हमें चाहिए आजादी!

कर्म करो, फल के बारे में चिंतित मत रहो, क्योंकि कर्म का फल क्या होगा, यह अकेले हम पर, हमारी मेहनत पर ही निर्भर नहीं है, बहुत से संयोग शामिल हैं कर्म के फल में। उन संयोगों पर हमारा नियंत्रण नहीं है, इसलिए फल की चिंता में हम अपना फोकस, अपनी शांति और अपना स्वास्थ्य ही गंवाएंगे। मैं फिर दोहराता हूं कि जो कर्म को समझते हैं, उन्हें धर्म को समझने की आवश्यकता नहीं रह जाती। फल की चिंता छोडक़र जब हम कर्म करते हैं तो वह निष्काम कर्म बन जाता है और निष्काम कर्म ही परमात्मा की पूजा है। हमारा कोई भी कर्म, कोई भी काम, सात्विक, राजसी या तामसिक नहीं होता। सात्विक, राजसी या तामसिक मनुष्य की मनोदशा होती है, उसके कर्म नहीं…

कई संयोग बड़े सार्थक होते हैं, मीनिंगफुल होते हैं, और कई बार ये संयोग किसी एक व्यक्ति के जीवन को ही नहीं बल्कि दुनिया भर को भी बदल देने की सामथ्र्य रखते हैं। ऐसा ही एक संयोग महाभारत के युद्ध के समय हुआ। यह समझना शायद बड़ा रुचिकर होगा कि श्रीमद्भागवद्गीता का जन्म युद्ध के समय तो हुआ पर युद्ध के कारण नहीं हुआ। कारण था अर्जुन का अपने कत्र्तव्य से विमुख होना, कारण था अर्जुन के मन में वैराग्य की भावना का उदय होना, वैराग्य तो अच्छी बात है। हमारे सारे शास्त्र वैराग्य की महत्ता का वर्णन करते हैं। वैराग्य का उत्पन्न होना श्रीमद्भागवद्गीता के जन्म का कारण नहीं था। कारण था गलत समय पर वैराग्य की भावना का उदय होना। जब कौरवों की सेना में अपने रिश्तेदारों को देखकर अर्जुन यह बर्दाश्त नहीं कर सके कि वो हस्तिनापुर का राज्य पाने के लिए अपने ही रिश्तेदारों को मारेंगे तो वो वैराग्य की भावना से ग्रसित होकर, धनुष-बाण छोडक़र रथ के पिछले हिस्से में जा बैठे। तब वो युद्ध से नहीं, बल्कि अपने कत्र्तव्य से विमुख हो रहे थे। स्थिति विकट थी। दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। युद्ध किसी भी क्षण आरंभ हो सकता था। तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने कत्र्तव्य की याद दिलाने के लिए गीता का उपदेश दिया। अर्जुन कत्र्तव्य से विमुख न होते तो गीता न होती। हमारा देश धार्मिक लोगों का देश है, आध्यात्मिक लोगों का देश है। जितने अखाड़े, डेरे, साधु-संत, मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च, मस्जिद और अन्य पूजा स्थल हमारे देश में हैं, शायद ही कहीं और हों, तो भी धर्म को लेकर, अध्यात्म को लेकर जितनी भ्रांतियां हमारे देश में हैं, शायद ही कहीं और हों।

हम लोगों ने जाने-अनजाने संन्यास को महिमामंडित तो किया पर साथ ही उसे इस तरह से पेश किया, इस तरह से परिभाषित किया, इतने अगर-मगर जोड़ दिए कि वह आम आदमी से, गृहस्थ समाज से दूर हो गया और हम में यह धारणा व्याप्त हो गई कि धार्मिक होने का मतलब पूजा-पाठ करना, पूजा स्थल पर जाना, पूजा-पाठ करना और संन्यास का मतलब गेरुए वस्त्र पहन कर दुनिया से अलग हो जाना हो गया। परिणाम यह रहा कि हम जाना तो चाह रहे थे जापान, पर पहुंच गए चीन। हम आए तो थे हरि भजन को, पर ओटन लगे कपास। यही कारण है कि हवन का मतलब बदल गया, आध्यात्मिकता का मतलब बदल गया और हम उस बदले हुए गलत मतलब पर अटक गए। अब समय आ गया है कि हम अपने पूर्वाग्रहों से आजाद हो जाएं और एक खुशनुमा सार्थक जीवन जीना शुरू करें। श्रीमद्भागवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण जब अर्जुन को कामनाएं त्यागने का उपदेश देते हैं तो वे कहते हैं कामनाएं त्यागने का मतलब कर्म को त्यागना नहीं है। कर्म तो हम छोड़ ही नहीं सकते क्योंकि सांस लेना भी एक कर्म है, चाहे वह हम जानबूझकर करें या वह स्वत: होता रहे। कर्म तो होगा ही। इसी तरह कामनाओं का संपूर्ण त्याग भी संभव नहीं है। भगवान श्री कृष्ण बतलाते हैं कि कामनाओं को त्यागने का मतलब है, स्वार्थजनित कामनाओं को त्यागना। कामनाओं का संपूर्ण त्याग तो संभव ही नहीं है। स्वयं की चिंता से सर्व की चिंता तक उठना ही परमात्मा को पाने का सबसे सरल मार्ग है। सर्व की चिंता ही परमात्मा का असली पूजन है। मनुष्य का व्यक्तिगत स्वार्थ ही इसमें एकमात्र बाधा है। वैराग्य मनुष्य को संसार से नहीं, स्वयं के स्वार्थ से लेना है। परमात्मा द्वारा रचित इस संसार को तो पूरी करुणा के साथ पूरा का पूरा अपनाना है।

कर्म तो करते चलना है। इसीलिए कहा जाता है कि जो कर्म को समझते हैं, उन्हें धर्म को समझने की जरूरत नहीं होती। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा वैरागी है। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारा अहंकार और मोह पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। हमारे सामने घूम-फिर कर वही सवाल बार-बार आता है कि हम जीवन में खुश कैसे हों, आनंदित कैसे हों, जीवन कविता कैसे बन जाए, संगीत कैसे बन जाए, हम दुखों से आजाद कैसे हो जाएं, क्रोध, निराशा, हताशा, डर, चिंता, तनाव आदि व्याधियों से छुटकारा कैसे मिले। हमारे दिल, दिमाग और आत्मा चीख-चीखकर कह रहे हैं कि हमें इन सबसे निजात पानी है, हम सच्चे अर्थों में अपने मालिक खुद हो जाएं, हमें चाहिए आजादी! हर धर्म, हर धार्मिक-आध्यात्मिक संस्था, हर शास्त्र यही सिखाता है कि सुख और खुशियां, दो अलग-अलग चीजें हैं। हम अक्सर सुख को ही खुशी मान लेते हैं, सुख में खुशियां ढूंढते हैं। यही कारण है कि सुख मिल जाने पर अक्सर हमें पता लगता है कि सुख तो है, सुविधा तो है लेकिन खुशी अभी भी कहीं दूर है, कहीं छुपी पड़ी है, जीवन अभी भी अधूरा है, आकांक्षाएं अभी भी अतृप्त हैं, जीवन में अभी भी खालीपन है, कुछ न कुछ छूटा हुआ है, टूटा हुआ है और वह जुड़ नहीं पा रहा है। इसी से परेशानी है, दुख है, अतृप्ति है। श्रीमद्भागवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण का उपदेश यही है कि संसार को भोगो और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से, पूरी संजीदगी से, अपनी पूरी काबलियत से निभाओ, पूरा जोर लगा दो, पूरा फोकस लगा दो, फिर जो होना हो सो हो, उसके आगे की चिंता छोड़ दो। कर्म करो, फल के बारे में चिंतित मत रहो, क्योंकि कर्म का फल क्या होगा, यह अकेले हम पर, हमारी मेहनत पर ही निर्भर नहीं है, बहुत से संयोग शामिल हैं कर्म के फल में। उन संयोगों पर हमारा नियंत्रण नहीं है, इसलिए फल की चिंता में हम अपना फोकस, अपनी शांति और अपना स्वास्थ्य ही गंवाएंगे। मैं फिर दोहराता हूं कि जो कर्म को समझते हैं, उन्हें धर्म को समझने की आवश्यकता नहीं रह जाती। फल की चिंता छोडक़र जब हम कर्म करते हैं तो वह निष्काम कर्म बन जाता है और निष्काम कर्म ही परमात्मा की पूजा है।

हमारा कोई भी कर्म, कोई भी काम, सात्विक, राजसी या तामसिक नहीं होता। सात्विक, राजसी या तामसिक मनुष्य की मनोदशा होती है, उसके कर्म नहीं। यानी, महत्व इस बात का है कि नीयत क्या है। किसी भी कर्म के समय उस काम से भी ज्यादा उस काम के करने का कारण महत्वपूर्ण है। हम किसी की सहायता करते हैं तो नीयत क्या है? क्या हम बदले में कुछ चाहते हैं? क्या हम बदले में अपना कोई अटका हुआ काम निकलवाना चाहते हैं, क्या हम धन चाहते हैं, क्या हम आगे बढऩे के लिए उस व्यक्ति को सीढ़ी बनाना चाहते हैं, क्या हम प्रशंसा चाहते हैं, या क्या हम सिर्फ इसलिए किसी की सहायता कर रहे हैं क्योंकि प्रेममय होकर अपनी क्षमता के अनुसार हर जरूरतमंद की सहायता करना हमारा स्वभाव बन गया है। यह एक आजमाया हुआ सच है, सार्वभौमिक तथ्य है, युनिवर्सल ट्रुथ है कि जब हम बिना किसी लालच के, अपने स्वभाव के कारण ही हर जरूरतमंद की सहायता करने लगते हैं तो हमें दुखों, चिंताओं, तनाव, क्रोध आदि विकारों से आजादी मिल जाती है। और हमें चाहिए भी क्या?

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

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