स्पिरिचुअल हीलिंग में प्राणायाम, योग, एनएलपी और ध्यान की सात्विक विधियों का प्रयोग होता है। यही कारण है कि इसे स्पिरिचुअल हीलिंग या आध्यात्मिक उपचार का दर्जा दिया गया है। यह भारतवर्ष की प्राचीनतम विद्याओं में से एक है जिसे धीरे-धीरे भुला दिया गया। अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत को पहचानें, उसका उपयोग करें, उसे आगे बढ़ाएं और जीवन को फिर से सुखमय बनाएं…
‘जो डर गया, सो मर गया’, डाकू गब्बर सिंह की भूमिका निभा रहे स्वर्गीय अभिनेता अमजद खान का यह डायलॉग तो अगस्त 1975 में रिलीज हुई तहलका मचा देने वाली फिल्म ‘शोले’ में हम सबने सुना, पर विज्ञान ने तो बहुत पहले ही यह स्वीकार कर लिया था कि हमारी भावनाओं का असर हमारे शरीर पर होता ही होता है। हम खुशमिजाज हों, आदतन खुश रहते हों, समस्याओं, चुनौतियों, निराशा, हताशा, डर, आत्मग्लानि, अकेलेपन, बोरियत आदि से परेशान हुए बिना अगर हम अपना काम करते रहते हों तो संभावना यही है कि हमारी सेहत भी अच्छी रहेगी, हमारा इम्यून सिस्टम, यानी बीमारियों से लडऩे का कुदरती सुरक्षा तंत्र मजबूत रहेगा और हम जीवन का ज्यादा आनंद ले सकेंगे। इसके विपरीत यदि हमें कोई बुरी खबर मिले और हम घबरा जाएं, दुखी हो जाएं, निराश हो जाएं, हताश हो जाएं, अत्यधिक गुस्से में आ जाएं तो यह बहुत संभव है कि हमें दिल का दौरा पड़ जाए या कोई और बीमारी घेर ले।
यूं भी अगर कोई व्यक्ति चिड़चिड़ा हो, गुस्से वाला हो, शिकायती स्वभाव का हो, उदास रहता हो, निराशा के स्वभाव वाला हो, हर बात में उसे कठिनाई ही नजर आती हो, तो वो शरीर से स्वस्थ दिखता हो तो भी उसका इम्यून सिस्टम कमजोर होता चला जाएगा और कोई बीमारी या वायरस उस पर जल्दी हमला बोलेगा। यह अब कोई रहस्य नहीं है कि हमारी सेहत पर हमारी भावनाओं का गहरा असर होता है। खुशी, उत्साह, आशा, निश्चय, विश्वास, स्नेह, उत्सव आदि जहां हमारे स्वास्थ्य के लिए वरदान सिद्ध होते हैं वहीं निराशा, गुस्सा, तनाव, डर, आत्मग्लानि, अवसाद, अकेलापन, बोरियत जैसी भावनाएं हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हैं। पौष्टिक भोजन हमें स्वस्थ बनाता है, व्यायाम हमें स्वस्थ बनाता है, लेकिन जिस एक तथ्य की हम उपेक्षा कर देते हैं, वो ये है कि हमारी भावनाएं भी हमें स्वस्थ या बीमार बना सकती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि अच्छी सेहत के लिए बहुत से और फैक्टर भी जिम्मेदार होते हैं।
हमारा भोजन कैसा है, हमारा लाइफ स्टाइल कैसा है, हम व्यायाम करते हैं या नहीं, हमारी दिनचर्या कैसी है, हमारे पेशे की जरूरतें क्या हैं, क्या हम सारा दिन खड़े रहते हैं या सारा दिन बैठे रहते हैं, क्या हम सारा दिन कंप्यूटर पर आंखें गड़ाए रहते हैं या मोबाइल से चिपके रहते हैं, इन सब बातों का असर हमारी सेहत पर पड़ता ही है। बिल्कुल इसी तरह हमारी भावनाओं का भी हमारी सेहत पर गहरा असर होता है। यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि कोई भी बीमारी सिर्फ शारीरिक या सिर्फ मानसिक नहीं होती, बल्कि हर रोग का प्रभाव मन और शरीर, दोनों पर पड़ता है। रोग का प्रभाव मन और शरीर दोनों पर होने का मतलब यह है कि यदि हमारा खानपान सही न हो, लाइफ स्टाइल सही न हो, दिनचर्या अच्छी न हो तो जो बीमारी आयेगी वो सिर्फ शरीर तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमारे मन को भी प्रभावित करेगी। इसी तरह अगर हम निराश या उदास रहते हों, गुस्से में रहते हों, हमारा अपमान होता रहता हो, तो सिर्फ हमारा मन ही दुखी नहीं होगा बल्कि शरीर में भी कोई न कोई बीमारी आने की आशंका बढ़ जाएगी। परेशानी यह है कि भावनाओं के साथ जो एक और बात जुड़ी हुई है, उसके बारे में विज्ञान ज्यादा कुछ नहीं कहता। किसी बच्चे को उसकी शारीरिक या मानसिक कमजोरी के कारण अगर उसके साथी छेड़ते रहें, उसे तंग करते रहें, मारते-पीटते रहें, और वह प्रतिकार न कर पाये, मन ही मन कुढ़ता रहे और दिल में उन बच्चों के प्रति घृणा का भाव, गुस्से का भाव या बदले की भावना पाल ले, पर कर कुछ न पाये तो भी बड़ा हो जाने पर भी उसके अवचेतन मन में वह भावना जख्म के जैसा काम करेगी और उसमें आत्मविश्वास नहीं होगा, वह अपनी बात सही ढंग से नहीं कह पायेगा, उसका फोकस कम होगा, प्रोडक्टिविटी कम होगी या वो अत्यंत गुस्सैल व्यक्ति बन जाएगा, झगड़ालू स्वभाव वाला हो जाएगा, अकेला रहने लगेगा, नशे की दुनिया में चला जाएगा या अपराधी बन जाएगा।
ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं। जेल काट रहे अपराधियों से पूछा जाए तो पता चलेगा कि बचपन बहुत कठिनाई भरा था, मारपीट और अपमान रोजमर्रा की बातें थीं, मां-बाप का आपसी रिश्ता अच्छा नहीं था या बच्चे को मां-बाप से बहुत डांट-फटकार पड़ती थी। बचपन या किशोरावस्था में रिश्तेदारों, पड़ोसियों या दोस्तों द्वारा किया गया शारीरिक शोषण भी उनके भविष्य को बिगाड़ सकता है। ऐसे बहुत से कारण या कोई एक कारण अगर अवचेतन मन में गहरे बैठ जाए तो वह बाद में अक्सर किसी बीमारी या किसी अनचाही आदत के रूप में प्रकट हो जाता है। चिकित्सा विज्ञान इसीलिए कहता है कि डरना मना है! हमारा शरीर एक सुपर कंप्यूटर है तो हमारा अवचेतन मन उसकी हार्ड डिस्क है जिसमें जीवन की सभी घटनाओं का लेखा-जोखा मौजूद है। अवचेतन मन में अगर हानिकारक भावनाएं दबी हों तो उनकी सफाई कर देने मात्र से कई मानसिक और शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं। स्पिरिचुअल हीलिंग एक ऐसी उपलब्धि है जो मानसिक विकारों का प्रभावी इलाज कर सकती है। स्पिरिचुअल हीलिंग सिस्टम में काउंसलर या हीलर एक कदम आगे जाकर रोगी के अवचेतन मन को जागृत करके समस्या का समाधान करता है। यह सिस्टम बहुत असरकारक है, इसका परिणाम बहुत जल्दी मिलता है, और इलाज भी पक्का होता है। अवचेतन मन से हानिकारक भावनाओं की सफाई के कारण बहुत बार कई शारीरिक बीमारियां भी खुद-ब-खुद ठीक हो जाती हैं या ठीक होने लग जाती हैं। हमारी कंपनी ‘कॉस्मिक हैपीनेस सैंटर’ में बहुत से डॉक्टरों और ज्योतिषाचार्यों ने भी स्पिरिचुअल हीलिंग के माध्यम से अपनी बीमारियों और परेशानियों का हल पाया है।
स्पिरिचुअल हीलिंग से इलाज ऑनलाइन भी संभव है और इसमें किसी दवाई की जरूरत नहीं होती, इसलिए किसी साइड इफैक्ट या रिस्क का डर ही नहीं है। यह बताना जरूरी है कि स्पिरिचुअल हीलिंग दवाई का बदल नहीं है, चिकित्सा का बदल नहीं है, डाक्टर का बदल नहीं है, इसलिए ऐसी कोई उम्मीद नहीं पाल लेनी चाहिए कि सिर्फ स्पिरिचुअल हीलिंग से ही शरीर की हर बीमारी का इलाज हो जाएगा। स्पिरिचुअल हीलिंग के कारण अगर किसी शारीरिक बीमारी का इलाज हो जाता है तो वह इस कारण है कि उस मरीज में उस बीमारी का कोई भावनात्मक कारण था, लेकिन बीमारी सिर्फ भावनात्मक कारण से ही हो, ऐसा हर बार होता नहीं है, इसलिए कोई स्पिरिचुअल हीलर आपको कभी एकदम से कोई दवाई छोड़ देने या अपने डाक्टर को भूल जाने की सलाह नहीं देगा। हां, यह अवश्य संभव है कि कुछ समय बाद आप या आपके डॉक्टर को यह लगे कि दवाई की आवश्यकता नहीं रही। स्पिरिचुअल हीलिंग में प्राणायाम, योग, एनएलपी और ध्यान की सात्विक विधियों का प्रयोग होता है। यही कारण है कि इसे स्पिरिचुअल हीलिंग या आध्यात्मिक उपचार का दर्जा दिया गया है। यह भारतवर्ष की प्राचीनतम विद्याओं में से एक है जिसे धीरे-धीरे भुला दिया गया। अब समय आ गया है कि हम अपनी विरासत को पहचानें, उसका उपयोग करें, उसे आगे बढ़ाएं और जीवन को फिर से सुखमय बनाएं।
पीके खु्रराना
राजनीतिक रणनीतिकार
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