खाना-खजाना

प्रसन्नता के आलम में किए गए काम हमारे मानसिक स्वास्थ्य का बीमा हैं तो प्रसन्नता के आलम में किया गया भोजन एक दवाखाने की तरह पुष्टिदायक हो जाता है। शाकाहारी भोजन करने वालों के लिए एक बात और ध्यान देने योग्य है। शाकाहारी और मांसाहारी, यानी वेज और नॉन-वेज, दोनों तरह का भोजन परोसने वाले होटल, ढाबे या रेस्टोरेंट में दोनों तरह के भोजन के लिए न तवा अलग होता है, न कड़ाही। यानी, अगर आप शाकाहारी हैं और ऐसे किसी होटल या रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हैं जहां वेज और नॉन-वेज दोनों तरह का भोजन सर्व होता है तो पक्का मानिये कि आपके भोजन में नॉन-वेज भोजन का अंश आएगा ही आएगा। यहां तक कि ऐसे होटल या रेस्टोरेंट से नवरात्रे की थाली भी शुद्ध मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है, फाइव स्टार होटलों में भी नहीं। हम जो करते हैं, हमारे बच्चे उसे देखते हैं और अक्सर उसे ही जीवन का आदर्श बना लेते हैं…

शरीर के स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी भोजन की अपनी महत्ता है। हम कैसा भोजन करते हैं, जितना यह महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम भोजन करते कैसे हैं। खाना खाने का हमारा तरीका भी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। जंक फूड के नुकसान के बारे में तो बहुत कुछ कहा जाता है और इसके बारे में दोबारा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन खाना खाने की हमारी रुटीन के बारे में कुछ आवश्यक बातें समझना हमारे लिए जरूरी है, ताकि हम एक स्वस्थ्य और खुशहाल जीवन जी सकें। आदमी स्वस्थ होगा तो जीवन की बहुत सी अनचाही कठिनाइयों से बच सकेगा। अगर घर का एक भी सदस्य बीमार पड़ जाए तो दवाइयों का खर्च, अस्पताल के चक्कर, डाक्टरों की फीस, अलग-अलग टेस्ट, समय की बर्बादी, मानसिक चिंता, पूरे परिवार को परेशानी आदि सामान्य उदाहरण हैं जो हमें झेलने पड़ते हैं। शरीर स्वस्थ न हो तो दिमाग भी पूरा काम नहीं करता। यही कारण है कि स्वास्थ्य के बारे में बहुत सजग रहना आवश्यक है। भाग-दौड़ भरे इस जीवन में हम इतने व्यस्त हैं कि खाना भी ठीक से नहीं खाते। चलते-फिरते हुए खाना खाना, खड़े होकर खाना खाना, अखबार-मैगजीन पढ़ते हुए, टीवी या मोबाइल देखते हुए खाना खाना, ये सब भी बीमारियों के कारण बन सकते हैं। खाना खाते हुए कुछ भी और करना, किसी और तरफ ध्यान होना, तल्ख बातचीत में मशगूल होना आदि बहुत नुकसानदायक है। जब हम खाना खाते हुए किसी और तरफ ध्यान नहीं दे रहे और हमारा पूरा ध्यान सिर्फ हमारे भोजन की ही तरफ है, तो हम भोजन का भरपूर आनंद लेते हैं। एक-एक कौर का आनंद लेते हैं। भोजन में सम्मिलित हर चीज का पूरा-पूरा आनंद लेते हैं। दाल हो, सब्जी हो, रायता हो, हर चीज का स्वाद अलग से महसूस करते हैं। यही नहीं, जब ध्यान भोजन की ओर न होकर किसी और तरफ बंटा हुआ हो तो हम भोजन चबाते नहीं, निगलते चलते हैं।

तेजी से खाया गया भोजन पूरा पचता नहीं, वह पेट में सड़ता रहता है जो पहले कब्ज और कलैस्ट्रोल का कारण बनता है जो अंतत: किसी बड़ी बीमारी में परिवर्तित हो जाता है। जब हम भोजन चबा-चबा कर खाने के बजाय तेजी से भोजन करते हुए भोजन को निगलते हैं तो मानो कई बीमारियों को निमंत्रण पत्र देकर बुला रहे हैं। तेजी से भोजन करने के कारण कई तरह के कैंसर हो सकने का खतरा बढ़ जाता है। तेजी से खाना खाते रहने वाले लोग धीरे-धीरे मोटापे का शिकार हो जाते हैं। मोटापा खुद तो बीमारी है ही, कई अन्य बीमारियों का कारण भी है। तेजी से खाना खाने पर शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है, कुछ सालों बाद इसी कारण व्यक्ति मधुमेह का शिकार हो जाता है। उच्च रक्तचाप, यानी हाई ब्लड प्रेशर का कारण भी यही है। भोजन चबा-चबाकर खाना चाहिए और पानी संतोष से पिया जाना चाहिए, इसीलिए कहा गया है कि ‘खाना पियो, पानी खाओ।’ कुछ लोग मुंह में ग्रास डालते ही अगला ग्रास तोड़ लेते हैं, इससे ऐसी आदत बन जाती है कि हम भोजन को पूरा नहीं चबाते और शीघ्र ही निगल लेते हैं। हम भोजन को जितना चबाएंगे, वह उतना ही स्वादिष्ट लगेगा और स्वास्थ्यकर भी होगा। पानी खाओ का अर्थ है कि पानी कभी भी गटागट न पिएं, बल्कि घूंट-घूंट करके और बहुत धीरे-धीरे पिएं। हमारे पेट में अम्ल (एसिड) होता है और हमारे मुंह में बनने वाली लार क्षारीय है। हमारी लार जितना अधिक पेट में जाएगी, वह उतना ही शरीर को न्यूट्रल बनाएगी, यानी अम्लीय अवस्था का समाधान करेगी, पेट में अम्ल होने से जलन होती है, खट्टे डकार आते हैं जबकि हमारी लार ही उनका इलाज है। भोजन चबा-चबाकर खाने तथा पानी घूंट-घूंट कर पीने से उनमें ज्यादा से ज्यादा लार मिलती है जो मुफ्त में प्राकृतिक ढंग से हमारी एसिडिटी का इलाज करती है। मौसमी फल, सलाद, हरी सब्जियां और ताजे फलों का रस, सूप शरीर के लिए दवाखाने का काम करते हैं। इसलिए हम क्या खाएं, यह तो ध्यान रखें ही, इसके साथ-साथ कैसे खायें, इसका ध्यान रखना भी जरूरी है।

शांति से बैठकर खाना खाना, खाना खाते समय किसी और तरफ ध्यान न होना, खाना खाने से तुरंत पहले या बाद में पानी न पीना, ताजा और सरल भोजन करना हमारे स्वास्थ्य की गारंटी है। जापान में यह प्रथा है कि भोजन शुरू करने से पहले भोजन परोसने वाले का धन्यवाद किया जाता है, फिर परमात्मा का शुक्रिया अदा किया जाता है और फिर एक खुशनुमा मूड में भोजन की शुरुआत होती है। यही कारण है कि जापानी लोग लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। भोजन के समय परमात्मा का शुक्रिया अदा करना सिर्फ संस्कृति का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि परमात्मा का शुक्रिया अदा करते हुए जब हम कोई भी काम करते हैं तो मन प्रसन्न रहता है। प्रसन्नता के आलम में किए गए काम हमारे मानसिक स्वास्थ्य का बीमा हैं तो प्रसन्नता के आलम में किया गया भोजन एक दवाखाने की तरह पुष्टिदायक हो जाता है। शाकाहारी भोजन करने वालों के लिए एक बात और ध्यान देने योग्य है। शाकाहारी और मांसाहारी, यानी वेज और नॉन-वेज, दोनों तरह का भोजन परोसने वाले होटल, ढाबे या रेस्टोरेंट में दोनों तरह के भोजन के लिए न तवा अलग होता है, न कड़ाही।

यानी, अगर आप शाकाहारी हैं और ऐसे किसी होटल या रेस्टोरेंट में खाना खा रहे हैं जहां वेज और नॉन-वेज दोनों तरह का भोजन सर्व होता है तो पक्का मानिये कि आपके भोजन में नॉन-वेज भोजन का अंश आएगा ही आएगा। यहां तक कि ऐसे होटल या रेस्टोरेंट से नवरात्रे की थाली भी शुद्ध मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है, फाइव स्टार होटलों में भी नहीं। हम जो करते हैं, हमारे बच्चे उसे देखते हैं और अक्सर उसे ही जीवन का आदर्श बना लेते हैं। अक्सर बच्चों में वही आदतें पनपती हैं जो मां-बाप में हों। हमारी स्वस्थ आदतें हमारी सेहत का बीमा तो हैं ही, हमारे बच्चों के लिए भी उदाहरण हैं। हम कुछ भी कहें, बच्चे उससे सीखें या न सीखें, पर हम जो करते हैं, बच्चे उससे तुरंत सीख जाते हैं। जिस तरह हमारी अच्छी आदतें हमारे परिवार के सुख का कारण बनती हैं, उसी तरह हमारी बुरी आदतें हमारे परिवार के दुर्भाग्य का कारण बन जाती हैं। खाना जो है, वह खजाना है, लेकिन खजाने का उपयोग या दुरुपयोग हमारे अपने हाथ में है। हमें सिर्फ इस खजाने के सही उपयोग के तरीके को समझना है, और उसे समझकर उसका पालन करना है, फिर जीवन खुश भी होगा और खुशहाल भी होगा।

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स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक