जीवत मरिए, भवजल तरिए

मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य कही जाने वाली यही वह स्थिति है जब हम जिंदा होते हुए भी मृत्यु के पार का सच जान लेते हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पा लेते हैं। इस मामले में एक सामान्य व्यक्ति और किसी सिद्ध योगी के अनुभव के अंतर को समझना हो तो हम कह सकते हैं कि जब हम गहरी नींद में आराम कर रहे होते हैं तो उस स्थिति में भी हमारा मन और चित्त जागृत रहकर सजग रहते हैं तथा जीवात्मा शरीर से निकल कर मन के साथ भ्रमण करती है। सामान्य भाषा में तब हम स्वप्न की स्थिति में होते हैं, सपना देख रहे होते हैं, पर स्वप्न में जो कुछ होता है, हम उसे नियंत्रित नहीं कर सकते, बदलना चाहें तो भी बदल नहीं सकते। सपने में जो चल रहा है, हम सिर्फ उसके साक्षी हो सकते हैं और अधिकांश स्वप्न तो हमें याद भी नहीं रह पाते। इसके विपरीत समाधि की अवस्था में रहते हुए कोई योगी पूर्णत: जाग्रत होता है…

हमारे जीवन में कशमकश का एक ही कारण है, और वह कारण है हमारा अल्हड़ मन। हमारा मन एक तालाब की तरह है। इसमें उठने वाली तरंगें ही हमसे अपना मनचाहा करवा लेती हैं। मन में उठने वाली तरंगों का स्रोत हमारी बाह्य इंद्रियां हैं। हमने कुछ देखा, पढ़ा, सुना और मन में एक विचार बना, हमने उस पर ध्यान फोकस किया, जैसे ही हमने उस पर ध्यान फोकस किया वह मानो ऐसा हुआ जैसे किसी तालाब में किसी ने पत्थर फेंक दिया और उसके प्रतिक्रिया स्वरूप उस तालाब में कई-कई तरंगें उठने लगीं, और उन तरंगों का विस्तार होता चला गया। हमारे विचारों का भी यही हाल है। यदि हम किसी विचार पर ध्यान फोकस करते हैं तो वह तरंगों की तरह विस्तार पा लेता है। सिर्फ एक विचार मन में आया और जैसे ही हमने उस पर फोकस किया, उससे जुड़े कई और विचार, कई और कल्पनाएं उमड़-उमड़ कर आने लग गईं और विचारों का एक पूरा जाल बन गया। वह विचार एक इच्छा बन गया, एक चाह बन गया और अगर चाह पूरी हो गई, सपना साकार हो गया, तो हम खुश हो गए, पर कुछ ही दिनों में जब हम उसके आदी हो गए तो किसी अगली इच्छा, अगली चाह पर ध्यान फोकस हो गया, इच्छाओं का यह चक्र असीमित है, चलता ही रहता है, और हर एक इच्छा के बाद एक नई इच्छा का जन्म हो जाता है। हर नई इच्छा की पूर्ति के लिए हम कोशिशें करते हैं और जीवन भर एक अनंत चूहा दौड़ के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। जब तक इच्छा पूरी नहीं होती, हम खुश नहीं होते, क्योंकि इच्छा का, चाह का मतलब ही यह है कि हम कुछ ऐसा चाहते हैं जो अभी हमारे पास नहीं है। इच्छा का मतलब ही यह है कि हम में कोई कमी है, और इस कमी को दूर किए बिना हम संतुष्ट नहीं रह सकते, खुश नहीं रह सकते।

इसके विपरीत अगर कोई इच्छा पूरी नहीं हो पा रही तब तो असंतुष्टि का, बेचैनी का, दुख का हिसाब ही मुश्किल है। इच्छा या चाह ही वह कारण है जो हमें जीवन भर दुखी बनाए रखता है। हम यह भी जानते हैं कि जन्म हुआ है तो मृत्यु निश्चित है। जो भी जन्मा है, वह नष्ट होगा ही। कुछ और निश्चित हो न हो, मृत्यु तो निश्चित है ही। हमारे जान-पहचान में अगर किसी व्यक्ति का स्वर्गवास हो जाए और हम उनकी शव यात्रा में शामिल हों, शमशान तक जाएं तो वहां अक्सर हमें जीवन की निस्सारता का भान होता है, तब यह भाव मन में आता है कि जीवन क्षणभंगुर है और हम में अध्यात्म का जागरण होता है, लेकिन जैसे ही हम वापस घर आते हैं तो दुनियादारी के अपने कामों में मशगूल होकर वे सारे भाव भूल जाते हैं। फिर वही रुटीन, वही झूठ, वही फरेब, वही दिखावा, वही गुस्सा, वही जलन, वही शिकायतें, सब की सब हमारे जीवन में वैसे ही लौट आती हैं, जैसे पहले थीं। शमशान में पहुंच कर जो भाव आए थे, वे बहुत कमजोर थे और जल्दी ही हमने उन्हें भुला दिया। इच्छाओं का जाल और जीवन की निस्सारता को जानते-समझते हुए भी हम गाफिल बने रहते हैं और यह मान कर चलते हैं कि वह क्षण कभी आएगा ही नहीं, जब हम इस दुनिया में नहीं रहेंगे। हम उस क्षण को देखना ही नहीं चाहते। मृत्यु का केवल विचार ही एक ऐसा अनुभव है जो अत्यंत कष्टदायी है, दुखदायी है और हम इसका सामना करने को जरा भी तैयार नहीं हैं। मृत्यु एक अटल सत्य है, लेकिन इसके जरा से स्मरण और आहट मात्र से ही हम भयभीत हो जाते हैं, ऊहापोह की स्थिति में आ जाते हैं, विचलित हो जाते हैं, जबकि सिद्ध पुरुषों, योगियों और संतों ने कहा है कि जो मृत्यु को जान लेता है, उसके लिए मृत्यु नृत्य है, उत्सव है, आनंद है और काल उसका दास हो जाता है। ध्यान, धारणा और समाधि के प्रति सजग होकर योगीजन मृत्यु की अनुभूति कर लेते हैं।

यही मुक्ति का मार्ग है। सहज समाधि की स्थिति को पाने के लिए जिन शुरुआती साधनों का सहारा लिया जाता है उनमें शामिल हैं श्वास पर ध्यान, मौन की साधना, सजग आत्मचिंतन, व्रत और सत्संग। सांसों पर ध्यान देकर, मौन की साधना करके, एकांतवास में आत्मचिंतन द्वारा, व्रत-उपवास व ज्ञानी जनों की संगत में रहकर निरंतर प्रयत्न करते हुए हम सहज समाधि की स्थिति में जाने का अभ्यास कर सकते हैं। सहज संन्यास मिशन के तत्वावधान में जब हम इन साधनों का उपयोग करते हुए आगे बढऩा सीखते हैं तो हमें बार-बार समझाया जाता है कि यह एक दिन या कुछ दिन का काम नहीं है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जैसे हमें हर रोज पौष्टिक भोजन और व्यायाम की आवश्यकता होती है, वैसे ही मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए भी निरंतर प्रयत्न और अभ्यास आवश्यक हैं। धीरे-धीरे वह स्थिति आ जाती है जब मृत्यु हमें डराती नहीं, जब हम समाधि में जाकर शरीर से अलग होकर प्रकाशपुंज बन जाते हैं और अपनी इच्छा से शरीर में फिर वापस आ जाने के काबिल हो जाते हैं तो हम जीवन, मृत्यु, संसार और अध्यात्म का सार जान लेते हैं और फिर मृत्यु एक डरावना सच न होकर हमारे लिए बस एक आनंददायक घटना बनकर रह जाती है। तब मृत्यु एक अनुपम, अलौकिक और रोमांचकारी अनुभव बन जाती है।

मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण अथवा कैवल्य कही जाने वाली यही वह स्थिति है जब हम जिंदा होते हुए भी मृत्यु के पार का सच जान लेते हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पा लेते हैं। इस मामले में एक सामान्य व्यक्ति और किसी सिद्ध योगी के अनुभव के अंतर को समझना हो तो हम कह सकते हैं कि जब हम गहरी नींद में आराम कर रहे होते हैं तो उस स्थिति में भी हमारा मन और चित्त जागृत रहकर सजग रहते हैं तथा जीवात्मा शरीर से निकल कर मन के साथ भ्रमण करती है। सामान्य भाषा में तब हम स्वप्न की स्थिति में होते हैं, सपना देख रहे होते हैं, पर स्वप्न में जो कुछ होता है, हम उसे नियंत्रित नहीं कर सकते, बदलना चाहें तो भी बदल नहीं सकते। सपने में जो चल रहा है, हम सिर्फ उसके साक्षी हो सकते हैं और अधिकांश स्वप्न तो हमें याद भी नहीं रह पाते। इसके विपरीत समाधि की अवस्था में रहते हुए कोई योगी पूर्णत: जाग्रत होता है। समाधि का हर अनुभव उसे ज्ञात होता है, यह बात अलग है कि बहुत से दिव्य अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बयान कर पाना संभव ही नहीं है। अपने विचारों के प्रति जागृत रहकर, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करके हम यह जीवन में भी मृत्यु के पार के अनुभव का लक्ष्य पा सकते हैं। इसी स्थिति को गुरुओं ने ‘जीवत मरिए, भवजल तरिए’ की उपमा दी है। इसे ही पाना हमारा परम लक्ष्य है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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