अंगूर, लंगूर, मगरूर

इस बार की ड्राइविंग में बस एक ही फर्क था कि हर ड्राइवर को एक शानदार, नई-नकोर लग्जरी कार चलाने को दी गई। इस बार भी जब सभी लोग गंतव्य स्थान पर पहुंच गए तो ड्राइविंग के समय के उनके व्यवहार का विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि इस बार चालीस लोगों ने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया था। सौ में से चालीस लोग, यानी चालीस प्रतिशत लोगों ने ट्रैफिक के नियमों का सम्मान करना आवश्यक नहीं समझा था। दोनों बार वही ड्राइवर थे, वही रूट था, वही नियम थे, फिर क्यों हुआ ऐसा कि चालीस प्रतिशत ड्राइवरों ने ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। इस प्रयोग के और इस विश्लेषण के मायने क्या हैं? इस प्रयोग से हम क्या सीख सकते हैं? यहां ध्यान देने की जो सबसे आवश्यक बात है, वो यह है कि प्रयोग में शामिल सभी लोगों की कारें अपनी नहीं थी…

अमेरिका में एक बड़ा अनोखा प्रयोग हुआ और उस प्रयोग के परिणाम सचमुच बहुत ही चौंकाने वाले थे। समाज के अलग-अलग वर्गों और अलग-अलग उम्र के सौ लोगों को इस प्रयोग में शामिल किया गया। उन सबको एक-एक कार दी गई और एक निश्चित रूट पर कार चलाने को कहा गया। कोई और शर्त नहीं थी, कोई समय सीमा नहीं थी, कोई गति सीमा अलग से नहीं बताई गई थी। उन सबको बस एक निश्चित रूट पर चलते हुए एक निश्चित गंतव्य स्थान तक पहुंचना था। इन लोगों को जो कारें दी गईं, उनके इंजन बहुत अच्छे थे, लेकिन कारों की शक्ल बिगड़ी हुई थी, बॉडी पुरानी थी, रंग उखड़ा हुआ था, और जगह-जगह डेंट भी पड़े हुए थे। सभी ड्राइवर जब निश्चित गंतव्य स्थान पर पहुंचे तो उनकी ड्राइविंग और ड्राइविंग के समय के व्यवहार का विश्लेषण किया गया तो यह पाया गया कि तीन लोगों को छोड़ कर बाकी सब ड्राइवरों ने कार चलाते हुए सभी ट्रैफिक नियमों का पालन किया था, लाल बत्ती पर कार रोकी थी, जेबरा क्रॉसिंग पर पैदल चलने वाले लोगों को राह दी थी, बुजुर्गों को भी सडक़ पहले पार करने का मौका दिया था, पर सिर्फ तीन लोगों ने इन सारी बातों का ध्यान नहीं रखा था। सौ में से तीन लोग, यानी तीन प्रतिशत लोगों ने ट्रैफिक के नियमों का सम्मान करना आवश्यक नहीं समझा था। कुछ दिनों के अंतराल के बाद उन्हीं सब ड्राइवरों को फिर से बुलाया गया, उन सबको फिर से एक-एक कार दी गई और इस बार भी उसी पुराने रूट पर कार चलाते हुए उसी गंतव्य स्थान पर पहुंचने को कहा गया। इस बार भी न कोई समय सीमा थी, न ही अलग से कोई गति सीमा निर्धारित की गई थी।

इस बार की ड्राइविंग में बस एक ही फर्क था कि हर ड्राइवर को एक शानदार, नई-नकोर लग्जरी कार चलाने को दी गई। इस बार भी जब सभी लोग गंतव्य स्थान पर पहुंच गए तो ड्राइविंग के समय के उनके व्यवहार का विश्लेषण किया गया तो पाया गया कि इस बार चालीस लोगों ने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया था। सौ में से चालीस लोग, यानी चालीस प्रतिशत लोगों ने ट्रैफिक के नियमों का सम्मान करना आवश्यक नहीं समझा था। दोनों बार वही ड्राइवर थे, वही रूट था, वही नियम थे, फिर क्यों हुआ ऐसा कि चालीस प्रतिशत ड्राइवरों ने ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। इस प्रयोग के और इस विश्लेषण के मायने क्या हैं? इस प्रयोग से हम क्या सीख सकते हैं? यहां ध्यान देने की जो सबसे आवश्यक बात है, वो यह है कि प्रयोग में शामिल सभी लोग जो कारें ड्राइव कर रहे थे, कारें उनकी नहीं थी, वे कार के मालिक नहीं थे। वे सब एक निश्चित रूट पर चले और पूर्व-निश्चति गंतव्य स्थान पर पहुंचे और इस प्रयोग के पहले चरण में उनमें से सिर्फ तीन लोगों ने ट्रैफिक नियमों को तोड़ा, लेकिन दूसरी बार उन्हीं लोगों में से चालीस प्रतिशत ड्राइवरों ने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया। पाया यह गया कि जब ये लोग पुरानी दिखने वाली कारें ड्राइव कर रहे थे तो वे खुद को आम आदमी मान रहे थे और सडक़ पर चलने या ड्राइव करने वाले हर दूसरे आम आदमी का भी सम्मान करते हुए सभी ट्रैफिक नियमों का पालन कर रहे थे, पर जब वे एक नई-नकोर और शानदार लग्जरी गाड़ी में थे तो उनके मन में लग्जरी गाड़ी का गरूर था और उन्हें पैदल चलने वाले लोग ही नहीं बल्कि आल्टो, स्विफ्ट या अन्य दूसरी छोटी गाडिय़ों में चलने वाले लोग मक्खी-मच्छर सरीखे महसूस होते थे और दिल में ये भावना थी कि ये आल्टो वाला, ये स्विफ्ट वाला, ये छोटी-सी गाड़ी वाला मेरा रास्ता रोकने की हिम्मत कर रहा है, अभी दिखाता हूं। अहंकार की इसी भावना के चलते उन्होंने ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन किया, वो भी तब जबकि कार उनकी नहीं थी, तो भी इतना गरूर था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस व्यक्ति के पास अपनी लग्जरी गाड़ी हो, उसके गरूर का क्या आलम होगा, उसे सडक़ पर चलने वाला हर दूसरा व्यक्ति भी मक्खी-मच्छर सरीखा क्यों नहीं लगेगा? लग्जरी गाड़ी चलाने वालों द्वारा सडक़ के हादसों का यह एक सटीक विश्लेषण है। अब इसी का दूसरा पहलू मानव स्वभाव की एक और कमजोरी को उजागर करता है।

मान लीजिए कि मैंने मेहनत की, पैसा कमाया और मैंने एक शानदार सुपर लग्जरी कार खरीदी और उसे चलाते हुए घर से निकला तो मोहल्ले का हर व्यक्ति उसे नोटिस करेगा। क्या आप जानते हैं कि ऐसे में एक आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या होती है? एक आम आदमी की पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह होती है कि यह शानदार कार तो मेरे पास होनी चाहिए थी, मेरी होनी चाहिए थी। कोई यह नहीं सोचता कि मैंने या मेरे पुरखों ने मेहनत की, धन का सही निवेश किया, मेहनत से और धीरज से पैसा जमा किया और अब उस मेहनत का फल हमें मिल रहा है। लोग कार की प्रशंसा करेंगे, हमारी मेहनत की नहीं। उनकी निगाह कार पर है, हम पर नहीं, हमारी मेहनत पर नहीं। यानी, कार तो अंगूर है, और कार में बैठा आदमी लंगूर है, जबकि जो कार में बैठा है वो मगरूर है, वो समझता है कि सबकी निगाह उस पर है। अंगूर, लंगूर, मगरूर की यह कहानी सार्वभौमिक है, युनिवर्सल है। हम अपने अहंकार पर नियंत्रण कर सकें, इसीलिए संन्यास का उदय हुआ और भारतीय संस्कृति में संन्यासी हो जाने पर भगवा धारण करने और सिर मुंडाने की परंपरा बनी।

भगवा रंग अग्नि का प्रतीक है, ज्वाला का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति भगवा धारण करता है तो उसका मतलब है कि उसने प्रतीकात्मक रूप से अपने शरीर को जला दिया। इसी तरह सिर मुंडाना इस बात का प्रतीक है कि संन्यासी ने अपनी इच्छाओं को काट डाला। उसे न शरीर से मोह रहा, न इच्छाएं बचीं और वह संन्यासी सिर्फ परमात्मा में रम गया। सहज संन्यास की परंपरा में इन प्रतीकों की महत्ता को स्वीकार तो किया गया, पर बदलते जमाने की आवश्यकताओं के मद्देनजर मेरे पूजनीय गुरुदेव, यानी सहज संन्यास परंपरा के चौथे गुरु सिद्ध गुरु विकासबोधि जी ने गृहस्थ संन्यास की परंपरा को पुनर्जीवित किया ताकि अधिक से अधिक लोग गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ही, अपनी सांसारिक जिम्मेदारियां निभाते हुए ही सात्विक जीवन जीना प्रारंभ करें। सहज संन्यास मिशन से जुड़े हम लोग इन प्रतीकों की महत्ता को स्वीकार करने के बावजूद यह मानते हैं कि गृहस्थ व्यक्ति की चुनौतियां भी कम नहीं हैं और गृहस्थी में रहते हुए ही संन्यासी जीवन जीना और भी श्रेयस्कर है। इच्छाओं से जुड़ाव को तिलांजलि देकर, ब्रह्मांड की हर जड़-चेतन वस्तु के प्रति आदर और प्रेम की भावना का विकास करके हम अंगूर, लंगूर और मगरूर की इस बीमारी से छुटकारा पाने की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। सहज संन्यास मिशन इसी भावना का ध्वजवाहक है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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