आज का अभिभावक खेलों में भी अपने बच्चों का कैरियर देख रहा है, क्योंकि खेल आज अपने आप में एक प्रोफैशन है। हिमाचल में खेल व खिलाडिय़ों से मजाक किया जा रहा है और प्रशिक्षकों को तो खेल पटल से ही गायब कर दिया है। देश में ओलंपिक आयोजन की बात हो रही है और हिमाचल में जो अपने दम पर प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं, उनके साथ भद्दा मजाक चल रहा है…
अक्तूबर माह की अंतिम तिथि को हुए हिमाचल प्रदेश खेल विभाग के नगद ईनाम समारोह में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को पदक जीतने व प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाडिय़ों को उचित व सम्मान के साथ नगद ईनाम दिया गया। साथ ही साथ खेल विभाग में कार्यरत प्रशिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षक या टैक्निकल आफिशियल के रूप में प्रतिनिधित्व करने पर तीन-तीन लाख रुपए का नगद ईनाम सम्मान के साथ दिया गया, मगर वहीं पर खेल विभाग के बाहर कार्य करने वाले प्रशिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रशिक्षक के रूप में प्रतिनिधित्व करने पर सम्मानित करने की जगह शिमला बुलाकर उनकी अनदेखी कर अपमान किया, वह बहुत शर्मनाक था। करोड़ों रुपए जीतने वाले खिलाडिय़ों के प्रशिक्षकों को न तो स्टेज पर बुलाया और न ही उन्हें नगद ईनाम दिया गया, जैसा केंद्र सरकार देती है। प्रशिक्षकों के साथ इस तरह की बदतमीजी कर क्या प्रदेश में खेलों का कभी भला हो सकता है? क्या अभी भी हिमाचल में खेलों के लिए वातावरण नहीं बन पाया है, जिसमें खिलाड़ी व प्रशिक्षक का सम्मान हो। हिमाचल प्रदेश सरकार ने अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों को उनके द्वारा जीते गए पदकों के अनुसार नगद ईनाम दिया, मगर उनके प्रशिक्षकों को इस बार भी नगद ईनाम नहीं दिया गया, जबकि नई खेल नीति में खिलाड़ी के प्रशिक्षक को भी नगद ईनाम का प्रावधान है। खेल विभाग क्यों प्रशिक्षकों के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है, यह समझ से परे है।
सीमा व सावन को शुरुआती दौर में तराशने वाले प्रशिक्षकों केहर सिंह पटियाल व गोपाल ठाकुर का किसी ने नाम तक नहीं लिया। केहर सिंह पटियाला तो आए ही नहीं, मगर गोपाल ठाकुर अंत तक अपने नाम की घोषणा का इंतजार करते रहे। यही हाल कबड्डी में प्रशिक्षक रतन ठाकुर, मेहर चंद वर्मा व पूजा ठाकुर का भी रहा। वे भी स्टेज पर अपने ट्रेनी को दूर से ही देख पाए। विजेता खिलाडिय़ों का भी अपने प्रशिक्षकों पर ध्यान नहीं गया। यह बहुत शर्मनाक व पीड़ादायी रहा। हैंडबाल के कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों को नगद ईनाम मिला, मगर उनकी प्रशिक्षक स्नेहलता का नाम तक नहीं लिया गया। अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रशिक्षक जौनी चौधरी का नाम भी स्टेज पर नहीं लिया गया, परन्तु उनके अंतरराष्ट्रीय शिष्य जरूर अपने गुरु को अपने साथ स्टेज पर लेकर गए। किसी भी खिलाड़ी को परशुराम अवार्ड व प्रशिक्षक को गुरु वशिष्ठ अवार्ड क्यों नहीं दिया गया? खिलाडिय़ों को प्रशिक्षकों ने ही तराशा है। क्या वे नगद ईनाम के हकदार नहीं हैं? हिमाचल के कुछ पुराने एशियाई स्तर के खिलाडिय़ों को शाल-टोपी तो जरूर दी, मगर वहां हिमाचल के एकमात्र ओलंपियन आशीष चौधरी को स्टेज पर तब बुलाने लगे, जब वह वहां से जा चुका था।
पैरा ओलंपिक पदक विजेता व हाल ही में पैरा एशियन खेलों में दो स्वर्ण पदक विजेता निषाद कुमार को पिछले किसी पदक की ईनामी राशि तो जरूर दी, मगर हाल ही में अर्जित की गई दो स्वर्ण पदकों का नाम तक नहीं लिया गया। क्या एंकर को पता नहीं था? डेढ़ सौ करोड़ की आबादी में पहले तीन स्थानों पर आने वाले राष्ट्रीय पदक विजेताओं के साथ तो बहुत ही बुरा व्यवहार हुआ। एक साथ पूरे जिले के पचास से भी अधिक राष्ट्रीय पदक विजेताओं को सम्मानित करने की जगह जलील करना हर खेल प्रेमी को बहुत बुरा लगा। राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के लिए वर्षों की कठिन ट्रेनिंग चाहिए होती है। तब राष्ट्रीय स्तर पर एथलीट पदक जीतता है। हर अभिभावक चाहता है कि उसके राष्ट्रीय पदक विजेता खिलाड़ी व उसके प्रशिक्षक का शाल-टोपी व नगद ईनाम के साथ स्टेज पर सम्मान हो, मगर यहां पर खिलाडिय़ों को दर्जनों की संख्या में केवल स्टेज के ऊपर-नीचे खड़ा कर बिना शाल-टोपी व ईनाम के वापस भेज देना बहुत बड़ा मजाक खिलाडिय़ों के साथ शिमला में किया गया। कुछ राष्ट्रीय पदक विजेता खिलाडिय़ों को समारोह में बुलाया ही नहीं गया। यह क्या मजाक चल रहा है? राष्ट्रीय पदक विजेताओं को हर साल उनके जीते गए पदकों के लिए ईनाम बांट समारोह आयोजित किया जाए, ताकि हर विजेता का समय पर सम्मान हो तथा ईनामी राशि उसके आगामी प्रशिक्षण सीजन में काम आ सके। पिछले कई वर्षों से जब समारोह आयोजित ही नहीं होगा, तो फिर सैंकड़ों विजेताओं को एक दिन में सम्मानित इस तरह ही किया जाएगा। आनन फानन में आयोजित हुए इस समारोह में क्या किसी भी खिलाड़ी व प्रशिक्षक को टीए, डीए दिया गया? आज का अभिभावक खेलों में भी अपने बच्चों का कैरियर देख रहा है। क्योंकि खेल आज अपने आप में एक प्रोफैशन है। हिमाचल में खेल व खिलाडिय़ों से मजाक किया जा रहा है और प्रशिक्षकों को तो खेल पटल से ही गायब कर दिया है।
देश में ओलंपिक आयोजन की बात हो रही है और हिमाचल में जो अपने दम पर प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं, उनके साथ भद्दा मजाक चल रहा है। भविष्य में हिमाचल सरकार इस तरह का समारोह करती बार ध्यान रखे कि समारोह में बुलाए किसी विजेता खिलाड़ी या प्रशिक्षक के साथ इस तरह बदतमीजी न हो। अभिभावक अपने बच्चों के लिए खेलों में भी कैरियर तलाश रहा है और इस सबके लिए अच्छी खेल सुविधाओं के साथ साथ उच्च स्तरीय प्रशिक्षक भी लगातार कई वर्षों तक उसके बच्चों को मिलना चाहिए ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता बनने का सफर सफलतापूर्वक पूरा कर सकंे। इससे प्रदेश में खेल वातावरण बनेगा तो हर खिलाड़ी व खेल प्रशिक्षक प्रेरित होकर उत्कृष्ट प्रदर्शन करेगा। इस सबके लिए खेल विभाग को चाहिए कि भविष्य में खिलाड़ी जब पदक जीते तो उसके प्रशिक्षकों को भी सम्मानित कर नई खेल नीति के अनुसार नगद ईनाम देकर प्रेरित करें, ताकि पहाड़ की संतानों को ओलंपिक व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए अच्छा प्रशिक्षण मिले।
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भूपिंद्र सिंह
अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रशिक्षक