इसके बाद संन्यासी ने सेठ से कहा कि शहर के सबसे अमीर सेठ होते हुए भी तुमने लालच किया और कुत्ते का जूठा दूध भी पीने को तैयार हो गए। अब जान के लाले पड़े हैं तो पारस पत्थर तुम्हें बेकार लगने लगा है। याद रखो जीवन का हर सबक एक पारस पत्थर के बराबर है और पहला सबक यह है कि लोभ है कुआं, जो गिरा वो मुआं। यह सुनकर सेठ की आंखों से आंसू बहने लगे, उसका मन निर्मल हो गया और उसने संन्यासी के चरण पकड़ लिए। अब संन्यासी ने सेठ को कहा कि अगला और आखिरी पाठ यह है कि राम नाम में प्रेम होने से हम अहंकार के शिकार नहीं होते और इंद्रियों के विषयों में हमारी आसक्ति नहीं होती जिससे हमारा आध्यात्मिक जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है और हमारा पतन नहीं होता। अज्ञान में, ईष्र्या में, आलस्य में, क्रोध में हम लोभ के कुएं में गिरते चले जाते हैं और फिर हमारे उद्धार की गुंजायश नहीं रह जाती…
भारतीय संस्कृति में कल्पवृक्ष का जिक्र आता है जो एक दिव्य वृक्ष है जिसका उल्लेख वैदिक शास्त्रों में मिलता है। इसे कल्पद्रुप, कल्पतरु, सुरतरु, देवतरु और कल्पलता जैसे नामों से भी जाना जाता है। मान्यता है कि कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर जो भी इच्छा की जाए, वह पूरी हो जाती है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। ऐसा माना जाता है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वह तुरंत मिल जाती है। समुद्र मंथन से ही कामधेनु गाय की भी उत्पत्ति मानी जाती है। ऐसी धारणा है कि इस श्वेतवर्णा गाय में कई देवी-देवता निवास करते हैं और कामधेनु गाय भी हमारी हर कामना की पूर्ति तुरंत करती है। हम सब अपने जीवन में सुख चाहते हैं, धन-धान्य चाहते हैं, सुखदायी रिश्तों का साथ चाहते हैं, सफलता चाहते हैं, शक्ति चाहते हैं, यश चाहते हैं, मन की शांति चाहते हैं, खुशी चाहते हैं, स्वास्थ्य चाहते हैं, आराम चाहते हैं, आनंद चाहते हैं, या यूं कहिए कि अलादीन का चिराग चाहते हैं ताकि हम जो कुछ भी सोचें, जो कुछ भी चाहें, हमारी वह इच्छा तुरंत पूरी हो जाए। कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय या अलादीन के चिराग को पाने की इच्छा हम सबको है। इस इच्छा की पूर्ति का एक और भी तरीका है। यह एक स्वयंसिद्ध तथ्य है कि भगवान के नाम में प्रेम होने से स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही सुलभ हो जाते हैं। कहा गया है कि ‘मिठो अरु कठवति भरो, रौंताई अरु क्षेमय स्वारथ परमाथ सुलभ, राम नाम के प्रेम।’
इसका भावार्थ है कि हमारे पास पदार्थ अमृत समान मीठा भी हो, और कठौती, यानी कमंडल भर कर मिले, यही नहीं, हमें राज्य का अधिकार भी मिल जाए और हम कुशल भी रहें, और यह भी संभव हो जाए कि हमारा स्वार्थ भी सधता रहे तथा हम परमार्थ के कार्य भी कर सकें। राम नाम में प्रेम होने से मधुर सुख भी मिलते हैं और वे दुखरहित और भरपूर आनंदमयी होते हैं। राम नाम के प्रेम से राज्य भी मिल सकता है और उसमें अभिमान तथा विषयासक्ति का अभाव होने के कारण हमारे पतन की गुंजाइश भी नहीं रहती। सच तो यह है कि पारमार्थिक स्थिति पर अचल रहते हुए भी राज्य पर शासन किया जा सकता है और परमार्थ ही स्वार्थ बन जाता है। राम नाम का सहारा न हो तो लोभ में पडऩा बहुत आसान है और लोभ में पड़े व्यक्ति का कोई चरित्र नहीं होता। कहा जाता है कि एक संन्यासी शहर के साथ लगते जंगल में कुटिया बनाकर रहते थे। उनके बारे में यह मशहूर था कि उनके पास एक पारस पत्थर है जिसे उन्होंने कहीं छिपा रखा है। शहर के सबसे अमीर सेठ ने एक रात अपने एक विश्वस्त नौकर के साथ संन्यासी की कुटिया में धावा बोला और उनके माथे पर पिस्तौल रखकर पारस पत्थर देने को कहा। संन्यासी ने उस सेठ से कहा कि मैं तुम्हें वह पारस पत्थर दे सकता हूं, पर उसके लिए तुम्हें तीन बकरियां, एक कुत्ता और एक बड़ा बर्तन यहां लाना होगा और मेरी एक शर्त भी माननी होगी। सेठ ने उनकी बात मानने के बजाय उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी, पर उसे वह पारस पत्थर नहीं मिला। सेठ के बहुत डराने-धमकाने पर भी संन्यासी यही कहते रहे कि पारस पत्थर तभी मिलेगा जब तुम मेरी शर्त मानोगे। जान से मार डालने की धमकी के जवाब में भी संन्यासी ने हर बार यही कहा कि तुम मुझे मार तो सकते हो, पर फिर पारस पत्थर से हमेशा के लिए हाथ धो बैठोगे। आखिर थक-हार कर सेठ ने संन्यासी की शर्त मानना मंजूर कर लिया और अपने नौकर को तीन बकरियां, एक कुत्ता और एक बड़ा बर्तन लाने भेज दिया। नौकर ने आदेश का पालन किया और कुछ ही देर में बकरियां, कुत्ता और बर्तन ले आया। अब संन्यासी ने सेठ को बकरियों का दूध दुहने को कहा। सेठ ने फटाफट उनकी आज्ञा मान ली। संन्यासी ने अगला आदेश दिया कि यह सारा दूध कुत्ते को पीने के लिए दे दो। भूखे कुत्ते ने दूध पीना शुरू किया, लेकिन थोड़ी ही देर में उसका पेट भर गया और काफी सारा दूध बर्तन में बच गया।
अब संन्यासी ने सेठ को कुत्ते का जूठा दूध पीने को कहा। सेठ बड़ा परेशान हुआ, लेकिन आखिर उसने दूध पीना स्वीकार कर लिया। सेठ जब दूध पीने को था तो संन्यासी ने कहा कि पहले अपनी पिस्तौल अपने नौकर को दे दो, फिर दूध पीना। सेठ ने बिना किसी हील-हुज्जत के पिस्तौल नौकर को दे दी। अब संन्यासी ने नौकर को कहा कि पारस का असली अधिकारी सेठ नहीं, बल्कि तू है। सेठ को गोली मार और मुझ से पारस लेकर खुद सेठ बन जा। यह सुनते ही सेठ के हाथों के तोते उड़ गए। सेठ अब जान बचाने के लिए कभी संन्यासी की और कभी अपने नौकर की मिन्नतें करने लगा। सेठ ने नौकर को यह भी कहा कि पारस पत्थर तुम रख लो, पर मेरी जान बख्श दो। तब संन्यासी ने नौकर के हाथ पर एक झटका मारा और पिस्तौल अपने कब्जे में ले ली।
इसके बाद संन्यासी ने सेठ से कहा कि शहर के सबसे अमीर सेठ होते हुए भी तुमने लालच किया और कुत्ते का जूठा दूध भी पीने को तैयार हो गए। अब जान के लाले पड़े हैं तो पारस पत्थर तुम्हें बेकार लगने लगा है। याद रखो जीवन का हर सबक एक पारस पत्थर के बराबर है और पहला सबक यह है कि लोभ है कुआं, जो गिरा वो मुआं। यह सुनकर सेठ की आंखों से आंसू बहने लगे, उसका मन निर्मल हो गया और उसने संन्यासी के चरण पकड़ लिए। अब संन्यासी ने सेठ को कहा कि अगला और आखिरी पाठ यह है कि राम नाम में प्रेम होने से हम अहंकार के शिकार नहीं होते और इंद्रियों के विषयों में हमारी आसक्ति नहीं होती जिससे हमारा आध्यात्मिक जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है और हमारा पतन नहीं होता। अज्ञान में, ईष्र्या में, आलस्य में, क्रोध में हम लोभ के कुएं में गिरते चले जाते हैं और फिर हमारे उद्धार की गुंजायश नहीं रह जाती। लेकिन यदि राम नाम में लिव लगी हो तो हम इन विकारों से ऊपर उठकर सुख भी भोग सकते हैं और दूसरों की सेवा करते हुए सार्थक और सात्विक जीवन का आनंद भी ले सकते हैं। राम नाम की महिमा यही है कि श्री राम के नाम के प्रेम से परस्पर विरोधी और दुर्लभ लगने वाले काम भी संभव हो जाते हैं। हम क्रोध, लोभ, मोह और ईष्र्या छोड़ कर परमात्मा के नाम से प्रेम कर लें तो जीवन सफल हो जाता है। भक्ति भी तभी सफल होती है जब हम लोभ-लालच से मुक्त हों।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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