खुशी और खुशहाली

हमारे पास धन होगा तो हम कई चुनौतियों का सामना आसानी से कर सकते हैं, आत्मविश्वास से निर्णय ले सकते हैं और सिर उठाकर जी सकते हैं। हमारे पास धन होगा तो हम किसी की सहायता कर सकते हैं, समाज सेवा कर सकते हैं। समस्या धन नहीं है, धन का लोभ है। हम लोभ से बचे रहें तो धन एक अच्छा साधन है, अच्छा औजार है, अच्छा टूल है। धन की महत्ता को कम करके आंकने के बजाय हम यह ध्यान रखें कि हम धन के स्वामी हों, धन हमारा स्वामी न बन जाए। धन हमारे लिए सिर्फ एक साधन ही रहे, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें अध्यात्म की शरण में जाना पड़ेगा। अति हर चीज की बुरी है। यही कारण है कि अध्यात्म को समझना भी आवश्यक है…

आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक उन्नत होते हुए भी आज भारतवर्ष में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो दुखी हैं, उदास हैं, निराश हंै और अकेलेपन की समस्या से जूझ रहे हैं। दरअसल लोग दो अलग-अलग चीजों को एक-दूसरे से कन्फ्यूज कर रहे हैं। उन्नत तकनीक, परिवहन के साधन और धन-संपत्ति से सुख मिल सकता है, खुशी नहीं। आप आरामदायक सोफे पर बैठे हों तो यह सुख है, लेकिन उस सोफे पर बैठा व्यक्ति भी उदास हो सकता है, हताश हो सकता है, चिंता में हो सकता है, गुस्से में हो सकता है। सुख अलग चीज है और खुशी बिल्कुल अलग। भौतिक जीवन में सफलता आपको सुख दे सकती है, पर यह खुशी भी दे, यह जरूरी नहीं है। कृपया भौतिक जीवन की सफलता को और उससे मिलने वाले सुख को खुशी से कन्फ्यूज मत कीजिए। ये कन्फ्यूजन ही समस्या की जड़ है। हम खुशी को भुलाकर सफलता के पीछे भागते हैं और जब सफलता मिल जाती है तो पता चलता है कि यहां तो खुशी है ही नहीं। समाज में ज्यादातर लोगों के दुखी होने का कारण ही यह है कि हम खुशी को सुख में ढूंढ रहे हैं, गलत जगह ढूंढ रहे हैं। खुशी वहां है ही नहीं तो मिलेगी कैसे? हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पिछले 75 साल से एक शोध चल रहा है। इस रिसर्च का विषय है कि किस तरह का व्यक्ति खुश रहता है। शोध में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के उन पूर्व छात्रों को ट्रैक किया गया जो क्लास में अव्वल रहते थे। इन छात्रों में दो लोग अमेरिका के राष्ट्रपति बने, कई लोग सांइटिस्ट बने, उद्यमी बने और कुछ ऐसे भी थे जो अपराध की दुनिया में जा धंसे और जेल गए। इनमें जो लोग खुश रहे, उनमें सिर्फ दो ही बातें कॉमन थीं कि इन सब लोगों ने अपने रिश्ते बरकरार रखे। सफल रहे या कम सफल हुए, पर रिश्तों पर ध्यान दिया, जिससे जीवन भर उन्हें ऐसे लोगों का साथ मिला जो उनकी खुशी में खुश होते थे। दूसरा कॉमन फैक्टर यह था कि वे हर रोज कोई न कोई ऐसा काम जरूर करते थे जिससे खुशी मिलती हो।

किसी दूसरे व्यक्ति की खुशी में शामिल होना, किसी की सहायता कर देना, प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना, बच्चों के साथ रहना, हल्का व्यायाम करना, प्रेरक साहित्य पढऩा आदि में से कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता था जो उन्हें मोटिवेटिड और खुश रखे। खुश रहना सीखा भी जा सकता है। आप कोई कठिन या नापसंद काम पूरा कर लें तो खुशी होती है। आप अपनी देखभाल करें, मनपसंद भोजन करें, छोटी-बड़ी सफलताओं का जश्न मनाएं तो आपको खुशी मिलती है। ऐसी हर स्थिति में हमारा दिमाग डोपामाइन नाम का एक कैमिकल रिलीज करता है जिसे विज्ञान ‘रिवार्ड कैमिकल’ कहता है। इसी तरह अगर आप ध्यान करें, हल्की दौड़ लगाएं, तैराकी करें, साइकिल चलाएं, हल्की धूप में बैठें, प्रकृति के सान्निध्य में जाएं, पेड़-पौधों, फूलों के बीच जाएं तो आपका दिमाग सीरोटोनिन नाम का कैमिकल रिलीज करता है जो आपका मूड सैट कर देता है। अगर आप घरेलू पालतू पशु के साथ खेलें, छोटे बच्चे के साथ खेलें, किसी प्रिय व्यक्ति का हाथ पकड़ें, किसी को गले लगाएं और किसी की सच्ची प्रशंसा करें या शाबाशी दें तो भी आप खुश हो जाते हैं क्योंकि तब हमारा दिमाग ‘लव कैमिकल’ औक्सीटोसिन रिलीज करता है। अगर आप कोई व्यायाम करें, हंसें, कोई कामेडी देखें या गहरे रंग की चाकलेट खाएं तो हमारा दिमाग एंडॉरफिन नाम का कैमिकल रिलीज करता है। यह एक ‘पेन किलर’ का काम करता है। अकेलापन महसूस होने की स्थिति में या उदासी की हालत में इनमें से कुछ भी करें, यानी सैर करें, व्यायाम करें, तैराकी करें, प्रकृति का आनंद लें, बच्चों के साथ खेलें, किसी से गले मिलें तो आपका मूड बदल जाएगा और आपको खुशी मिलेगी। आइए, अब जीवन के दूसरे पहलू की भी बात करते हैं। खुशी तो जीवन में चाहिए ही। हम सारा जीवन असल में खुशियों के पीछे ही भागते हैं। गलती सिर्फ यह करते हैं कि अक्सर हम सुख को खुशी समझ लेते हैं। लेकिन क्या हमें सुख नहीं चाहिए? क्या हमें अमीर नहीं होना चाहिए? क्या हमें पैसा नहीं कमाना चाहिए? समझने की बात यही है कि खुशी पहली प्राथमिकता है और होनी ही चाहिए, पर खुशी के साथ यदि खुशहाली भी हो तो सोने पर सुहागा हो जाता है। हम अमीर भी हों, हम सुखी भी हों, इसमें कुछ भी बुराई नहीं है। खुशहाली के मामले में हमें थोड़े से आत्मनियंत्रण की आवश्यकता है। खुशहाली या अमीरी किसी नशे की तरह है। पहले तो थोड़े में काम चल जाता है, पर फिर धीरे-धीरे नशे की मिकदार बढ़ती चलती है। पहले हम शराब पीते हैं, फिर शराब हमें पीने लग जाती है। अमीरी की चाहत का भी यही हाल है। पैसा जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे ही लालच भी बढ़ता चलता है। कुछ और, कुछ और, कुछ और की चूहा दौड़ में आदमी सचमुच चूहा ही बन जाता है। यहां पर ही आत्मनियंत्रण की आवश्यकता है। हम अमीर हों, पर लोभी न हों। हम सफल हों, पर सफलता के लिए दूसरों को इस्तेमाल न करें। हम किसी का हक न मारें, किसी से छल न करें तो अमीरी सुखदायी बन जाती है। पैसा आज के जीवन की आवश्यकता है।

इसका इंतजाम करने में कोई बुराई नहीं है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, हमारा बुढ़ापा सुरक्षित हो, हम बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा सकें और जीवन के उतार-चढ़ाव के समय हमें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। हमारे पास धन होगा तो हम कई चुनौतियों का सामना आसानी से कर सकते हैं, आत्मविश्वास से निर्णय ले सकते हैं और सिर उठाकर जी सकते हैं। हमारे पास धन होगा तो हम किसी की सहायता कर सकते हैं, समाज सेवा कर सकते हैं। समस्या धन नहीं है, धन का लोभ है। हम लोभ से बचे रहें तो धन एक अच्छा साधन है, अच्छा औजार है, अच्छा टूल है। धन की महत्ता को कम करके आंकने के बजाय हम यह ध्यान रखें कि हम धन के स्वामी हों, धन हमारा स्वामी न बन जाए। धन हमारे लिए सिर्फ एक साधन ही रहे, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें अध्यात्म की शरण में जाना पड़ेगा। अति हर चीज की बुरी है। यही कारण है कि अध्यात्म को समझना भी आवश्यक है। अध्यात्म हमें संतोषी बनाता है, आलसी नहीं। सहज संन्यास मिशन में हम यही सीखते हैं कि हम आध्यात्मिक हों, हम संतोषी हों, पर अपने आलस्य को ढकने के लिए उसे अध्यात्म का नाम न दें। सहज संन्यास मिशन का हर संन्यासी मेहनत का जीवन जीता है और अपनी कमाई के धन का सदुपयोग करते हुए उसे समाज सेवा में भी लगाता है। जीवन में छल-कपट न हो, झूठ न हो, सरलता हो तो हर व्यक्ति संन्यासी है, और यही संन्यासी यदि दुनियादार भी हो तो दुनिया खूबसूरत हो जाती है। खुशी और खुशहाली का यही अर्थ है, यही मंतव्य भी है।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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