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पीके खुराना


अभी अप्रासंगिक नहीं हुए केजरीवाल

पीके खुरानापीके खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं

राजनीति में सबको आश्चर्यचकित कर देने वाले एक और शख्स ऐसे हैं, जिनके जिक्र के बिना राजनीति की रणनीति की चर्चा अधूरी रहेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीति की परिभाषा बदल दी। रणनीति के तरीके बदल दिए और एक हाथ से भाजपा और दूसरे हाथ से कांग्रेस को धकेलते हुए खुद दिल्ली के सिंहासन पर जा बैठे। केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने जब पहली बार दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा था, तो किसी को उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं थी…

सन् 2002 से पहले तक नरेंद्र दामोदरदास मोदी भाजपा के बहुत से नेताओं में से एक थे। सन् 2002 में वह जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो कोई नहीं जानता था कि वे किस ऊंचाई तक जा सकते हैं। नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन वे कभी भी ऐसा नेता के रूप में नहीं जाने गए, जिनका कद भाजपा के समानांतर रहा हो। समकालीन भाजपाई राजनीति में मोदी युग से पहले केवल लाल कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी ही दो ऐसे नेता रहे हैं, जो अपने आप में भी शख्सियत थे। वाजपेयी अब सक्रिय राजनीति में नहीं हैं और आडवाणी निरर्थक करार दिए जा चुके हैं। शिवराज सिंह चौहान और सुषमा स्वराज सहित भाजपा के शेष सभी नेताओं ने चुपचाप नरेंद्र मोदी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। इन दो नेताओं का नाम अलग से इस लिए प्रासंगिक है कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव का परिणाम आने से पूर्व तक ये मोदी को अपना नेता नहीं मानते थे, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों के परिणाम से शुरू हुए घटनाक्रम ने इन्हें अपनी रणनीति बदलने के लिए विवश कर दिया। आज नरेंद्र मोदी ही भाजपा हैं। भाजपा उनके बिना सिर्फ एक अन्य राजनीतिक दल है। मोदी की रणनीति ने राजनीति के सारे नियम बदल डाले हैं। मोदी की ही लाइन पर चलने वाले योगी आदित्यनाथ भी इन दिनों खासी चर्चा में हैं और सारा देश उनके कामकाज के तरीके को आशा और उत्साह के साथ देख रहा है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने से भारतीय राजनीति में एक और नया मोड़ आया है। योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी की समानता यही है कि दोनों अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट और एकचित्त हैं और उन्हें ऐसा बहुमत मिला है कि उन्हें किसी की चापलूसी करने की आवश्यकता नहीं है। बहरहाल योगी लंबे समय से राजनीति में होने के बावजूद मुख्यमंत्री के रूप में अभी बिलकुल नए हैं और उनके कामकाज की बृहद समीक्षा का समय अभी दूर है, लेकिन यह कहने में कोई शक नहीं है कि वह राजनीति के चमकते सितारों में सबसे नए हैं।

हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री बने कैप्टन अमरेंदर सिंह भी इस समय राजनीति में नई करवट लाने के प्रयत्न में हैं। वह पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उन्हें हमेशा धाकड़ मुख्यमंत्री माना जाता रहा है। पंजाब में वह अकेले ऐसे राजनेता हैं, जो बादल के सामने छोटे नहीं पड़ते थे। हालांकि एक समय वह अकाली दल में भी रह चुके हैं, लेकिन अकाली दल छोड़ने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी अलग छवि बनाने में कामयाब रहे। इससे पूर्व 2012 में भी उनके नेतृत्व में कांग्रेस के सत्ता में लौटने के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन तब कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल से पिछड़ गई और सत्ता में लौटने के लिए उन्हें पांच और साल इंतजार करना पड़ा। लेकिन इस बार उन्होंने कोई जोखिम नहीं लिया और सलाहकारों की नई टीम के कारण नई नीतियां सामने रखकर जनता का विश्वास जीतने में सफल रहे। यहां यह देखना भी रुचिकर होगा कि मुख्यमंत्री के अपने इस कार्यकाल में कैप्टन अमरेंदर सिंह नया क्या करते हैं और पंजाब की राजनीति में नई करवट क्या होगी। राजनीति में सबको आश्चर्यचकित कर देने वाले एक और शख्स ऐसे हैं, जिनके जिक्र के बिना राजनीति की रणनीति की चर्चा अधूरी रहेगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीति की परिभाषा बदल दी। रणनीति के तरीके बदल दिए और एक हाथ से भाजपा और दूसरे हाथ से कांग्रेस को धकेलते हुए खुद दिल्ली के सिंहासन पर जा बैठे। अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने जब पहली बार दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ा था, तो किसी को उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं थी। तब तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने थे और देश की राजनीति में कोई ऐसा बड़ा फेरबदल नहीं हुआ था कि लोग चमत्कृत हो जाते। हाल के सालों में अरविंद केजरीवाल वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने राजनीति में भूचाल ला दिया और कांग्रेस व भाजपा के नेता हक्के-बक्के रह गए।

अरविंद केजरीवाल की अप्रत्याशित विजय के बाद देश के दोनों राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा ने उन्हें बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की। केजरीवाल ने अंततः कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई, जो सिर्फ 42 दिन चली, लेकिन इन 42 दिनों में उन्होंने कई अभिनव काम किए। लोकपाल बिल के मसले पर उन्होंने त्यागपत्र देकर शहीद बनने की कोशिश की, लेकिन वह जनता की नब्ज को ठीक से नहीं पढ़ पाए और उसके बाद के लोकसभा चुनावों में पंजाब के अतिरिक्त बाकी पूरे देश में उन्हें कहीं से भी एक भी सीट नहीं मिली और खुद केजरीवाल भी वाराणसी से हार गए। इस सबक के बाद केजरीवाल संभल गए, और अंततः फिर भाजपा को पटकनी देकर दिल्ली विधानसभा चुनाव में 67 सीटें जीतकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद एक बार फिर वह अपनी रणनीति से भटके और पंजाब व गोवा में बहुत आशाओं के साथ चुनाव लड़ने के बावजूद वह पंजाब में सरकार नहीं बना पाए और गोवा में तो उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। दिल्ली नगर निगम के चुनावों में भी उन्हें भारी शिकस्त मिली है। अब केजरीवाल फिर माफी मांगते फिर रहे हैं। उनकी जीत और हार के उतार-चढ़ावों के बीच वह भ्रष्टाचार के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं, इसलिए मीडिया ने उन्हें खारिज कर दिया है लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दल किसी एक चुनाव में भारी हार के बावजूद दोबारा सत्ता में आते रहे हैं। इसलिए केजरीवाल को अभी से अप्रासंगिक मान लेना सही नहीं होगा। समय ही बताएगा कि उन्हें अपना खोया आधार पाने में और कितना समय लगेगा या यह संभव भी होगा या नहीं।

कांग्रेस इस समय सबसे बुरे समय में है और कोई बड़ी बात नहीं कि अगले एक वर्ष में हिमाचल प्रदेश भी इसके हाथ से निकल जाए। भाजपा इस समय अपने स्वर्णिम युग में है और लगातार चुनाव पर चुनाव जीतती जा रही है। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो भाजपा उन प्रदेशों में भी पैर जमा रही है जहां पहले उसका नामोनिशान भी नहीं था। मोदी की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है और वह ऐसे नेता हैं जो मुहावरों और लटकों-झटकों के प्रयोग से सत्ता में बने रहने की कला सीख गए हैं। मोदी की दूसरी रणनीति यह है कि विरोधी पर कोई दया न करो, चाहे वह दल के अंदर हो या बाहर। अपनी इसी नीति के कारण उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को अप्रासंगिक बना दिया, सोनिया गांधी को विपक्ष के नेता का स्टेटस देने से इनकार किया। दिल्ली विधानसभा में सिर्फ तीन सीटें जीतने के बावजूद वह उपराज्यपाल के माध्यम से केजरीवाल को परेशान किए हुए हैं और उनकी पूरी सेना आम आदमी पार्टी को तोड़ने में मशगूल है। हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, लालू यादव और चिदंबरम पर आयकर के छापे डलवाए और बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार के गठबंधन को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीति में मोदी की रणनीति विपक्ष को नेस्तनाबूद कर देने की है और इस समय सितारे भी उनका साथ दे रहे हैं। मोदी का गुणगान करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि वह एक ऐसी परंपरा के वाहक हैं जहां विरोधी को परास्त करने की नहीं, बल्कि समाप्त करने की प्रथा है। उम्मीद करनी चाहिए कि जनता और मीडिया शीघ्र ही समझ जाएंगे कि विपक्ष अथवा विरोधी स्वरों का सफाया किसी भी तरह से लोकतंत्र के हित में नहीं है। आमीन !

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