Divya Himachal Logo Feb 24th, 2017

पीके खुराना


‘गण’ के ‘तंत्र’ का इंतजार

पीके खुराना

( लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं )

अब स्थिति यह है कि ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ की उक्ति सटीक हो गई है। यानी यदि जनता जागरूक नहीं होगी, तो जनप्रतिनिधि भी निकम्मे और भ्रष्ट हो जाएंगे। यह स्वयंसिद्ध है कि ‘आह से आहा’ तक के सफर के लिए जनता को ही जागरूक होना होगा, अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों को समझना होगा और आरक्षण की नहीं, अधिकारों की लड़ाई लड़नी होगी, तभी देश में सक्षम लोकतंत्र आएगा और सही अर्थों में गणतंत्र बनेगा। आशा की जानी चाहिए कि ऐसा शीघ्र होगा…

चुनावों का दौर वादों का दौर होता है। राजनेता बहुत से वादे करते हैं, देश को स्वर्ग बना देने का आश्वासन देते हैं। तो हम उस सुबह के इंतजार में हैं, जब ये वादे वफा होंगे। हां, हमें विश्वास है कि यदि हम खुद जागरूक हुए तो वह सुबह जरूर आएगी। वादे बहुत हैं, उम्मीदें भी बहुत हैं तो इन उम्मीदों के सिलसिले पर नजरसानी हो जाए! काश ऐसा हो कि हमारा गणतंत्र एक शिक्षित, सुरक्षित, विकसित, स्वस्थ और समृद्ध गणतंत्र बन जाए। जहां तंत्र, गण के लिए हो, गण की सेवा के लिए हो, तो वह ‘पब्लिक का रिपब्लिक’ होगा, ‘गण का तंत्र’ होगा और सही मायनों में गणतंत्र होगा। काश कि हमारा देश एक विकसित देश हो, जहां सबके लिए रोजगार हो, जीवनयापन की सुविधाएं हों, सुचारू परिवहन व्यवस्था हो, नागरिकों को अपने काम करवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और रिश्वत न देनी पड़े। इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐसा हो कि अनाज बाहर सड़े नहीं और किसान को अपनी मेहनत का जायज मुआवजा मिले, जहां किसानों और मजदूरों को कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या न करनी पड़े। ‘गण का तंत्र’  यानी लोग स्वस्थ हों, स्वास्थ्य सेवाएं किफायती ही नहीं, दक्ष भी हों। ‘गण का तंत्र’ यानी भोजन के लिए किसी को चोरी न करनी पड़े, लोगों को नौकरी जाने का डर न सताए, व्यापार-उद्योग फलें-फूलें, टैक्स इतना तर्कसंगत हो कि टैक्स चोरी न हो, शोध-कार्य फले-फूले, बुढ़ापा सुरक्षित हो। कानूनों के जंगल से छुटकारा मिले, कानून सरल हों और सबकी समझ में आते हों, न्याय सस्ता हो, सुलभ हो, जनहितकारी नीतियां हों और नियम-कानून बनाने में जनता की भागीदारी हो। ऐसा हो जाए तो तब होगा एक शिक्षित, सुरक्षित, विकसित, स्वस्थ और समृद्ध भारत, जिसे हम कह सकेंगे ‘गण का तंत्र’ यानी ‘पब्लिक का रिपब्लिक’!

इसमें कोई शक नहीं है कि देश ने बहुत प्रगति की है, परंतु प्रगति के सारे कीर्तिमानों के बावजूद हमारी स्वतंत्रता अधूरी है, क्योंकि जनता का अधिकांश भाग अब भी वंचितों की श्रेणी में शुमार है। बहुलता और अभाव के बीच की यह खाई हमारे लोकतंत्र को ‘मजबूत लोकतंत्र’ नहीं बनने देती और हमारा लोकतंत्र एक ‘मजबूर लोकतंत्र’ बन कर रह गया है। अब हमें देश में ऐसे कानूनों की आवश्यकता है, जिससे गणतंत्र में तंत्र के बजाय गण की महत्ता बढ़े। आइए, ऐसे कुछ संभावित कानूनों की चर्चा करें। न्यायपालिका के कामकाज में सुधार के लिए ‘न्यायिक मानकीकरण एवं उत्तरदायित्व विधेयक’, जनहित में विभिन्न घोटालों का पर्दाफाश करने वाले व्हिसल ब्लोअर्स के लिए ‘जनहित कार्यकर्ता सुरक्षा विधेयक’, सरकारी कर्मचारियों द्वारा जनता के काम सही समय पर होना सुनिश्चित करने के लिए ‘जनसेवा विधेयक’, नए बनने वाले कानूनों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘जनमत विधेयक’ तथा किसी अप्रासंगिक अथवा गलत कानून को जनता द्वारा निरस्त करवा पाने के लिए ‘जनाधिकार विधेयक’ तथा जनता के मनपसंद का कोई नया कानून बनाने के लिए ‘जनप्रिय विधेयक’ लाए जाने चाहिएं। फिलहाल हम भ्रष्टाचार में डूबी शासन व्यवस्था और झूठ के सहारे चलने वाले राजनीतिज्ञों को झेल रहे हैं। अपनी-अपनी सरकारों की उपलब्धियों का बखान, गरीबी मिटाने के वादे और नाकामयाबियों के लिए नए-नए बहाने सुनकर हमारे कान पक गए हैं। स्वतंत्रता के बाद भ्रष्ट और निकम्मे राजनीतिज्ञों ने नौकरशाहों को इस हद तक भ्रष्ट बना दिया है कि वे नासूर बन गए हैं।

यदा-कदा कोई दुर्गा शक्ति या अशोक खेमका भी नजर आते हैं, लेकिन सवा सौ करोड़ की आबादी में वे अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। माफिया के सहारे चलती सरकारें, बेलगाम नौकरशाही, कानून को जेब में रखकर चलने वाले पूंजीपति और ठेकेदार, अक्षम न्याय व्यवस्था और बिका हुआ मीडिया हमारे लोकतंत्र की पहचान बन गए हैं। और हम ‘आह-आह’ करते जी रहे हैं। आज हर कोई आरक्षण के लिए लड़ रहा है, उनमें समर्थ वर्ग भी शामिल हैं। सरकार के पास नौकरियां नहीं हैं और व्यापार चलाना तो दूर की बात, शुरू करने में भी इतनी अड़चनें हैं कि किसी उद्यमी का आधा उत्साह तो शुरू में ही काफूर हो जाता है। हमारी कर प्रणाली अतर्कसंगत है। इन सब परिस्थितियों का परिणाम है कि हम ‘आह-आह’ करते जी रहे हैं। अब हमें ‘आह’ से ‘आहा’ तक के सफर के लिए तैयार होना है। यह समझना आवश्यक है कि ‘आह’ से ‘आहा’ तक के सफर की तैयारी क्या हो। यह तैयारी ‘जागरूकता’ है। हम खुद भी जागें और अपने आसपास के लोगों में जागरूकता का भाव जगाएं। ज्यादातर भारतीय एक ग्राहक के रूप में भी जागरूक नहीं हैं। हम अपने अधिकारों से अनजान हैं। हम शिकायत नहीं करते, शिकायत कर लें तो पीछे नहीं पड़ते। अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों से अनजान रहकर हम रोजी-रोटी के जुगाड़ में ऐसे फंसे हैं कि उस जाल से बाहर आने का उपाय ही नहीं सूझता। जब तक हम जागरूक नागरिक नहीं बनेंगे, हमारा शोषण होता रहेगा। नेता और अधिकारी, दोनों ही हमारा शोषण करते रहेंगे और हम व्यवस्था को दोष देते रहेंगे। हम चिढ़ेंगे, कुढ़ेंगे पर विरोध नहीं करेंगे।

देश के विकास की दो अनिवार्य आवश्यकताएं हैं-जिम्मेदार नागरिक और जनसंवेदी प्रशासन। जनसंवेदी प्रशासन तभी आएगा, जब हम जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र और दल के नाम पर वोट देने के बजाय उम्मीदवार की खामियों और खूबियों तथा उसके कामकाज के आधार पर वोट दें और जनप्रतिनिधियों पर मतदाताओं का इतना दबाव हो कि वे जनसंवेदी प्रशासन लाने के लिए विवश हो जाएं। एक जमाना था जब कहा जाता था-‘यथा राजा, तथा प्रजा’। यानी यह माना जाता था कि राजा जैसा होगा, प्रजा भी वैसी ही हो जाएगी। समय बदला, निजाम बदला, शासन के तौर-तरीके बदले और एक दिन के लिए ही सही, जनता जनप्रतिनिधियों की भाग्य विधाता हो गई। अब स्थिति यह है कि ‘यथा प्रजा, तथा राजा’ की उक्ति सटीक हो गई है। यानी यदि जनता जागरूक नहीं होगी, तो जनप्रतिनिधि भी निकम्मे और भ्रष्ट हो जाएंगे। यह स्वयंसिद्ध है कि ‘आह से आहा’ तक के सफर के लिए जनता को ही जागरूक होना होगा, अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों को समझना होगा और आरक्षण की नहीं, अधिकारों की लड़ाई लड़नी होगी, तभी देश में सक्षम लोकतंत्र आएगा और सही अर्थों में गणतंत्र बनेगा। आशा की जानी चाहिए कि ऐसा शीघ्र होगा।

ई-मेल : features@indiatotal.com

February 23rd, 2017

 
 

विकास का नया वोट बैंक

विकास का नया वोट बैंकपीके खुराना ( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) न केवल पिछड़ों का, बल्कि इन वोट बैंक माने जाने वाले वर्गों का भी अच्छा खासा हिस्सा उन दलों में बंटता है, जिनको इनके खिलाफ माना जाता रहा है। इनमें से बहुत […] विस्तृत....

February 16th, 2017

 

बुद्धिजीवियों की फितरत से बढ़ते मुखौटे

बुद्धिजीवियों की फितरत से बढ़ते मुखौटेपीके खुराना ( लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग अत्यधिक सुविधाभोगी हो गया है और उसके अपने निहित स्वार्थ हैं। वह सिर्फ ऐसे तर्क देता है जो तर्कसंगत लगते हैं, पर यह जानना कठिन होता है कि वे […] विस्तृत....

February 9th, 2017

 

चुनावी दौर में मीडिया के प्रश्न

चुनावी दौर में मीडिया के प्रश्नपीके खुराना ( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) चुनाव के समय विज्ञापनों का लालच मीडियाकर्मियों के हाथ बांध देता है और इस सारी प्रक्रिया में उनकी भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है। ऐसे में हमारे सामने एक ही उपाय है कि […] विस्तृत....

January 27th, 2017

 

गठबंधन के सहारे अखिलेश

गठबंधन के सहारे अखिलेशपीके खुराना ( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) अखिलेश सत्ता में हैं। पार्टी पर उनका वर्चस्व बन गया है। वह परिपक्व राजनीतिज्ञ की छवि में आ चुके हैं और पार्टी ने उन्हें सफलतापूर्वक विकास के प्रतीक के रूप में पेश […] विस्तृत....

January 19th, 2017

 

पंजाब का पेचीदा परिदृश्य

पंजाब का पेचीदा परिदृश्यपीके खुराना ( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) सवाल यह है कि पंजाब में किसकी जीत की संभावना है। अभी तक के सर्वेक्षणों में हालांकि आम आदमी पार्टी काफी मजबूत दिख रही है और कांग्रेस के आंतरिक सर्वेक्षणों में भी […] विस्तृत....

January 12th, 2017

 

अखिलेश बनने की सियासी दास्तां

अखिलेश बनने की सियासी दास्तांपीके खुराना ( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) यह तो सिद्ध हो चुका है कि मुलायम सिंह यादव की शक्ति का क्षरण हुआ है, लेकिन समाजवाद के इस दंगल में यह भी हुआ है कि जो अखिलेश पहले आज्ञाकारी पुत्र […] विस्तृत....

January 5th, 2017

 

जन सशक्तिकरण से ही सफल होगा लोकतंत्र

जन सशक्तिकरण से ही सफल होगा लोकतंत्रपीके खुराना ( लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) सरकारी अधिकारियों की शक्तियां इतनी ज्यादा हैं कि वे जनसामान्य को किसी भी हद तक परेशान कर सकते हैं। उनकी जवाबदेही में भी इतने छेद हैं कि वे घपलों के बावजूद भी साफ बच […] विस्तृत....

December 29th, 2016

 

चंडीगढ़ में भाजपा की जीत का रहस्य

चंडीगढ़ में भाजपा की जीत का रहस्यपीके खुराना ( लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) चंडीगढ़ नगर निगम के चुनावों में भाजपा ने बहुत बड़ी जीत दर्ज की है। कांग्रेस के नामी-गिरामी उम्मीदवार धूल चाटने पर विवश हुए हैं। उनमें से बहुत से ऐसे भी थे, जिनकी बहुत प्रतिष्ठा […] विस्तृत....

December 22nd, 2016

 

निर्णय प्रक्रिया में हो जनता की भागीदारी

निर्णय प्रक्रिया में हो जनता की भागीदारीपीके खुराना ( लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं ) नोटबंदी सफल होगी या असफल होगी, इससे प्रधानमंत्री के वादे पूरे होंगे या वे एक जुमला मात्र सिद्ध होंगे, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई एक […] विस्तृत....

December 15th, 2016

 
Page 1 of 41234

पोल

क्या हिमाचल में बस अड्डों के नाम बदले जाने चाहिएं?

View Results

Loading ... Loading ...
 
Lingual Support by India Fascinates