पीके खुराना
लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं
सरदार पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के बाद वहां पर्यटकों का तांता लग गया। इस परिसर में निजी वाहनों को सीधे प्रवेश नहीं मिलता और परिसर के बाहर पार्किंग की कोई सुविधा नहीं है, वाहनों और पैदल पर्यटकों के लिए अलग मार्ग नहीं हैं, प्रतीक्षालय नहीं है, लोगों को तीन-तीन घंटे लाइनों में इंतजार करना पड़ा और अंदर पहुंचते ही उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि कहीं बैठ जाओ, थोड़ा सुस्ताओ, खा-पी लो और फिर आगे बढ़ो। यह दृश्य पूरी तरह से किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म जैसा था। बिलकुल नहीं सोचा गया कि यहां पहुंचना कितना कठिन या आसान है…
अकसर जब हम सिर्फ एक ही कोण से चीजें देखते हैं, तो हमारा विश्लेषण अधूरा रह जाता है। गुजरात में सरदार पटेल की मूर्ति को लेकर चल रहा विवाद नया नहीं है, लेकिन क्या हम इसके हर पक्ष को देख पा रहे हैं? क्या हम और हमारा समाज इसे समग्रता में देख पा रहे हैं या हमें कुछ और गहराई में जाने की आवश्यकता है?
सरदार पटेल की मूर्ति पर कुछ और चर्चा से पहले एक महत्त्वपूर्ण तथ्य को समझना आवश्यक है। भारतीय मूल के अमरीकी सर्जन डा. अतुल गवांडे की पुस्तक ‘दि चेकलिस्ट मेनिफेस्टो’ में चेकलिस्ट की महत्ता को विस्तार से रेखांकित किया गया है। किसी भी काम में गलतियों से बचने के लिए चेकलिस्ट एक बहुत साधारण दिखने वाला असाधारण कदम है। वस्तुतः यह इतना साधारण नजर आता है कि हम अकसर इसकी महत्ता की उपेक्षा कर देते हैं। यह सच है कि अकसर डाक्टरों पर काम का बहुत बोझ होता है और जटिल आपरेशनों में उन्हें तुरत-फुरत निर्णय लेना होता है। दबाव की उन स्थितियों में भूल हो जाना या गलती हो जाना आम बात है, लेकिन एक छोटी-सी भूल अथवा गलती किसी रोगी की जान ले सकती है। डा. गवांडे का कहना है कि वे इस बात में रुचि ले रहे थे कि लोग असफल क्यों होते हैं, समाज का पतन क्यों होता है, और इसकी रोकथाम कैसे की जा सकती है। ‘दि चेकलिस्ट मेनिफेस्टो’ पूर्ण विस्तार से बताती है कि यदि डाक्टर लोग काम की पूर्णता और शुद्धता, यानी, ‘कॉग्नीटिव नेट’ का पालन करते हुए जटिल आपरेशनों से पहले चेकलिस्ट बना लें, तो केवल स्मरणशक्ति पर निर्भर रहने के कारण होने वाली भूलों से बचा जा सकता है और कई कीमती जानें बचाई जा सकती हैं। उनके इस विचार को विश्व के आठ अलग-अलग अस्पतालों में टेस्ट किया गया और यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया कि उन अस्पतालों में आपरेशन के बाद की मृत्यु दर में 50 प्रतिशत तक की कमी आ गई।
पचास प्रतिशत! यह एक दुखदायी परंतु कड़वा सच है कि अस्पतालों में होने वाली मौतों का 50 प्रतिशत डाक्टरों की छोटी-छोटी भूलों और गलतियों से होता है और इन गलतियों अथवा भूलों की रोकथाम करके बहुत से रोगियों की जानें बचाई जा सकती हैं। डा. गवांडे ने दो और महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। अमरीका के कनेक्टिकट में स्थित हार्टफोर्ड अस्पताल में लगभग 50 वर्ष पूर्व लगी एक आग के बाद लोगों ने डाक्टरों अथवा अस्पताल प्रबंधन पर दोष मढ़ने के बजाय बार-बार आग लगने के कारणों का पता लगाने का प्रयत्न किया, तो अस्पताल में प्रयुक्त पेंट और सीलिंग की टाइलें अग्निरोधक नहीं थे और आग लगने की अवस्था में लोगों को बाहर निकालने की प्रक्रिया भी दोषपूर्ण थी। इन परिणामों के बाद एक विस्तृत चेकलिस्ट बनी और अमरीका में अस्पतालों के भवन निर्माण के नियमों में आवश्यक परिवर्तन किए गए। दूसरी और उससे भी कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यदि गलतियों की रोकथाम न की जाए तो समय बीतने के साथ-साथ हम जीवन में गलतियों और भूलों को जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार करना आरंभ कर देते हैं। किसी कोर्स की पुस्तक संभावित गलतियों का जिक्र नहीं करती, कोई अध्यापक किसी कक्षा में गलतियों से बचने के तरीकों पर बात नहीं करता और यहां तक कि जानलेवा गलतियां भी सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाती हैं।
चेकलिस्ट की सहायता से हम उन गलतियों से बच सकते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में चेकलिस्ट का महत्त्व है। नौकरी, व्यवसाय, प्रशासन, यात्रा में हर जगह चेकलिस्ट का महत्त्व है और यदि हम इस छोटी-सी सावधानी का ध्यान रखें, तो हम बहुत सी अनावश्यक गलतियों से बच सकते हैं। आइए अब मुद्दे की बात करते हैं। सरदार पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के बाद वहां पर्यटकों का तांता लग गया। इस परिसर में निजी वाहनों को सीधे प्रवेश नहीं मिलता और परिसर के बाहर पार्किंग की कोई सुविधा नहीं है, वाहनों और पैदल पर्यटकों के लिए अलग मार्ग नहीं हैं, प्रतीक्षालय नहीं है, लोगों को तीन-तीन घंटे लाइनों में इंतजार करना पड़ा और अंदर पहुंचते ही उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि कहीं बैठ जाओ, थोड़ा सुस्ताओ, खा-पी लो और फिर आगे बढ़ो। यह दृश्य पूरी तरह से किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म जैसा था। बिलकुल नहीं सोचा गया कि यहां पहुंचना कितना कठिन या आसान है? मूर्ति परिसर में रेलवे प्लेटफार्म जैसी स्थिति के लिए क्या हम अपनी जनसंख्या विस्फोट को दोष दें या फिर प्रशासन को दोष दें, जिसने विश्व रिकार्ड बनाने वाली मूर्ति बनाते समय पर्यटकों के लिए आधारभूत सुविधाओं का भी ध्यान नहीं रखा। यह ध्यान देने की बात है कि 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है। स्वाभाविक है कि देश-विदेश के पर्यटकों की रुचि इसे देखने में होगी। विदेशों से आने वाले पर्यटकों को हम क्या संदेश देना चाहते हैं? हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद बना यह स्मारक हमें क्या संदेश देता है? क्या हम सिर्फ इस मुद्दे पर अटके रहें कि इस पर लगा पैसा कितने सालों में वापस आएगा या यह भी देखें कि आने वाले पर्यटकों के कारण इस वंचित क्षेत्र में कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा? लब्बोलुआब यह कि प्रशासन की अपनी चेकलिस्ट होनी चाहिए थी और मीडिया की अपनी। मूर्ति की स्थापना के अतिरिक्त प्रशासन को यह देखना आवश्यक था कि पर्यटकों को यहां तक पहुंचना आसान कैसे बनाया जाए, यहां पहुंच जाने के बाद उन्हें एक अविस्मरणीय अनुभव देने के लिए क्या किया जाए? प्रशासन की चेकलिस्ट की ही तरह मीडिया की चेकलिस्ट भी होनी चाहिए थी, जिसमें यह सवाल भी आना चाहिए था कि मूर्ति तो अब लग ही गई है, खर्च जो होना था हो ही चुका है, अब मूर्ति लगने के बाद के मुद्दे क्या हैं?
क्या मीडिया कर्मियों ने मूर्ति स्थल पर पहुंच कर यात्रियों से बात की? इस मुद्दे पर चर्चा से पहले आम जनता से उनके सवालों को समझने का प्रयास किया? प्रधानमंत्री जब अपने ‘मन की बात’ कहते हैं, तो वह आम जनता से सुझाव मांगते हैं। किसी भी मुद्दे पर चर्चा से पूर्व सवालों और सुझावों के लिए ‘क्राउड सोर्सिंग’ का यह तरीका मीडिया भी अपनाता रहा है। इसके साथ ही यदि मीडिया कर्मी भी चेकलिस्ट बनाने की आदत डाल लें, तो सभी संबंधित सवालों और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर समग्रता में चर्चा करना सुनिश्चित हो जाएगा और जनता को भी पूरी सूचना मिलेगी। यह एक अनिवार्य आवश्यकता है और इसका लाभ उठाया जाना चाहिए।
ईमेलः indiatotal.features@gmail.
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