पहले वैष्णव पंथ व बाद में नाथ पंथ में था।

वैष्णव पंथ में दीक्षित होने के कारण वह वैरागी विशेषण से प्रसिद्ध था। इसलिए बंदा बहादुर को लेकर सारी विद्वता इसी को लेकर सिमटने लगी कि क्या बंदा बहादुर को वैरागी लिखा जाए या खालसा लिखा जाए। इसके साथ ही यह विवाद भी गहराने लगा कि क्या वैष्णव पंथ और नाथ पंथ की उसकी जीवन यात्रा को जीवन संघर्ष से पलायन माना जाए? भाई परमानंद जी बंदा बहादुर को वैरागी लिखा करते थे। इस हालात में करम सिंह हिस्टोरियन ने फिर से मोर्चा संभाला। अबकी बार उनका विषय था कि ‘बंदा सिंह बहादुर कौन था?’ कौन से अभिप्राय उनके समग्र जीवन के विविध प्रसंगों की खोजबीन करना शायद उतना नहीं था, जितना इस विषय पर चर्चा करना था कि वह वैरागी था या खालसा? हिन्दू था या सिख? उसने अमृत पान किया था या नहीं? दरअसल बन्दा सिंह बहादुर पर करम सिंह ने जो किताब लिखी थी उसमें उन्होंने जो अनेक निष्कर्ष निकाले थे उनमें से एक उनके अमृतपान को लेकर भी था। उनके अनुसार, ‘बंदा गुरु गोविंद सिंह जी का सिख नहीं बना था। वह वैरागी साधु था और अंत तक वैरागी ही रहा।’ यह संयोग था कि इसके बाद बन्दा बहादुर पर दूसरी पुस्तक भाई परमानंद जी की ‘वीर वैरागी’ नाम से आई।

परमानंद जी ने बन्दा बहादुर को हिन्दू लिखा। पंजाब में ब्रिटिश सरकार ने जिस प्रकार का वातावरण बना दिया था उसमें तुरन्त तलवारें खिंच गईं। करम सिंह ने भी तुरन्त मोर्चा सम्भाल लिया। उन्होंने नई किताब लिखी- ‘बन्दा कौन था?’ लेकिन इसमें मुख्य बिन्दु हिन्दू-सिख ही रहा। इसमें उनका निष्कर्ष था- ‘मेरा यह निश्चय है कि बंदा बहादुर सिख ही नहीं बल्कि पूरा अमृतधारी सिख था।’ अपने अलौकिक बलिदान के लगभग दो सौ साल बाद भी तथाकथित इतिहासकारों के कक्षों में बंदा बहादुर इस विवाद में घिरा हुआ था कि वह हिंदू था या सिख? लेकिन इसका परोक्ष लाभ यह हुआ कि इस महत्वहीन विवाद के साथ साथ बन्दा बहादुर के बारे में बहुत शिद्दत से गंभीर शोध कार्य भी होने लगा। करम सिंह हिस्टोरियन ने हिन्दू-सिख विवाद के साथ साथ बन्दा बहादुर और मुगलों के युद्धों का क्रमवार वर्णन भी किया। भाई परमानंद और करम सिंह हिस्टोरियन के इस विवाद के लगभग तीस साल बाद डा. गंडा सिंह ने 1935 में बंदा सिंह बहादुर पर एक गंभीर ग्रन्थ लिखा। इसके बाद बंदा बहादुर का मूल्यांकन उसके मजहब को लेकर नहीं, बल्कि एक सफल सेनापति के नाते उसकी उपलब्धियों को लेकर होने लगा। उपेक्षित शहीदों को सम्मान मिलना चाहिए।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

ईमेल:kuldeepagnihotri@gmail.com