
मन, शरीर और व्यवहार- तीनों का संतुलन ही एक स्वस्थ और प्रसन्न व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, शायद इसीलिए हमें खुशी को खोजने की नहीं, उसे समझने की आवश्यकता है। जिस दिन हम यह स्वीकार कर लेंगे कि खुशी किसी भविष्य की मंजिल नहीं, बल्कि वर्तमान को जीने की गुणवत्ता है, उसी दिन हमारी प्राथमिकताएं बदल जाएंगी। तब खुशी किसी उपलब्धि का पुरस्कार नहीं रहेगी, वह जीवन जीने की शैली बन जाएगी। तब समझ में आता है कि खुशी हमारे पास कहीं बाहर से नहीं आई है, बल्कि वह हमारे अंदर से ही प्रकट हुई है। तब जीवन एक उत्सव बन जाएगा...
धरती को हमारी सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। उसने हमसे कहीं अधिक बड़े संकटों का सामना किया है और भविष्य में भी किसी न किसी रूप में अपना संतुलन बना लेगी। लेकिन यदि हमने समय रहते अपनी नीतियों, अपनी अर्थव्यवस्था और अपनी जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन नहीं किए, तो सबसे अधिक खतरा उसी प्रजाति पर आएगा जो स्वयं को इस ग्रह का सबसे बुद्धिमान जीव मानती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संदेश शायद यही है कि धरती नहीं, हम संकट में हैं...
श्रीमद्भगवद्गीता संयम की बात करती है, त्याग की नहीं। इन्द्रियों को दबाने की नहीं, उन्हें विवेक के अधीन रखने की बात करती है। यही सिद्धांत मोबाइल पर भी लागू होता है। यदि हमारा व्यवहार केवल आदतों और नोटिफिकेशनों से संचालित होने लगे, तो धीरे-धीरे हमारी स्वतंत्रता कम होने लगती है। इसलिए मोबाइल हमारी जेब में रहना चाहिए, हमारी चेतना में नहीं। हम मोबाइल चार्ज करना कभी नहीं भूलते, लेकिन अपने मन को रिचार्ज करना अक्सर भूल जाते हैं। अब समय आ गया है कि हम दोनों के बीच संतुलन स्थापित करें। तकनीक ने हमारा जीवन आसान बनाया है, अब यह जिम्मेदारी हमारी है कि हम उसे अपने जीवन का साधन बनाएं, स्वामी नहीं...
व्यवहार में तो यह भी देखा गया है कि अधिकांश सांसदों को मालूम ही नहीं है कि वे इस धन का प्रयोग किस तरह से कर सकते हैं। यह सर्वविदित है कि जब श्रीमती किरन खेर चंडीगढ़ से सांसद थीं तो वे भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थीं, प्रधानमंत्री की चहेती थीं, लेकिन प्रधानमंत्री से नजदीकियों के बावजूद वे इस धन का उपयोग अपनी मर्जी की परियोजनाओं के लिए नहीं कर पाईं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि प्रशासनिक अधिकारी उनके सुझाये गए 60 प्रतिशत कार्यों को अस्वीकार कर देते हैं। जब एक वरिष्ठ सांसद की हालत इतनी खस्ता है तो बाकियों की तो बिसात ही क्या? इसलिए सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय सांसदों का सशक्तिकरण हो...
हम अक्सर किसी के व्यवहार को देखते हैं और उससे उस व्यक्ति के बारे में अपनी राय बना लेते हैं, जबकि यह कोई जरूरी नहीं है कि किसी व्यक्ति का एक बार का गलत व्यवहार उसकी आदत में शामिल हो। हो सकता है कि उस दिन वह किसी गहरे तनाव से गुजर रहा हो, किसी अपने की बीमारी ने उसे बेचैन कर रखा हो, किसी आर्थिक संकट ने उसकी नींद उड़ा दी हो या किसी निजी पीड़ा ने उसके धैर्य को तोड़ दिया हो। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर किसी व्यक्ति का चरित्र तय कर देना उचित नहीं है। प्रतिक्रिया देना आसान है, पर समझना थोड़ा कठिन है। जिस दिन हम प्रतिक्रिया देने के स्थान पर समझने लगेंगे, उसी दिन हमारे आधे झगड़े बिना किसी प्रयास के समाप्त हो जाएंगे। इसी तरह खुश रहने का सबसे सरल सूत्र है कि हम हर रोज किसी एक व्यक्ति का जीवन थोड़ा बेहतर बना दें...
बस इतना ही याद रखना काफी है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है। जब हमें यह समझ आ जाए कि मन पहले से निर्णय बना लेता है, तो हम छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं। बस जरा रुककर सोचें कि क्या मैं सच में विकल्प देख रहा हूं, या सिर्फ अपने फैसले को सही ठहरा रहा हूं? इसके लिए आवश्यक है कि हम सामने वाले की बात को धीरज से सुनना सीखें, खासकर रिश्तों में। बिना अपना कोई जवाब तैयार किए सुनें। तसल्ली से सुनें। कम से कम बोलकर सुनें। बिना टोके सुनें, और फिर अपने विचारों पर सवाल करें कि क्या मेरी ये सोच सही है, क्या ये सचमुच मेरी ही सोच है या कहीं से सीखी हुई है। थोड़ा रुक कर फिर सोचें। ईमानदारी से विश्लेषण करें। अपने विचारों को परखने के लिए अपने आप को समय दें। हर निर्णय तुरंत लेना जरूरी नहीं होता। आदर्श स्थिति यह है कि हम जागरूक हों और यह समझ लें कि हमारे ज्यादातर फैसले अचानक नहीं होते, वे धीरे-धीरे बनते हैं और उनके पीछे हमारी धारणाओं, अनुभवों और समाज का प्रभाव बहुत बड़ा होता है...
जब हम यह स्वीकार करते हैं कि मैं अभी नहीं जानता, तब ही जानने की संभावना पैदा होती है। जो पहले से मान बैठा है, उसके लिए सीखने को कुछ बचता ही नहीं। इसलिए ‘मैं न मानूं’ कहना वास्तव में यह स्वीकार करना है कि मैं अभी यात्रा में हूं। यह ठहराव नहीं, यह गति है। यह वह विनम्रता है जो कहती है- हो सकता है मेरी आज की समझ अधूरी हो, और कल उसमें कुछ और जुड़ जाए। यह भाव व्यक्ति को छोटा नहीं करता, बल्कि भीतर से व्यापक बनाता है। गृहस्थ जीवन में भी यही दृष्टि संतुलन लाती है। परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में जब हम हर बात को अंतिम सत्य मानकर पकड़ लेते हैं, तब टकराव बढ़ता है और जब हम यह स्थान छोड़ते हैं कि शायद सामने वाला भी कुछ देख रहा है जो मुझे नहीं दिख रहा, तब संवाद जन्म लेता है। ‘मैं न मानूं’ संवाद का द्वार है, संघर्ष का नहीं। यह हमें कठोर नहीं, लचीला बनाता है, और लचीलापन कमजोरी नहीं, परिपक्वता का चिन्ह है...
अगर हम पेड़ न काटें, जंगल न काटें, पशुओं के लिए घास के मैदानों पर नाजायज कब्जा करके उन्हें कंक्रीट के पहाड़ों में न बदलें तो इन पशु-पक्षियों को हमारी किसी और सहायता की आवश्यकता ही न हो। मजे की बात ये कि फिर हम इन्हें ‘बचाने’ और संरक्षित करने की प्रक्रिया को ‘पुण्य’ बना लेते हैं, धर्म बना लेते हैं और मंचों पर चढक़र पाप और पुण्य की दुहाई देते हैं। ये मक्कारी और नौटंकी सिर्फ हम इनसान ही करते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस पेड़ पर चिडिय़ा रहती थी, वो पेड़ काटकर हमारे लिए फ्लैट बना, फिर हम फ्लैट में एक कटोरा पानी और थोड़ा सा दाना रखकर गौरैया की सेवा करने लगते जाते हैं। जहां गाय चरती थी उस मैदान में हमारे बच्चों को पेड़ काटकर, उस लकड़ी के कागज से बनी किताबें रटाने के लिए स्कूल बन गया और अब हम गाय को रोटी खिला कर पुण्य कमा रहे हैं। इस पृथ्वी के पशु-पक्षियों को हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। हमने प्राकृतिक जीवन जीना छोड़ दिया है...
जीवन का एक बहुत सरल नियम है, जो इनसान की पूरी दुनिया बदल सकता है। मन की बात कह मन में रखने के बजाय कह देनी चाहिए। उसे हम भीतर न दबाएं। चि_ी लिखें तो भेज भी दें। बहुत देर होने से पहले ही कह भी दें और याद रखें कि जीवन में मिले लोगों और ईश्वर की कृपाओं के प्रति अपना प्रेम और आभार बिना झिझक जताते रहें। हमारा हृदय आधुनिक स्मार्ट फोन की टच-स्क्रीन की तरह का है। इसे टच करते रहें, छूते रहें, मन को सहलाते रहें, दुलारते रहें तो प्रेम बना रहेगा, रिश्तों की मिठास बनी रहेगी। मां-बाप की व्यस्तता के बीच अकेलेपन से जूझ रहे बच्चे जब अपने मन की बात किसी को नहीं कह पाते तो गलत राहों