यह धर्म-भीरुता बहुत खतरनाक है जो अंतत: सिर्फ अपराध को ही बढ़ाने के काम आएगी। ऐसे बाबाओं के खिलाफ जब कानूनी कार्रवाई होने लगती है तो अक्सर बड़ी संख्या में उनके भक्त कानून और प्रशासन के विरोध में सडक़ों पर उतर आते हैं, रास्ते जाम करते हैं, तोडफोड़ करते हैं और धन-संपत्ति का नुकसान करने या हिंसा फैलाने से भी गुरेज नहीं करते। यह हमारे समाज की कमजोरी है। हमें खुद इससे उबरना होगा और जनता में जागृति पैदा करनी होगी। इसके लिए सामाजिक व्यवस्था को दुरुस्त करना, न्याय को सस्ता और साध्य बनाना भी आवश्यक है वरना बहुत से भोले-भाले लोग ठग बाबाओं के षड्यंत्रों का शिकार होते रहेंगे…
यह दुनिया सतरंगी है, हर तरह के लोगों से मिलकर बनी है। कुछ लोग बहुत अच्छे हैं और कुछ लोग बहुत अच्छे के वेष में हैं। ऐसे लोगों में संत कहलाने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। सतलोक आश्रम के स्वयंभू मुखिया और खुद को कबीर का अवतार बताने वाले रामपाल, बापू के नाम से प्रसिद्ध आसाराम, डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम के बारे में कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है। पंजाब के नूरमहल में स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के मुखिया आशुतोष की मृत्यु पर उनके उत्तराधिकारियों ने उन्हें ‘समाधि में लीन’ बताना आरंभ कर दिया। इस दौरान आश्रम व आश्रम की संपत्ति पर नियंत्रण को लेकर अदालत में मुकद्दमे भी आए, इसी से पता चलता है कि समाधि में लीन बताने की असलियत क्या है। जरूरी नहीं है कि ऐसे किसी आश्रम अथवा संस्थान से जुड़ा हर व्यक्ति पाखंडीस, झूठा या फरेबी हो, पर यह अवश्य हो सकता है कि वह श्रद्धावश सच्चाई को समझने की कोशिश ही न कर रहा हो। स्वर्गीय फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना ने 12 वर्ष ओशो के आश्रम में काटे और फिर मोहभंग होने पर वापस फिल्मी दुनिया में लौट आए। ऐसा नहीं है कि ओशो विद्वान नहीं थे। उनके तर्क अकाट्य होते थे और वे मौलिक सोच के मालिक थे, लेकिन उनके जीवन के आखिरी कुछ वर्ष उनकी व्यक्तिगत असलियत बताने के लिए काफी थे। ओशो के अतिरिक्त बाल ब्रह्मचारी, साईं बाबा, निर्मल बाबा आदि को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं, फिर भी देश में बाबाओं की संख्या और विवाद बढ़ते जा रहे हैं।
वस्तुत: हमारे देश में ‘गॉड इंडस्ट्री’ खूब फल-फूल रही है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों है? इसके कई कारण हैं। हमारे समाज में दलितों का शोषण एक आम बात है। उनकी बड़ी संख्या गरीबी, अशिक्षा और अभावों से भरपूर है। ऐसे लोगों को अध्यात्म के नाम पर फुसलाना कदरन आसान होता है। बाबाओं को दूसरा लाभ यह है कि बड़े पदों पर बैठे तथा समाज में प्रभाव रखने वाले कुछ लोग भी जब उनके शिष्य बन जाते हैं तो वे उनके माध्यम से अन्य शिष्यों के काम करवाना आरंभ कर देते हैं। शक्तिसंपन्न लोग ऐसा श्रद्धावश करते हैं और जिनका काम हो जाता है वे इसे ‘गुरुजी का प्रसाद’ और ‘भगवद्कृपा’ मानने लग जाते हैं, बिना यह समझे कि यह मात्र सांसारिक ‘नेटवर्किंग’ का कमाल है। ज्योतिषियों और बाबाओं का एक दूसरा वर्ग आभिजात्य वर्ग वाला भी है जो स्वयं पढ़े-लिखे हैं, अंग्रेजी में प्रवचन देते हैं और उद्योगपतियों, नौकरशाहों तथा बड़े राजनीतिज्ञों को ‘आध्यात्मिक शांति’ प्रदान करते हैं। उनके शिष्यों में इतने प्रभावशाली लोग होते हैं कि वे देश की नीतियों तक में परिवर्तन कर सकते हैं। यह भी सांसारिक नेटवर्किंग का ही उदाहरण है। अंधश्रद्धा के इस सिलसिले में पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी माने जाने वाले लोगों का भी जमघट इसलिए शामिल हो जाता है क्योंकि अक्सर उनका पेशेवर जीवन अत्यंत तनावपूर्ण होता है और इससे मुक्ति के लिए किसी गुरू की शरण में जाकर वे रीचार्ज हो जाते हैं और नई शक्ति के साथ अपने काम पर वापस लौटते हैं। ऐसे बाबाओं के शिष्य समाज के किसी भी वर्ग से हों, जब किसी एक भक्त का कोई काम हो जाता है तो वह श्रद्धावश बाबाजी की प्रशंसा के गीत गाने लग जाता है और उसे देख-देखकर शेष लोग भी बाबा जी के शिष्य बनने लगते हैं और बाबा जी का रुतबा बढ़ता चला जाता है।
ऐसे बाबाओं की प्रसिद्धि में चिकित्सा व्यवसाय में प्रचलित उक्ति ‘प्लैसीबो इफैक्ट’ की भी बड़ी भूमिका है। उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति की बीमारी प्रकृति प्रदत्त कारणों से या दवाइयों से ठीक हो गई लेकिन उसका श्रेय बाबाजी को मिल गया। प्रसिद्धिप्राप्त ऐसे किसी बाबा के शिष्यों की संख्या जब बढ़ जाती है तो वोट के खरीददार राजनीतिज्ञ उनके सामने शीश नवाने चले आते हैं। राजनीतिज्ञों का समर्थन पाकर ये बाबा लोग और भी निरंकुश हो जाते हैं। कुछ सत्ता के दलाल बन जाते हैं और अपने हित में सत्ता का दुरुपयोग करने लगते हैं। आज ऐसे बाबाओं की कमी नहीं है जो हजारों करोड़ का व्यवसाय करते हैं। अक्सर हम इन संतों के विवादित आचरण से दो-चार होते रहते हैं, परंतु धर्मभीरू भारतीय इन पर बहुत ज्य़ादा ध्यान नहीं देते। वोट लेने के लिए लगभग हर राजनीतिक दल के नेता इन बाबाओं की शरण में जाते रहते हैं। कांग्रेस, भाजपा, आम आदमी पार्टी आदि में से कोई भी इसका अपवाद नहीं है। यही बाबा जी अगर कानून के शिकंजे में आ जाएं तो सारे राजनीतिज्ञ उनसे पल्ला झाड़ लेते हैं। खेद का विषय यह है कि इन बाबाओं के बड़े-बड़े आश्रमों का जब अवैध निर्माण हो रहा होता है तो पुलिस, प्रशासन, राजनेता और मीडिया में से कोई भी शोर नहीं मचाता, उनकी पोल नहीं खोलता, उन पर कार्रवाई की मांग नहीं करता। उससे भी ज्यादा आश्चर्य का विषय है कि ये बाबा लोग अपनी निजी ‘सेनाएं’ बना लेते हैं, तब भी इनका विरोध नहीं होता और कोई दुर्घटना घट जाने के बाद ही जब इनकी शिकायत होती है तो समाज हरकत में आता है।
अपराध होने से पहले अपराध की पृष्ठभूमि बनने दी जाती है। यह हमारे समाज और प्रशासन की सबसे बड़ी कमजोरी है। हम जब तक इस दृष्टिकोण से मुक्ति नहीं पाएंगे, इन कथित संतों के नए-नए अवतार उगते और फलते-फूलते रहेंगे। धार्मिक माने जाने वाले बहुत से संस्थान स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, वाचनालय, पुस्तकालय आदि चलाते हैं और समाज सेवा के कई अन्य कार्य भी करते हैं, जबकि समाज सेवा के कार्यों में लगने वाला यह पैसा उनकी कुल आय का बहुत छोटा-सा भाग होता है और समाज सेवा के सारे कार्य दिखावे के लिए किए जाते हैं ताकि समाज में उनकी अच्छी छवि बनी रहे। यह भी एक तथ्य है कि बहुत से धार्मिक संस्थान एनजीओ के रूप में रजिस्टर्ड हैं। हमारे समाज के बहुत से लोग अक्सर यह देख कर चुप रह जाते हैं कि बाबा लोग यदि कमाई कर रहे हैं तो कुछ न कुछ समाज का भला भी कर रहे हैं। लेकिन आधारभूत सवाल आय का नहीं है, बल्कि यह है कि ऐसे बहुत से धार्मिक अथवा आध्यात्मिक कहे जाने वाले संस्थान भ्रष्टाचार और दुराचार के अड्डे बन जाते हैं और जब तक उनके विरुद्ध शिकायतों की संख्या बहुत न बढ़ जाए, कोई उनका विरोध करने का साहस नहीं करता अथवा आवश्यकता ही नहीं समझता। यह धर्म-भीरुता बहुत खतरनाक है जो अंतत: सिर्फ अपराध को ही बढ़ाने के काम आएगी। ऐसे बाबाओं के खिलाफ जब कानूनी कार्रवाई होने लगती है तो अक्सर बड़ी संख्या में उनके भक्त कानून और प्रशासन के विरोध में सडक़ों पर उतर आते हैं, रास्ते जाम करते हैं, तोडफोड़ करते हैं और धन-संपत्ति का नुकसान करने या हिंसा फैलाने से भी गुरेज नहीं करते। यह हमारे समाज की कमजोरी है। हमें खुद इससे उबरना होगा और जनता में जागृति पैदा करनी होगी। इसके लिए सामाजिक व्यवस्था को दुरुस्त करना, न्याय को सस्ता और साध्य बनाना भी आवश्यक है वरना बहुत से भोले-भाले लोग ठग बाबाओं के षड्यंत्रों का शिकार होते रहेंगे।
पी. के. खुराना
राजनीतिक रणनीतिकार
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