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पीके खुराना


असंतुलित प्रचार का महाअभियान

पीके खुराना

पीके खुरानावरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

छत्तीसगढ़ में देशबंधु को छोड़कर अन्य अखबारों ने सरकार विरोधी विज्ञापन छापने से मना कर दिया। यानी अब पेड न्यूज वाला वह दौर भी चला गया, जब आप पैसे देकर कुछ भी छपवा सकते थे। आज के नए दौर में सत्ता के बल पर आप मनचाही खबर तो छपवा ही सकते हैं साथ ही अपने विरोधियों की खबरें और यहां तक कि विज्ञापन भी रुकवा सकते हैं। यह पेड न्यूज के साथ पेड सेंसरशिप की नई जुगलबंदी है, जो बहुत खतरनाक है…

प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद राजीव गांधी ने खुले आम स्वीकार किया था कि विभिन्न योजनाओं के लिए दिए जाने वाले सरकारी धन के हर रुपए में से केवल पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। इसी तरह, जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में हार के बाद वहां के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला ने कहा था कि सब जानते हैं कि सरकारी आंकड़े कैसे तैयार किए जाते हैं। सरकारी उपलब्धियों की सारी कहानी तो इन्हीं दो बातों से समझ में आ जानी चाहिए। हिटलर ने मानवीय कमजोरी के एक और सच को समझा था कि यदि किसी झूठ को एक हजार बार दोहराया जाए तो वह सच लगने लगता है। आज भारतवर्ष की जनता इसी सच्चाई से दो-चार है। योजनाएं बन रही हैं, पैसा दिए जाने की घोषणा हो रही है, सच की अनदेखी करके आंकड़े गढ़े जा रहे हैं और उन्हें इतने ढंग से और इतनी बार दोहराया जा रहा है कि वे सच लगने लगे हैं। यह सच है कि प्रधानमंत्री मोदी एक ऊर्जावान व्यक्ति हैं। वह तुरत-फुरत निर्णय लेते हैं और उस पर अमल भी शुरू कर देते हैं। केंद्र सरकार के कामकाज में तेजी आई है। विदेशों में भारत की छवि बेहतर हुई है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा नित नये मोर्चे मार रही है और मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर जाता नजर आ रहा है। अब जनता को लगता है कि मोदी सरकार भी ‘तेजी से काम करने वाली सरकार’ है। मोदी की यही शक्ति उन्हें हर मोर्चे पर फतह दिलवा रही है। यूपीए सरकार के कुशासन के बाद जनता की सारी उम्मीदें मोदी पर आ टिकी हैं और तीन साल के अल्प समय में मोदी ने इतने नारे दिए हैं और इतनी योजनाओं का सूत्रपात किया है कि सचमुच रश्क होता है, लेकिन वादों, नारों और छवि से इतर अगर जमीनी सच्चाई को देखा जाए तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

इंदिरा गांधी भी दबंग प्रधानमंत्री थीं और विदेशों में खासी लोकप्रिय भी थीं, लेकिन लोकप्रिय होना एक बात है और कुशल होना बिलकुल अलग बात है। उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था, लेकिन इस घोषणा की पूर्ति के लिए उनके पास कोई योजना नहीं थी। सच तो यह है कि गरीबी हटाओ के नारे पर कभी कोई काम हुआ ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुत सी योजनाओं का हाल भी ऐसा ही है। सरकार में आते ही मोदी ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाए जाने की घोषणा की थी। यह एक स्मार्ट नारा था, जिसने देश भर का ध्यान खींचा। इनमें से पहले बीस स्मार्ट सिटी पहले ही साल अर्थात् 2014-15 में तैयार होने थे। इसके लिए बड़े बजट का प्रावधान था। पचास हजार करोड़ से भी ज्यादा रुपयों के बजट की घोषणा भी की गई थी। स्मार्ट सिटी की पहली सूची में देश की राजधानी नई दिल्ली सहित पंजाब के औद्योगिक शहर लुधियाना, मध्य प्रदेश के इंदौर, जबलपुर और भोपाल, राजस्थान के जयपुर और उदयपुर, गुजरात के सूरत और अहमदाबाद, असम के गुवाहाटी, तमिलनाडु के चेन्नई और कोयंबटूर, कर्नाटक के बेलागाम और दावनगेड़े, आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम और काकीनाड़ा, केरल के शहर कोच्चि, महाराष्ट्र के शोलापुर और पुणे तथा उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर को शामिल किया गया था। ई-गवर्नेंस, स्वच्छ भारत अभियान, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया ः स्टैंड-अप इंडिया जैसे नारों की बदौलत जनता में नया उत्साह जगा था और लगने लगा था कि अब भारत की तस्वीर बदलेगी, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी उपरोक्त किसी भी शहर में  ‘स्मार्टनेस’ के कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ज्यादातर योजनाओं की जमीनी हकीकत कमोबेश ऐसी ही है। मोदी की योजनाओं की जमीनी हकीकत एक समस्या है, लेकिन उससे ज्यादा बड़ी समस्या है उनके प्रचार का तरीका। न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर कांप्लेक्स पर 9/11 के कुख्यात आतंकी हमले के बाद अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने सद्दाम हुसैन द्वारा शासित ईराक पर हमला कर दिया था और संयुक्त राष्ट्र संघ सहित लगभग सारे विश्व को अपने साथ कर लिया था। तब बुश का तर्क यह था कि जो अमरीका के साथ नहीं है, वह आतंकवादियों के साथ है। सारा विश्व जानता है कि आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर यह पेट्रेल के कुंओं पर आधिपत्य की लड़ाई थी। यह लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ थी ही नहीं, पर आतंकवाद के खात्मे के नाम पर लड़ी गई। प्रधानमंत्री मोदी, उनके सहयोगी, संघ और मोदी भक्तों की सेना बिलकुल उसी तर्ज पर प्रचार अभियान चलाए हुए हैं।

यह प्रचार और दुष्प्रचार का ऐसा महाअभियान है, जहां असहमति अथवा विरोध की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं जो कह रहा हूं इसे इसी उदाहरण से समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में देशबंधु को छोड़कर अन्य अखबारों ने सरकार विरोधी विज्ञापन छापने से मना कर दिया। यानी अब पेड न्यूज वाला वह दौर भी चला गया जब आप पैसे देकर कुछ भी छपवा सकते थे। आज के नए दौर में सत्ता के बल पर आप मनचाही खबर तो छपवा ही सकते हैं साथ ही अपने विरोधियों की खबरें और यहां तक कि विज्ञापन भी रुकवा सकते हैं। यह पेड न्यूज के साथ पेड़ सेंसरशिप की नई जुगलबंदी है, जो बहुत खतरनाक है। सोशल मीडिया चूंकि परंपरागत मीडिया से बंधा हुआ नहीं है इसलिए सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए सरकार ने न केवल कई नादिरशाही कानून बना लिए हैं बल्कि यह भी किया कि विरोध के हर स्वर को तुरंत कांग्रेसी, कम्युनिस्ट या उससे भी बढ़कर देशद्रोही करार दे दिया जाए। विरोध करने वाले का इतना अपमान किया जाए कि वह दोबारा मुंह खोलने की हिम्मत ही न करे। इसके लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित लोग तैनात हैं,जिनका काम ही विरोधी दलों के नेताओं को अपमानित करने वाले चुटकुले गढ़ना और सच्ची-झूठी सूचनाओं के मिश्रण से मोदी की छवि चमकाना है। सोशल मीडिया की पोस्ट हर व्यक्ति तक इतनी बार और इतनी तरह से आती है कि यकीन होने लगता है कि मोदी के बिना देश का उद्धार संभव ही नहीं था। यही नहीं, सिलसिलेवार ढंग से लोकतांत्रिक संस्थाओं की हत्या की जा रही है, और सब कुछ हरा ही हरा दिखाया जा रहा है। कारपोरेट जगत की बहुत सी कंपनियां निवेशकों को रिझाने के लिए घाटा होने पर भी लाभ दिखाती रही हैं। पता तब चलता है जब उनके दिवालिया होने की खबर आती है। सूचनाओं पर नियंत्रण लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। समस्या यह है कि मोदी सरकार काम से भी ज्यादा ध्यान सूचनाएं गढ़ने और सूचनाएं छिपाने पर दे रही है। सच की अनदेखी करके गढ़ गए आंकड़ों को इतने ढंग से और इतनी बार दोहराया जा रहा है कि वे सच जैसे लगते हैं, लेकिन सच्चाई से भागने में न लोकतंत्र का भला है, न देश का। अब यह हमारा कर्त्तव्य है कि प्रचार और दुष्प्रचार के अंतर को समझें, अकारण किसी का विरोध या समर्थन न करें, जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें और अफवाहों से बचेें ताकि लोकतंत्र मजबूत रहे और देश प्रगति करता रहे।

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