वे चाहते थे कि सभी धर्मों के लोग अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्म के ग्रंथों और उनके अनुयायियों का भी आदर करें। गांधी जी एक महान शिक्षाविद थे, उनका मानना था कि किसी देश की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक प्रगति अंतत: शिक्षा पर निर्भर करती है। उनकी राय में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य आत्म-मूल्यांकन है। उनके अनुसार छात्रों के लिए चरित्र निर्माण सबसे महत्त्वपूर्ण है और यह उचित शिक्षा के अभाव में संभव नहीं है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उनकी अहिंसा की अवधारणा न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में सहायक हुई, बल्कि इसके माध्यम से शोषण और अत्याचार से निपटने के लिए एक और हथियार मिला…
जब हम उन हस्तियों के बारे में सोचते हैं जिन्होंने वास्तव में मानवता के संघर्ष, शक्ति और शांति की समझ को नया रूप दिया है, तो महात्मा गांधी जी का नाम सबसे अलग है। 2 अक्टूबर 1869 को भारत के पोरबंदर में जन्मे मोहनलाल करमचंद गांधी जी ने न केवल एक राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलाने में अभूतपूर्व योगदान दिया, बल्कि उन्होंने दुनिया को प्रतिरोध के लिए एक बिल्कुल नई शब्दावली भी दी। अहिंसा और सत्याग्रह पर आधारित उनके दर्शन ने दिखाया कि नैतिक साहस किसी भी सेना से कहीं अधिक निर्णायक हथियार हो सकता है। गांधी जी के दृष्टिकोण के केंद्र में दो परस्पर जुड़े सिद्धांत हैं : अहिंसा और सत्याग्रह। ये उधार लिए गए नारे नहीं थे। ये प्राचीन भारतीय परंपराओं से लिए गए थे, जिनमें सनातन धर्म मुख्य है और गांधी जी ने इन्हें घृणा के बिना अन्याय का सामना करने की एक विधि के रूप में नया रूप दिया। उनके लिए, अहिंसा एक सकारात्मक, सक्रिय शक्ति थी जो व्यक्तियों, समुदायों और यहां तक कि राष्ट्रों के बीच संबंधों को बदल सकती थी। हमारी विदेश नीति में आज भी इसकी स्पष्ट झलक नजर आती है।
महात्मा गांधी जी के सिद्धांत भारत तक ही सीमित नहीं रहे। फ्रेस्नो स्टेट यूनिवर्सिटी स्थित एमके गांधी केंद्र का कहना है कि उनकी अहिंसा और सत्याग्रह की विचारधारा ने विभिन्न पृष्ठभूमि और संस्कृतियों के नेताओं को प्रेरित किया है- जिनमें हॉवर्ड थुरमन, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला, सीजर चावेज, डोलोरेस ह्यूर्टा और दलाई लामा शामिल हैं। इन सभी ने मूल सिद्धांतों को अपने-अपने संदर्भ में अपनाया, जिससे यह सिद्ध होता है कि गांधीवादी अहिंसा किसी विशेष संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वभौमिक रूप से लागू होती है। ईरान-अमरीका और रूस-यूक्रेन संघर्ष को देखें तो इस समय विश्व शांति को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन कर सामने आई है। परमाणु हथियारों के युग में ताकतवर देशों के पास दो ही विकल्प बचे हैं- या तो साथ जिएं या साथ मरें। परमाणु हथियारों के युग ने उस प्राचीन सत्य को पुख्ता कर दिया है कि आम आपदा की आशंका से बढक़र कोई भी चीज लोगों को इतनी जल्दी एकजुट नहीं करती। परमाणु हथियारों से लैस इस दुनिया के लिए महातमा गांधी दर्शन की अहिंसक तकनीक ही एकमात्र समाधान प्रतीत होती है। आज के देश के शीर्ष नेतृत्व ने भी अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म पर इसी बात को बार-बार दोहराया है। महात्मा गांधीजी के अनुसार शांति का संबंध केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक के कल्याण और आर्थिक न्याय से जुड़ा है। गांधीजी राष्ट्र-राज्यों की सीमाओं से परे आपसी समझौतों पर आधारित एक ऐसे वैश्विक संघ या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के पक्षधर थे, जो शांति और सहयोग को बढ़ावा दे। गांधीजी युद्ध और हिंसा को मानवता के लिए मूलभूत रूप से विनाशकारी मानते थे।
उनका मानना था कि ये केवल घृणा और प्रतिशोध को ही बढ़ावा देते हैं, जिससे संघर्ष के मूल कारण अनसुलझे रह जाते हैं। उनका विश्वशांति के लिए दृष्टिकोण कुछ प्रमुख मान्यताओं पर आधारित था। पहला, उनका मानना था कि विवाद करने वाले पक्षों के बीच हमेशा कुछ न कुछ सांझा हित मौजूद होता है, चाहे उनका झगड़ा कितना भी कड़वा क्यों न हो। दूसरा, उनका मानना था कि विरोधियों को अंतरात्मा और तर्क के माध्यम से समझाया जा सकता है। यह दृष्टिकोण उनके जाने के दशकों बाद भी विश्व शांति के प्रयासों को प्रभावित करते हैं, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को दिशा देते हैं। जानकर मानते हैं कि गांधी जी के विचार ऐसे समय में सबसे अधिक प्रासंगिक हैं जब लोग लालच, व्यापक हिंसा और भागदौड़ भरी जीवन-शैली के समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हों। गांधी जी की अहिंसा और सत्याग्रह की अवधारणा की आज सबसे अधिक आवश्यकता है, क्योंकि यही वह समय है जब मात्र प्रतिशोध के नाम पर किसी की भी हत्या कर दी जाती है और अपने आलोचकों को दुश्मन से अधिक कुछ नहीं समझा जाता। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी जी के बारे में कहा था कि ‘भविष्य की पीढिय़ों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था।’ गांधी के विचारों ने दुनिया भर के लोगों को न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि करुणा, सहिष्णुता और शांति के दृष्टिकोण से भारत और दुनिया को बदलने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने समस्त जीवन में सिद्धांतों और प्रथाओं को विकसित करने पर जोर दिया और साथ ही दुनिया भर में हाशिये के समूहों और उत्पीडि़त समुदायों की आवाज उठाने में भी अतुलनीय योगदान दिया तथा लैटिन अमरीका, एशिया, मध्य पूर्व तथा यूरोप में सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों को प्रभावित किया। जानकर मानते हैं कि गांधी के विचार ऐसे समय में सबसे अधिक प्रासंगिक हैं जब लोग लालच, व्यापक हिंसा और भागदौड़ भरी जीवन-शैली के समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हों। गांधी जी की अहिंसा और सत्याग्रह की अवधारणा की आज सबसे अधिक आवश्यकता है क्योंकि यही वह समय है जब मात्र प्रतिशोध के नाम पर किसी की भी हत्या कर दी जाती है और अपने आलोचकों को दुश्मन से अधिक कुछ नहीं समझा जाता। गांधी जी ने ‘भगवान’ को ‘सत्य’ के रूप में उल्लेखित किया था। उनका कहना था कि ‘मैं लकीर का फकीर नहीं हूं।’ वे संसार के सभी धर्मों को सत्य और अहिंसा की कसौटी पर कसकर देखते थे, जो भी उसमें खरा नहीं उतरता वे उसे अस्वीकार कर देते और जो उसमें खरा उतरता वे उसे स्वीकार कर लेते थे।
गांधी जी के अनुसार हमने धर्म को केवल खानपान का विषय बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कम कर दी है। वे चाहते थे कि सभी धर्मों के लोग अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्म के ग्रंथों और उनके अनुयायियों का भी आदर करें। गांधी जी एक महान शिक्षाविद थे, उनका मानना था कि किसी देश की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक प्रगति अंतत: शिक्षा पर निर्भर करती है। उनकी राय में शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य आत्म-मूल्यांकन है। उनके अनुसार छात्रों के लिए चरित्र निर्माण सबसे महत्त्वपूर्ण है और यह उचित शिक्षा के अभाव में संभव नहीं है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। उनकी अहिंसा की अवधारणा न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने में सहायक हुई, बल्कि इसके माध्यम से विश्व को शोषण और अत्याचार से निपटने के लिए एक और हथियार मिला। हालांकि आज ऐसा समय आ गया है जब अधिकतर लोग गांधी और उनके विचारों की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं और वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाया जा रहा है। आज गांधी जी को सिर्फ 2 अक्तूबर के ही दिन याद किया जाता है। आज गांधी के विचारों को ताक पर रखकर हिंसा के सहारे तमाम तरह के हितों को साधने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब कितना ठीक है?
डा. वरिंद्र भाटिया
कालेज प्रिंसीपल
ईमेल : hellobhatiaji@gmail.com