ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि पर समय बर्बाद करने वाले हम सब चौथे बंदर हैं जिन्हें गांधी जी तो नहीं देख पाए, पर इन आभासी मंचों के मालिक अपने-अपने बंदरों को देख रहे हैं और मजे ले रहे हैं। उनकी मार्केटिंग की रणनीति हमारी आदतों के अनुसार बनी हुई है। हमने जिस तरह की पोस्ट को क्लिक किया, पसंद किया, टिप्पणी की, किस विज्ञापन को देखा, कितनी देर देखा, उस पर क्या प्रतिक्रिया की, इन सब बातों की खबर इन लोगों को तुरंत हो जाती है और उनका सिस्टम हमें उसी तरह की पोस्ट और विज्ञापन दिखाने शुरू कर देता है। हमारी अपनी कोई प्राइवेसी नहीं है। हमारा डेटा न जाने किस-किस को बेचा जा रहा है और हर मार्केटिंग कंपनी हमारी आदतों, हमारी पसंद, हमारे खर्च करने के पैटर्न और मासिक खर्च आदि का ब्योरा रख रही है और हमें ऐसे उत्पादों का सुझाव दे रही है जिनकी हमें आवश्यकता नहीं है…
‘बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो’ के रूप में गांधी जी ने पूरी दुनिया को सात्विक जीवन का एक महत्वपूर्ण मंत्र दिया था। इस परिकल्पना में तीन बंदरों के साथ दिखाया गया जिसमें एक बंदर ने अपने मुंह पर हाथ रखा हुआ है जिसका आशय है कि हम किसी को कुछ भी बुरा न बोलें, दूसरे बंदर ने अपने कानों पर हाथ रखा हुआ है जिसका आशय है कि हम कुछ भी बुरा न सुनें और तीसरे बंदर ने अपनी आंखों पर हाथ रखा हुआ है जिसका आशय है कि हम बुरा न देखें। ये तीन आचरण सात्विक जीवन के मंत्र हैं। गांधी जी के तीनों बंदर एक-एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं जो हमारे जीवन को संवार सकता है, लेकिन जब हम निरुद्देश्य कोई काम करते हैं तो वह समय और ऊर्जा की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है। आज हमारे साथ यही हो रहा है। तकनीकी प्रगति के कारण आज हमारे पास स्मार्टफोन है जिसमें इंटरनेट की सुविधा है। स्मार्टफोन में ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि न जाने कितने ही ऐप हैं। आज हमारे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इनके चक्कर में फंस कर अकारण अपना समय बर्बाद कर रहा है। ज्यादातर लोगों का इन मंचों पर आने का न तो कोई उद्देश्य होता है, न कारण। वे बस झूठे मनोरंजन के लिए इन मंचों पर आते हैं और कई बार कई तरह की परेशानियों के शिकार हो जाते हैं, समय और पैसा तो बर्बाद होता ही है, लोग मन की शांति भी गंवाते हैं। अगर और कोई नुकसान न हो तो भी समय तो बर्बाद होता ही है, अपनी पोस्ट को लाइक्स न मिलने या उसके शेयर न होने पर भी चिंता या उदासी देखी जा सकती है। स्मार्टफोन के माध्यम से इन ऐप्स के चक्कर में फंसा आदमी आभासी दुनिया में जीने का आदी हो जाता है और धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटता चला जाता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति वास्तविक दुनिया के अपने मित्रों और शुभचिंतकों से दूर होता चला जाता है।
ऐसा व्यक्ति जो निरुद्देश्य अपने फोन से चिपका हुआ है, वह चौथा बंदर है। वो चौथे बंदर आप हैं, वो चौथा बंदर मैं हूं, हम सब चौथे बंदर हैं। गांधी जी का हर बंदर एक संदेश देता है, पर हम, जो चौथे बंदर हैं, कोई संदेश नहीं देते, बल्कि हर संदेश की उपेक्षा कर रहे होते हैं। गांधी जी का पहला बंदर कहता है कि बुरा मत देखो, गांधी जी का दूसरा बंदर कहता है कि बुरा मत सुनो, और गांधी जी का तीसरा बंदर कहता है कि बुरा मत बोलो, लेकिन फोन से चिपका हुआ आदमी फोन के अलावा कुछ भी और नहीं देखता, कुछ भी और नहीं सुनता, कुछ भी और नहीं बोलता। गांधी जी के बंदरों की तो सिर्फ तस्वीरें हैं, लेकिन हम, जो चौथे बंदर हैं, सचमुच बंदर ही हैं। ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि, यानी आभासी दुनिया में जीने के नुकसान ही नुकसान हैं। अक्सर ऐसा व्यक्ति आलसी हो जाता है, अनुत्पादक हो जाता है, अपना समय और सेहत खराब करता है। कहीं से आई हुई पोस्ट को वह अपने मित्रों और आभासी मित्रों में पोस्ट करने लग जाता है जिससे वह अपना ही नहीं दूसरों का भी समय बर्बाद करता है। ऐसा व्यक्ति अपने फोन से ही चिपका रहता है, न वह किसी को देखता है, न किसी की सुनता है, न किसी को कुछ कहता है, बस फोन की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखता है और उसकी उंगलियां काम कर रही होती हैं। ऐसा व्यक्ति कई बार तो भूख-प्यास तक का ध्यान नहीं रख पाता और परिवार के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। फोन पर उपलब्ध इंटरनेट की सुविधा और ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि ऐप कई तरह की परेशानियों का कारण बन गए हैं। यह सिर्फ मनोरंजन का स्रोत ही नहीं है, बल्कि एक खतरनाक लत है, हानिकारक एडिक्शन है और यह ऐसी लत है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है। फोन पर उपलब्ध पोर्न, कई रूपों में सामने आता है। शब्दों में पोर्न, कहानियों, कविताओं और लेखों के माध्यम से आने वाली अश्लीलता, शाब्दिक पोर्न है। इसी तरह तस्वीरों में दिखाई जाने वाली अश्लीलता, पिक्टोरिअल पोर्न है, चित्रों की अश्लीलता है और वीडियो पोर्न के बारे में तो हम सब जानते ही हैं। आदमी इनकी लत में ऐसा फंसता है कि फिर गिरता ही चला जाता है और अंतत: अपना सब कुछ गंवा लेता है। चौथे बंदर के रूप में हम इतने बेवकूफ हो जाते हैं कि किसी एक व्यक्ति द्वारा भेजी गई पोस्ट को नकल करके आगे कइयों को भेजते हैं और बहुत खुश हो जाते हैं, लेकिन जब हमें अपनी उस पोस्ट पर लाइक्स नहीं मिलते या हमारे फालोअर्स की संख्या घट जाती है, तो हम इस हद तक चिंतित हो जाते हैं कि अवसादग्रस्त हो जाते हैं, और अवसाद की इस स्थिति में कई बार कुछ लोग इस हद तक हताश हो जाते हैं कि आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। ह्वाट्सऐप, फेसबुक, टेलिग्राम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, टिंडर आदि पर समय बर्बाद करने वाले हम सब चौथे बंदर हैं जिन्हें गांधी जी तो नहीं देख पाए, पर इन आभासी मंचों के मालिक अपने-अपने बंदरों को देख रहे हैं और मजे ले रहे हैं।
उनकी मार्केटिंग की रणनीति हमारी आदतों के अनुसार बनी हुई है। हमने जिस तरह की पोस्ट को क्लिक किया, पसंद किया, टिप्पणी की, किस विज्ञापन को देखा, कितनी देर देखा, उस पर क्या प्रतिक्रिया की, इन सब बातों की खबर इन लोगों को तुरंत हो जाती है और उनका सिस्टम हमें उसी तरह की पोस्ट और विज्ञापन दिखाने शुरू कर देता है। हमारी अपनी कोई प्राइवेसी नहीं है। हमारा डेटा न जाने किस-किस को बेचा जा रहा है और हर मार्केटिंग कंपनी हमारी आदतों, हमारी पसंद, हमारे खर्च करने के पैट्रन और मासिक खर्च आदि का ब्योरा रख रही है और हमें ऐसे उत्पादों का सुझाव दे रही है जिनकी हमें आवश्यकता तो नहीं है पर जिनसे हमें लगता है कि हमारा सोशल स्टेटस ऊपर उठ जाएगा। ये मार्केटिंग कंपनियां छोटे बच्चों और किशोरों को अपना टार्गेट बना रही हैं और उनके माध्यम से उनके मां-बाप को पटा रही हैं। परिणाम यह है कि सामाजिक दिखावा, जी का जंजाल बन गया है। दिखावे के लिए हम वो चीजें भी खरीद लेते हैं जिनकी हमें कतई आवश्यकता नहीं थी। अब यह हमारा चुनाव है कि हम अपने धन, समय और सेहत का ध्यान रखने की जिम्मेदारी लेते हैं या नहीं, और अगर लेते हैं तो उसे पूरी शिद्दत से कार्यान्वित करते हैं या नहीं, हम इनसान बने रहते हैं या इन आभासी मंचों में से किसी एक के बंदर बन जाते हैं। यह जिम्मेदारी पूरी तरह से सिर्फ हमारी है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
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